छबि सौं छबीली खरी प्रीतम के रसभरी,
कोटि-कोटि दामिनी न नख-छबि पावहीं। [1]
चंद-कोटि मंद होत मोतिन की कहा जोति,
नेकु ही की चितवनि ढरे लाल आवहीं॥ [2]
देखत हैं रुचि लियैं मुख-सोभा चित दियैं,
परम प्रबीन प्यारौ रुचि लै लड़ावहीं। [3]
'हित ध्रुव' छिन-छिन मैन के तरंग बढ़ैं,
प्रेम के हिंडोले चढ़े मदन झुलावहीं॥ [4]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (16)
प्रियतम के प्रेम में डूबी हुई, अद्भुत आभा से युक्त, सौंदर्यमयी लाड़िली ऐसी शोभा धारण किए खड़ी हैं कि उनकी नख-छटा के सामने कोटि-कोटि विद्युत् की चमक भी फीकी पड़ जाती है। [1]
कोटि-कोटि दामिनी न नख-छबि पावहीं। [1]
चंद-कोटि मंद होत मोतिन की कहा जोति,
नेकु ही की चितवनि ढरे लाल आवहीं॥ [2]
देखत हैं रुचि लियैं मुख-सोभा चित दियैं,
परम प्रबीन प्यारौ रुचि लै लड़ावहीं। [3]
'हित ध्रुव' छिन-छिन मैन के तरंग बढ़ैं,
प्रेम के हिंडोले चढ़े मदन झुलावहीं॥ [4]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (16)
प्रियतम के प्रेम में डूबी हुई, अद्भुत आभा से युक्त, सौंदर्यमयी लाड़िली ऐसी शोभा धारण किए खड़ी हैं कि उनकी नख-छटा के सामने कोटि-कोटि विद्युत् की चमक भी फीकी पड़ जाती है। [1]
जिनके मुखमंडल की ज्योति के आगे अनगिनत चंद्रमा भी अपनी चमक खो देते हैं, तो मोती की चमक का तो उल्लेख ही क्या? क्योंकि उनकी रसमयी चितवन का थोड़ा सा आभास पाकर ही प्रियतम स्वभावतः उनकी ओर खिंचे चले आते हैं। [2]
रूप के रस में मग्न प्रियतम, अपनी प्रिया के सौंदर्य को निर्निमेष नेत्रों से प्रेमपूर्वक निहारते रहते हैं और उनकी रुचि और प्रसन्नता के अनुसार कुशलतापूर्वक उनके साथ विविध प्रकार के लाड़-चाव करते हैं। [3]
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि इस युगल में हर पल प्रेम-रस का उल्लास उमड़ता रहता है, जो प्रेम के हिंडोले में उन्हें विराजित कर झुलाता रहता है। [4]

