भुक्ति-मुक्ति-स्पृहा यावत् पिशाची हृदि वर्तते - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.22)

भुक्ति-मुक्ति-स्पृहा यावत् पिशाची हृदि वर्तते - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.22)

भुक्ति-मुक्ति-स्पृहा यावत् पिशाची हृदि वर्तते।
तावद् भक्ति-सुखस्यात्र कथम् अभ्युदयो भवेत्॥

- श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.22)

जब तक भोग या मुक्ति की पिशाची इच्छा हृदय में विद्यमान है, तब तक भक्ति रस का उदय कैसे हो सकता है?