कोटिक तीरथ न्हाइप, कोटिक करौ उपाव।
पैवो नाहिंन विपिन सुख, बिना सहचरी भाव॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (72)
चाहे कोटि-कोटि तीर्थों में स्नान करो और चाहे करोड़ों उपाय कर लो, परन्तु श्री राधा की सहचरी बनकर ही वृन्दावन का पूर्ण रस प्राप्त होता है।
पैवो नाहिंन विपिन सुख, बिना सहचरी भाव॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (72)
चाहे कोटि-कोटि तीर्थों में स्नान करो और चाहे करोड़ों उपाय कर लो, परन्तु श्री राधा की सहचरी बनकर ही वृन्दावन का पूर्ण रस प्राप्त होता है।

