वृन्दावन फुलवारि में, पहिरि फूल उरमाल - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (61)

वृन्दावन फुलवारि में, पहिरि फूल उरमाल - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (61)

(दोहा)
वृन्दावन फुलवारि में, पहिरि फूल उरमाल ।
बिहरत श्री बृषभानुजा, नंदनंदन गोपाल॥

(पद) [तिताल, राग-विलावल]
नंदनंदन गोपाललाल वृषभानु दुलारी ।
विहरत वृन्दाबिपिन में, अति प्रीतम प्यारी ।। [1]
कर सपरस परसन्न होत, तैसिय फुलवारी ।
(जै) श्रीभट स्रग दीनी सँवारि, हरि प्रिया उर धारी ।। [2]

- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (61)

(दोहा)
श्रीप्रिया-प्रियतम श्रीवृन्दावन की पुष्प-वाटिका में गले में फूलों की माला धारण कर विचरण करते हुए रसिकजनों के मन को सहज ही मोह लेते हैं।

श्रीभट्टजी उनकी इस छवि को देख कहते हैं—
(पद)
जहाँ भाँति-भाँति के फूल फूले हुए हैं, ऐसे श्रीवृन्दावन में नन्दनन्दन श्रीगोपाललाल तथा वृषभानु दुलारी श्रीराधिका विहार करते हैं। इनका हृदय पारस्परिक प्रेम भाव से ओतप्रोत है । श्रीगोपालजी प्रियतम हैं तो श्रीराधिका उनकी प्रियतमा हैं। ये एक-दूसरे के लिए परमप्रिय हैं। [1]

जिस प्रकार फूली हुई फुलवारी अति प्रसन्नमुद्रा में दिखाई देती है तथा वायु के झोकों से हिलने के कारण पारस्परिक मिलन सुख को सौरभ के माध्यम से बिखेर देती है, ठीक उसी प्रकार श्रीप्रियाप्रियतम परस्पर एक दूसरे हाथसे स्पर्श कर परम प्रसन्न मुद्रा में दिखाई देते हैं। पुष्पवाटिका में विहार करते हुए श्रीलालजी श्रीप्रियाजी के हृदय पर सुगन्धित फूलों का हार सजा-संवारकर धारण कराते हुए परमा नन्द प्राप्त करते हैं। श्रीभट्टजी कहते हैं - आनन्दकन्द वृन्दावन में श्रीप्रियाप्रियतम की यह नित्यविहार लीला सहज स्वाभाविक रूप से निरन्तर चलती रहती है । [2]