तेरौई ध्यान राधिका प्यारी गोवर्द्धनधर लालहिं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (17)

तेरौई ध्यान राधिका प्यारी गोवर्द्धनधर लालहिं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (17)

(राग गौरी)
तेरौई ध्यान राधिका प्यारी गोवर्द्धनधर लालहिं।
कनक लता सी क्यों न बिराजत, अरुझी श्याम तमालहिं॥ [1]
गौरी गान सुतान ताल गहि, रिझवति क्यौं न गुपालहिं।
यह जोवन कंचन-तन ग्वालिन, सफल होत इहिं कालहि॥ [2]
मेरे कहैं विलंब न करि सखि, भूरि भाग अति भालहिं।
(जैश्री) हित हरिवंश उचित हौं चाहति, श्याम कंठकी मालहिं॥ [3]

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (17)

यह मान का पद है । श्री हित सजनी श्री राधिका को सम्बोधित करते हुए कहती हैं:

हे राधिका प्यारी, गोवर्धनलाल को सदा तुम्हारा ही ध्यान रहता है।
(श्रीश्यामसुन्दर को यहाँ गोवर्धनधर लाल कहकर यह व्यंजित किया गया है कि यद्यपि वे संसार के रक्षण एवं पालन में प्रवृत्त रहते हैं तथापि उनका मन अनन्य भाव से तुम में ही आसक्त रहता है।) इन श्याम तमाल के साथ तुम स्वर्णलता के समान उलझकर वयों नहीं सुशोभित होती ? [1]

तुम तान और ताल के साथ गौरी राग गाकर मदनगोपाल को क्यों नहीं रिझाती ? हे भोली प्रिया, श्री श्यामसुन्दर के साथ मिलने से तुम्हारा यह यौवन और यह कंचन जैसा तन इसी समय सफल हो सकता है। [2]

हे सखी, तुम मेरे कहने से विलम्ब न करो। तुम्हारा उच्च ललाट विपुल भाग्य से युक्त है। सखी भावापन्न श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि तुम श्यामसुन्दर के कंठ की माला बनो, यह मेरा चाहना अत्यन्त उचित है।
(क्योंकि इस प्रकार ही तुम्हारे प्रेम और रूप-सौंदर्य की श्रीवृद्धि होती है।)। [3]