भूमिका :
एक समय की बात है, निधिवन में श्री सरसदेव जी विराजमान थे एवं समस्त शिष्य एवं भक्त गण भी चरणों में बैठे थे। सब शिष्यों ने प्रीती पूर्वक आचार्य के चरणों में एक प्रश्न निवेदन किया।
"हे प्रभु, अब आप एक ऐसा शिष्य कीजिये जो आप पर अपना तन-मन-प्राण न्योंछावर कर दे, और जो आगे स्वामी श्री हरिदास की प्रशंशित गद्दी पर विराजमान हो सबका कल्याण करे।"
स्वामी श्री सरसदेव ने संतों की मृदु वाणी को सुनकर कहा की
"हे संत एवं भक्त गण, मेरी बात को ध्यान पूर्वक सुनो: बुंदेलखंड नामक देश में धसान नदी के किनारे एक गांव है जिसका नाम गूढ़ा है। इसी स्थान पर विश्वामित्र जी ने तप किया था एवं श्री हरी ने इन्हें वहाँ आकर दर्शन दिए थे। उस गांव में विप्रवर श्री विष्णुदास जी रहते हैं जिनके यहाँ एक पुत्र का प्राकट्य हुआ है जिसका नाम नरहरिदेव है, यही बालक मेरी आज्ञा से श्री कुँज बिहारी बिहारिणी जू का भजन करते हुए इस गद्दी पर आरूढ़ होगा।"
इस वचन को सुन समस्त संत एवं भक्त गण बहुत प्रसन्न हुए।
जन्म :
बुन्देलखण्ड में धसान-नदी के किनारे गूढ़ा नामक गाँव में विष्णुदास नामक एक धनी विप्र निवास करते थे। उन पर इतना अधिक धन था कि ओरछा-नरेश से उनका लेन-देन होता रहता था। किन्तु श्री विष्णुदास एवं उनकी पत्नी उत्तमादेवी बिना संतान के अति दुखी थे। दोनों दम्पति श्री सनकादिकों के तपः स्थली में आकर श्री सनकादिकों की प्रसन्नता के लिए दिन-रात भजन करने लगे। इनकी सच्ची प्रीती को समझ कर सनकादिक प्रसन्न हुए एवं दम्पति के स्वप्न में आकर इन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा
"तुम्हें एक पुत्र होगा जो रसनिधि पुरुषोत्तम का अवतार होगा"
जागने पर दोनों दम्पति अति प्रसन्न हुए एवं अपने घर को लौट आए। एक वर्ष पश्चात् उनके यहाँ ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया को एक अति तेजस्वी पुत्र हुआ जिसका कालांतर में नरहरिदेव नाम हुआ।
बाल्यकाल :
श्री नरहरिदेव नित्य ही ग्रन्थ पाठ करते। इनकी उदारता के कारण इनके द्वार पर अनेक संत आते एवं नरहरिदेव सब संतों की सेवा करते। अनेक प्रकार के व्यंजन बनाते एवं संतों को प्रेम से खिलाते और स्वयं उनका सीत प्रसाद पाते तथा जल के स्थान पर उनके चरण प्रक्षालन कर चरणामृत ग्रहण करते। श्री नरहरिदेव संतों के संग में सुख अनुभव करते एवं उनके कृपा एवं आशीर्वाद में ही जीवन यापन करते।
सुखजी नाम का एक वणिक था जिसे कुष्ट रोग हो गया था। उसके शरीर से दुर्गन्ध आने लगी जिससे उसके स्वजन और स्नेहीजन भी उससे दूर रहने लगे। सुखजी बहुत दुखी हुए और विचार किया की भगवन जगन्नाथ ही मुझे इस रोग से मुक्ति दिला सकते हैं। वह जगन्नाथपुरी गया और वहां रोग निवारण के लिए अनशन करके बैठ गया। 5 दिन बीत गए तब भगवान जगन्नाथ ने अपने सेवक द्वारा सूचना भेजी। सेवक सुखजी पास आया और भगवान जगन्नाथ का आदेश सुनाने लगा।
भगवान जगन्नाथ ने कहा "तुम्हारे रोग का निवारण यहाँ नहीं है, तुम गूढ़ा ग्राम में चले जाओ, वहां एक विप्र रहते हैं जिनका नाम विष्णुदास है, उनके यहाँ मैंने पुत्र रूप में अवतार लिया है, जिनका नाम नरहरिदास है, उनके चरणामृत से जब तुम स्नान करोगे तो तुम्हारा कुष्ट रोग दूर हो जायेगा।"
यह सुनकर सुखजी गूढ़ा ग्राम आए और बालक श्री नरहरिदास के चरणों में श्री जगन्नाथ जी का आदेश निवेदित किया। श्री नरहरिदास ने अपना चरणामृत दिया और सुखजी ने उससे स्नान किया जिसके फलस्वरूप उसका कुष्ट रोग दूर हो गया। श्री नरहरिदास जी का यह चरित्र सर्वत्र फ़ैल गया।
अध्यात्म जीवन एवं वैष्णवी दीक्षा :
एक बार महन्त मुरारिदास चार सौ सन्तों की जमात लेकर आपके घर पधारे। उनकी रसोई में वड़ा बनाने को 10 मन उड़द की दाल तत्काल भिगोई गई। पर इतने कम समय में दाल को पीसे कौन ? रसोईवाले बड़े असमंजस में थे कि क्या करें ? किन्तु श्रीनरहरिदास को तनिक भी चिन्ता न थी। दाल भीग जाने पर लोगों ने देखा कि चार सन्त आए (जो वास्तव में सनकादिक मुनि थे) और चार घड़ी में ही 10 मन दाल को पीस कर अन्तर्धान हो गए। श्री नरहरिदेव ने पीसी हुई दाल से दही वड़ा बनाया और जुगल किशोर को भोग लगा कर संतों को परोसा। सब सन्तों ने बड़े प्रेमसे प्रसाद पाया और आपस में कहने लगे की ऐसा स्वादिष्ट प्रसाद तो हमने जीवन में कभी नहीं पाया।
श्री सनकादिक अपने लोक को पधारे एवं किसी-किसी भाग्यशाली संत ने उनका दर्शन किया। श्री नरहरिदेव के इस चरित्र को देख महंत मुरारी जी अति प्रसन्न हुए एवं नरहरीदेव को आलिंगन प्रदान कर कहने लगे
"आपके गुरु कौन हैं"
श्री नरहरिदेव ने कहा "मेरे गुरु श्री सरसदेव हैं, जो वृन्दावन में वास करते हैं एवं मुझे दीक्षा देने तथा अपना दास बनाने वृन्दावन से चले आ रहे हैं।"
इस मधुर वाणी को सुनकर सभी संत आश्चर्यचकित हुए एवं वे भी श्री सरसदेव जी के दर्शनों के लिए वहीँ रुक गए ।
2 दिन बाद श्री सरसदेव आये। श्री नरहरिदेव को सुचना मिली की गुरुदेव ग्राम के समीप आ गए हैं तो एक योजन तक दौड़ते हुए श्री गुरुके चरणों में गिर कर रज में लोटने लगे। महंत मुरारी जी भी सब संतों के संग नरहरिदेव के पीछे दौड़ते हुए श्री सरसदेव जी के चरणों में उपस्थित हुए। श्री सरसदेव ने नरहरिदेव को उठा कर ह्रदय से लगा लिया एवं उनके घर में पधारे।
पूरे ग्राम में उत्सव होने लगा। श्री सरसदेव जी ने नरहरिदेव को दीक्षा प्रदान कर शिष्य बनाया एवं पुनः वृन्दावन पधारे।
वृन्दावन आगमन:
कुछ समय उपरांत श्री नरहरिदेव भी घर संसार छोड़ वृन्दावन आ गए एवं गुरु के चरणों में पहुंचे। श्री सरसदेव ने जब नरहरिदेव को देखा तो अतिप्रसन्न हुए एवं उन्हें निधिवन की गद्दी पर विराजमान किया।
आप बहुधा वृन्दावन में ही रहते थे, पर कभी लोककल्याण की भावना से बुन्देलखण्ड भी चले जाते थे। एवं जब वृन्दावन आते तब वृन्दावन की सीमा पर साष्टांग प्रणाम करते, क्यूंकि वे वृन्दावन के प्रत्येक जीव को श्री राधा कृष्ण रूप में ही देखते थे।
श्री नरहरिदेव जी संत सेवा करते हुए भी सदैव अपने सखी स्वरुप से दिव्य वृन्दावन में श्री स्वामी हरिदास जी एवं अपने गुरु संग श्री कुञ्ज बिहारी बिहारिणी जू को लाड़ लड़ाते। श्री नरहरिदेव नित्य ही भक्ति रस में डूबे रहते, वे जहाँ भी जाते थे अपने ठाकुर श्री गोरेलाल जी को अपने पास ही रखते। ठाकुर सेवा करना, संत सेवा करना, संतो का उच्छिष्ठ पाना एवं संतों का चरणामृत लेना, इसी में अपने को सुखी एवं धन्य मानते थे। वे कभी भी संतो की जाती नहीं देखते थे, सब संतों की सेवा करते थे।
जब वह वृंदावन आए तो उन्होंने ब्राह्मण होते हुए भी यज्ञोपवीत को तोड़ दिया, यह मानकर कि यह वेदिक कर्म इस भक्ति रस में बाधक हैं। लोक वेद की विधि एवं मर्यादाएँ भी त्याग कर शुद्ध भजन रीति से प्रिया लाल को लाड़ लड़ाते थे।
ब्रजवासियों से आप बड़ा प्रेम करते थे और यदि उनसे कोई वस्तु लेते तो चौगुना-अठगुना मूल्य केवल इसी भावना से दे देते कि कुछ उनकी सेवा हो सके। ऐसा माना जाता है कि स्वामी नरहरिदेव जी का इतना प्रताप था कि इनके समीप आते ही पापियों का कल्याण हो जाता था।
स्वामी नरहरिदेवजी भी अपने पूर्वज गुरुजनों स्वामी हरिदास, श्री विट्ठल विपुल देव, श्री बिहारिन देव एवं श्री सरस देव जी की भाँति अनन्यरसिक और नित्यकेलि के सुदृढ़ उपासक थे।
श्रीगोविन्ददासजी ने आपकी प्रशंसा करते हुए लिखा है:
"श्रीकुंजविहारीदास आस दूजी नहिं कीनी।
हरितन सन्मुख भये पीठि सब जग को दीनी॥
हरिभक्तन सौ पाँति जाति-कुल धर्म न मान्यौ।
पावत महाप्रसाद विदित सब जग में जान्यौ॥
लोक-वेद सों ना डरें विमुखन सों नहि दीनता।
श्रीस्वामी नरहरिदास की देखी बड़ी अनन्यता॥
शिष्य परंपरा :
श्री नरहरिदेव जी के 2 प्रमुख शिष्य हुए, श्री रसिकदास एवं श्री केशवदास। श्री रसिकदास बड़े थे एवं गुरु के उपरांत गद्दी पर बैठे। ऐसा माना जाता है कि श्री बिहारीजी ने ही श्री नरहरिदेव जी को श्री रसिक दास जी को शिष्य बनाने के लिए कहा था।
ऐसा माना जाता है कि एक बार श्री नरहरिदेव जी बुंदेल खंड में थे, इतनी विरक्त अवस्था में रहते थे की अचानक वृक्ष की डाल से माथा टकरा गया, जिससे इनके माथे पर चोट लग गयी, परंतु उन्हें पता भी ना चला, तो कोसों दूर होते हुए भी श्री रसिक देव जी जो इतने गुरु भक्त थे कि उन्हें अंदर से मालूम पड़ गया, और उन्होंने कष्ट से अपना माथा पकड़ लिया और कहने लगे की हमारे गुरु को चोट लग गयी और व्याकुल हो उठे।
एक बार कुछ शिष्यों ने आपको गर्म दूध पिला दिया जिससे आपके मुख में छाले हो गए, और इधर श्री रसिक देव जी यहाँ व्याकुल हो उठे की हमारे गुरु के मुख में छाले हो गए।
श्री नरहरिदेव जी के बहुत ही अंतरंग शिष्य माने जाते थे श्री रसिक देव। श्री रसिक देव जी के ही 52 शिष्य हुए हैं जिनमें श्री ललित किशोरी देव [टटिया स्थान], श्री पीताम्बर देव [श्री रसिक बिहारी मंदिर] एवं श्री गोविंद देव [गोरे लाल जी की कुंज] प्रमुख हुए।
ग्रन्थ रचना :
आपके द्वारा रचित पद श्री नरहरिदेव जू की वाणी में संकलित है।
एक समय की बात है, निधिवन में श्री सरसदेव जी विराजमान थे एवं समस्त शिष्य एवं भक्त गण भी चरणों में बैठे थे। सब शिष्यों ने प्रीती पूर्वक आचार्य के चरणों में एक प्रश्न निवेदन किया।
"हे प्रभु, अब आप एक ऐसा शिष्य कीजिये जो आप पर अपना तन-मन-प्राण न्योंछावर कर दे, और जो आगे स्वामी श्री हरिदास की प्रशंशित गद्दी पर विराजमान हो सबका कल्याण करे।"
स्वामी श्री सरसदेव ने संतों की मृदु वाणी को सुनकर कहा की
"हे संत एवं भक्त गण, मेरी बात को ध्यान पूर्वक सुनो: बुंदेलखंड नामक देश में धसान नदी के किनारे एक गांव है जिसका नाम गूढ़ा है। इसी स्थान पर विश्वामित्र जी ने तप किया था एवं श्री हरी ने इन्हें वहाँ आकर दर्शन दिए थे। उस गांव में विप्रवर श्री विष्णुदास जी रहते हैं जिनके यहाँ एक पुत्र का प्राकट्य हुआ है जिसका नाम नरहरिदेव है, यही बालक मेरी आज्ञा से श्री कुँज बिहारी बिहारिणी जू का भजन करते हुए इस गद्दी पर आरूढ़ होगा।"
इस वचन को सुन समस्त संत एवं भक्त गण बहुत प्रसन्न हुए।
जन्म :
बुन्देलखण्ड में धसान-नदी के किनारे गूढ़ा नामक गाँव में विष्णुदास नामक एक धनी विप्र निवास करते थे। उन पर इतना अधिक धन था कि ओरछा-नरेश से उनका लेन-देन होता रहता था। किन्तु श्री विष्णुदास एवं उनकी पत्नी उत्तमादेवी बिना संतान के अति दुखी थे। दोनों दम्पति श्री सनकादिकों के तपः स्थली में आकर श्री सनकादिकों की प्रसन्नता के लिए दिन-रात भजन करने लगे। इनकी सच्ची प्रीती को समझ कर सनकादिक प्रसन्न हुए एवं दम्पति के स्वप्न में आकर इन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा
"तुम्हें एक पुत्र होगा जो रसनिधि पुरुषोत्तम का अवतार होगा"
जागने पर दोनों दम्पति अति प्रसन्न हुए एवं अपने घर को लौट आए। एक वर्ष पश्चात् उनके यहाँ ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया को एक अति तेजस्वी पुत्र हुआ जिसका कालांतर में नरहरिदेव नाम हुआ।
बाल्यकाल :
श्री नरहरिदेव नित्य ही ग्रन्थ पाठ करते। इनकी उदारता के कारण इनके द्वार पर अनेक संत आते एवं नरहरिदेव सब संतों की सेवा करते। अनेक प्रकार के व्यंजन बनाते एवं संतों को प्रेम से खिलाते और स्वयं उनका सीत प्रसाद पाते तथा जल के स्थान पर उनके चरण प्रक्षालन कर चरणामृत ग्रहण करते। श्री नरहरिदेव संतों के संग में सुख अनुभव करते एवं उनके कृपा एवं आशीर्वाद में ही जीवन यापन करते।
सुखजी नाम का एक वणिक था जिसे कुष्ट रोग हो गया था। उसके शरीर से दुर्गन्ध आने लगी जिससे उसके स्वजन और स्नेहीजन भी उससे दूर रहने लगे। सुखजी बहुत दुखी हुए और विचार किया की भगवन जगन्नाथ ही मुझे इस रोग से मुक्ति दिला सकते हैं। वह जगन्नाथपुरी गया और वहां रोग निवारण के लिए अनशन करके बैठ गया। 5 दिन बीत गए तब भगवान जगन्नाथ ने अपने सेवक द्वारा सूचना भेजी। सेवक सुखजी पास आया और भगवान जगन्नाथ का आदेश सुनाने लगा।
भगवान जगन्नाथ ने कहा "तुम्हारे रोग का निवारण यहाँ नहीं है, तुम गूढ़ा ग्राम में चले जाओ, वहां एक विप्र रहते हैं जिनका नाम विष्णुदास है, उनके यहाँ मैंने पुत्र रूप में अवतार लिया है, जिनका नाम नरहरिदास है, उनके चरणामृत से जब तुम स्नान करोगे तो तुम्हारा कुष्ट रोग दूर हो जायेगा।"
यह सुनकर सुखजी गूढ़ा ग्राम आए और बालक श्री नरहरिदास के चरणों में श्री जगन्नाथ जी का आदेश निवेदित किया। श्री नरहरिदास ने अपना चरणामृत दिया और सुखजी ने उससे स्नान किया जिसके फलस्वरूप उसका कुष्ट रोग दूर हो गया। श्री नरहरिदास जी का यह चरित्र सर्वत्र फ़ैल गया।
अध्यात्म जीवन एवं वैष्णवी दीक्षा :
एक बार महन्त मुरारिदास चार सौ सन्तों की जमात लेकर आपके घर पधारे। उनकी रसोई में वड़ा बनाने को 10 मन उड़द की दाल तत्काल भिगोई गई। पर इतने कम समय में दाल को पीसे कौन ? रसोईवाले बड़े असमंजस में थे कि क्या करें ? किन्तु श्रीनरहरिदास को तनिक भी चिन्ता न थी। दाल भीग जाने पर लोगों ने देखा कि चार सन्त आए (जो वास्तव में सनकादिक मुनि थे) और चार घड़ी में ही 10 मन दाल को पीस कर अन्तर्धान हो गए। श्री नरहरिदेव ने पीसी हुई दाल से दही वड़ा बनाया और जुगल किशोर को भोग लगा कर संतों को परोसा। सब सन्तों ने बड़े प्रेमसे प्रसाद पाया और आपस में कहने लगे की ऐसा स्वादिष्ट प्रसाद तो हमने जीवन में कभी नहीं पाया।
श्री सनकादिक अपने लोक को पधारे एवं किसी-किसी भाग्यशाली संत ने उनका दर्शन किया। श्री नरहरिदेव के इस चरित्र को देख महंत मुरारी जी अति प्रसन्न हुए एवं नरहरीदेव को आलिंगन प्रदान कर कहने लगे
"आपके गुरु कौन हैं"
श्री नरहरिदेव ने कहा "मेरे गुरु श्री सरसदेव हैं, जो वृन्दावन में वास करते हैं एवं मुझे दीक्षा देने तथा अपना दास बनाने वृन्दावन से चले आ रहे हैं।"
इस मधुर वाणी को सुनकर सभी संत आश्चर्यचकित हुए एवं वे भी श्री सरसदेव जी के दर्शनों के लिए वहीँ रुक गए ।
2 दिन बाद श्री सरसदेव आये। श्री नरहरिदेव को सुचना मिली की गुरुदेव ग्राम के समीप आ गए हैं तो एक योजन तक दौड़ते हुए श्री गुरुके चरणों में गिर कर रज में लोटने लगे। महंत मुरारी जी भी सब संतों के संग नरहरिदेव के पीछे दौड़ते हुए श्री सरसदेव जी के चरणों में उपस्थित हुए। श्री सरसदेव ने नरहरिदेव को उठा कर ह्रदय से लगा लिया एवं उनके घर में पधारे।
पूरे ग्राम में उत्सव होने लगा। श्री सरसदेव जी ने नरहरिदेव को दीक्षा प्रदान कर शिष्य बनाया एवं पुनः वृन्दावन पधारे।
वृन्दावन आगमन:
कुछ समय उपरांत श्री नरहरिदेव भी घर संसार छोड़ वृन्दावन आ गए एवं गुरु के चरणों में पहुंचे। श्री सरसदेव ने जब नरहरिदेव को देखा तो अतिप्रसन्न हुए एवं उन्हें निधिवन की गद्दी पर विराजमान किया।
आप बहुधा वृन्दावन में ही रहते थे, पर कभी लोककल्याण की भावना से बुन्देलखण्ड भी चले जाते थे। एवं जब वृन्दावन आते तब वृन्दावन की सीमा पर साष्टांग प्रणाम करते, क्यूंकि वे वृन्दावन के प्रत्येक जीव को श्री राधा कृष्ण रूप में ही देखते थे।
श्री नरहरिदेव जी संत सेवा करते हुए भी सदैव अपने सखी स्वरुप से दिव्य वृन्दावन में श्री स्वामी हरिदास जी एवं अपने गुरु संग श्री कुञ्ज बिहारी बिहारिणी जू को लाड़ लड़ाते। श्री नरहरिदेव नित्य ही भक्ति रस में डूबे रहते, वे जहाँ भी जाते थे अपने ठाकुर श्री गोरेलाल जी को अपने पास ही रखते। ठाकुर सेवा करना, संत सेवा करना, संतो का उच्छिष्ठ पाना एवं संतों का चरणामृत लेना, इसी में अपने को सुखी एवं धन्य मानते थे। वे कभी भी संतो की जाती नहीं देखते थे, सब संतों की सेवा करते थे।
जब वह वृंदावन आए तो उन्होंने ब्राह्मण होते हुए भी यज्ञोपवीत को तोड़ दिया, यह मानकर कि यह वेदिक कर्म इस भक्ति रस में बाधक हैं। लोक वेद की विधि एवं मर्यादाएँ भी त्याग कर शुद्ध भजन रीति से प्रिया लाल को लाड़ लड़ाते थे।
ब्रजवासियों से आप बड़ा प्रेम करते थे और यदि उनसे कोई वस्तु लेते तो चौगुना-अठगुना मूल्य केवल इसी भावना से दे देते कि कुछ उनकी सेवा हो सके। ऐसा माना जाता है कि स्वामी नरहरिदेव जी का इतना प्रताप था कि इनके समीप आते ही पापियों का कल्याण हो जाता था।
स्वामी नरहरिदेवजी भी अपने पूर्वज गुरुजनों स्वामी हरिदास, श्री विट्ठल विपुल देव, श्री बिहारिन देव एवं श्री सरस देव जी की भाँति अनन्यरसिक और नित्यकेलि के सुदृढ़ उपासक थे।
श्रीगोविन्ददासजी ने आपकी प्रशंसा करते हुए लिखा है:
"श्रीकुंजविहारीदास आस दूजी नहिं कीनी।
हरितन सन्मुख भये पीठि सब जग को दीनी॥
हरिभक्तन सौ पाँति जाति-कुल धर्म न मान्यौ।
पावत महाप्रसाद विदित सब जग में जान्यौ॥
लोक-वेद सों ना डरें विमुखन सों नहि दीनता।
श्रीस्वामी नरहरिदास की देखी बड़ी अनन्यता॥
शिष्य परंपरा :
श्री नरहरिदेव जी के 2 प्रमुख शिष्य हुए, श्री रसिकदास एवं श्री केशवदास। श्री रसिकदास बड़े थे एवं गुरु के उपरांत गद्दी पर बैठे। ऐसा माना जाता है कि श्री बिहारीजी ने ही श्री नरहरिदेव जी को श्री रसिक दास जी को शिष्य बनाने के लिए कहा था।
ऐसा माना जाता है कि एक बार श्री नरहरिदेव जी बुंदेल खंड में थे, इतनी विरक्त अवस्था में रहते थे की अचानक वृक्ष की डाल से माथा टकरा गया, जिससे इनके माथे पर चोट लग गयी, परंतु उन्हें पता भी ना चला, तो कोसों दूर होते हुए भी श्री रसिक देव जी जो इतने गुरु भक्त थे कि उन्हें अंदर से मालूम पड़ गया, और उन्होंने कष्ट से अपना माथा पकड़ लिया और कहने लगे की हमारे गुरु को चोट लग गयी और व्याकुल हो उठे।
एक बार कुछ शिष्यों ने आपको गर्म दूध पिला दिया जिससे आपके मुख में छाले हो गए, और इधर श्री रसिक देव जी यहाँ व्याकुल हो उठे की हमारे गुरु के मुख में छाले हो गए।
श्री नरहरिदेव जी के बहुत ही अंतरंग शिष्य माने जाते थे श्री रसिक देव। श्री रसिक देव जी के ही 52 शिष्य हुए हैं जिनमें श्री ललित किशोरी देव [टटिया स्थान], श्री पीताम्बर देव [श्री रसिक बिहारी मंदिर] एवं श्री गोविंद देव [गोरे लाल जी की कुंज] प्रमुख हुए।
ग्रन्थ रचना :
आपके द्वारा रचित पद श्री नरहरिदेव जू की वाणी में संकलित है।

