रे मन अरु सब छाँडि कै - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (7)

रे मन अरु सब छाँडि कै - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (7)

रे मन अरु सब छाँडि कै, जो अटकै इक ठौर।
वृन्दावन घन कुंज में, जहाँ रसिक शिरमौर॥

- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (7)

हे मन! यदि तू सब ओर से सिमटकर कहीं अटकना अथवा स्वयं को स्थिर करना चाहता है, तो वह रमणीय स्थल श्री वृन्दावन की सघन कुंजें हैं, जहाँ रसिक-शिरोमणि श्यामा-श्याम नित्य विहार-परायण रहते हैं।