श्री रूपसखी जी की जीवनी

श्री रूपसखी जी की जीवनी

जन्म एवं अध्यात्म :
श्री रूपसखी जी का जन्म बुन्देलखण्ड में हुआ। हरिदासी सम्प्रदाय के श्रीस्वामी रसिकदेव जी के चरणों में आपकी असीम प्रीति थी जो आपके गुरु थे । आप अहर्निश सखीस्वरूप से नित्यविहार की भावना परिचर्या में तत्पर तल्लीन रहते थे। रसिक अनन्य जनों में अगाध प्रेम निष्ठा थी। इसलिए आपकी वाणी और रसानुभव अत्यन्त सरस हैं तथा उसमें विनम्रता, सरलता और कृतज्ञता आदि विशेष गुण हैं। अपने गुरु भाई श्री ललितकिसोरी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए आपने कहा है

श्री ललितकिसोरी की कृपा, पायौ नित्य बिहार।
रसिक सिरोमनि महल कौ, आनन्द अमित अपार॥
हौं बड़भागी इन सरन, श्री स्वामी मो आस।
अघट भंडार दियौ जु मो, जाकौ अंत न नास॥


सिद्ध देह (सखी स्वरूप) का प्रादुर्भाव :
एक बार श्री रूपसखी जी अखंड वृन्दावन वास करते हुए गुरु द्वारा प्रदत्त नाम का अखंड स्मरण कर रहे थे। वे तमाल वृक्ष के निचे बैठे थे, वस्त्र के नाम पर अंग पर एकमात्र कौपीन थी, माथे पर तिलक था, करुवा पास में था, और नाम का स्मरण करते-करते श्री रूपसखी जी समाधी अवस्था को प्राप्त हो गए एवं देखते हैं की उनके शरीर से एक दिव्य सखी स्वरुप का प्राकट्य हुआ और वह सखी सामने खड़ी हो गई। श्री रूपसखि अब सखी स्वरुप में स्थित थे एवं उनका स्थूल शरीर तमाल वृक्ष के निचे आसन पर जड़वत बैठा था।
श्री रूपसखी अपने दिव्य सखी देह का अवलोकन करते हैं, जो षोड़श वर्षीय किशोरी थी, समस्त आभूषणों से अलंकृत है। कानों में सुन्दर कुण्डल है, आँखों में बड़ी-बड़ी काजल लगी है, सिर पर चन्द्रिका विराजमान है एवं शरीर पर बहुत ही सुन्दर साड़ी सुशोभित है जिससे प्रकाश निकल रहा है।
श्री रूपसखी अपने दिव्य सखी स्वरुप में स्थित ठुमकते हुए यमुना के किनारे चल रही हैं, मार्ग में दिव्य स्वर्णमयी रज बिछी हुई है एवं सुन्दर-सुन्दर मालती, माधुरी एवं चंपा आदि लताओं से उस दिव्य स्थान की सुन्दर आभा प्रकट हो रही है। श्री रूपसखी आगे चल कर रंग महल में प्रवेश करतीं हैं। जैसे ही वे रंग महल के द्वार पर पहुँचतीं हैं, वे देखती हैं की रंग महल के भीतर श्री कुञ्ज बिहारी बिहारिणी जू विराजमान हैं एवं ललिता विशाखा आदि अष्ट सखियों सहित अनंत सखी समूह श्री प्रिया प्रियतम की जय जयकार कर रहीं हैं।
श्री रूप सखी रंग महल के द्वार पर दोनों हाथ जोड़े भीतर प्रवेश की आज्ञा की मुद्रा में खड़ी हैं। श्री प्रिया जी के संग सिंहासन पर विराजमान श्री लाल जी ने कहा
"अरि देखो देखो, यह द्वार पर कौन है जो भीतर प्रवेश करना चाहती है, रोको रोको इसे। यह कहाँ से आयी है, कौन है, इसका क्या नाम है तथा यह किसकी है।"
सब सखियों के मौन रहने पर श्री रूपसखी ने उत्तर दिया

"मति अकुलाउ हाव - भाव निजु चाव चहो,
नाना गति मति चारु चकरी लों फेरी हौं।
बार - बार कहा कुंज - द्वार बात पूछत हो,
स्वामी हरिदास की खवासनि की चेरी हौं॥"

- श्री रूपसखी
"हे लाल जी, हे प्राण नाथ, आप अकुलायें नहीं, आप मेरा परिचय जानना चाहते हैं न ,अनेकों स्थानों के चक्कर काटते-काटते आपके महल का आश्रय प्राप्त हुआ है। आप बार-बार क्यों पूछते हो की कुञ्ज के द्वार पर यह कौन आयी है, मैं श्री स्वामी हरिदास जी के खवासिन (अनुगमन करने वाली अथवा शिष्य) स्वामी रसिकदेव की चेरी (अनुगमन करने वाली अथवा शिष्य) हूँ।"

ग्रन्थ रचना :
श्री रूपसखी जी के रचित पद श्री रूपसखी जी की वाणी नामक ग्रन्थ में संकलित हैं जो दो भागों में विभाजित है - सिद्धान्त साहित्य एवं रस साहित्य।
सिद्धान्त-साहित्य में स्वामी श्री हरिदास जी तथा अन्य आचार्यों के प्रति श्री रूपसखी जी की अनन्य निष्ठा का पूरा आभास मिलता है। इसमें श्री बिहारी जी महाराज का यश, श्री स्वामी जी का यश, स्वामी श्री बिहारिनदेव जी (श्री गुरुदेव) की वाणी की स्तुति, श्री रसिकदेव जी की महिमा, भजन-सत्संग महिमा, आदि विषयों का वर्णन किया गया है। अपने ऊपर स्वामी श्री ललित किशोरीदेव जी की कृपा का भी आपने बड़ी श्रद्धा से उल्लेख किया है। क्योंकि उनकी कृपा से ही इन्हें नित्य-विहार प्राप्त हुआ था।
रस-साहित्य में श्री श्यामा श्याम के रूप-सौन्दर्य, आसक्ति, प्रगाढ़ प्रेम, और केलि विलास आदि का अद्भुत वर्णन है। रूपांकन में श्री रूपसखी जी ने श्री प्रिया-प्रियतम के नयनों की रस माधुरी का बड़ा विशद और हृदय ग्राही चित्रण किया है। सूर की भाँति आप भी नेत्रों के हाव-भाव लीला विलासों पर पदों और छंदों की झड़ी सी लगाते हैं। नयनों से सम्बन्धित अनेक रूपक आपने बाँधे हैं। इस विषय पर आपके कवित्त विशेष रूप से चित्ताकर्षक हैं। रास, होली और हिंडोला आदि के भी सरस-सुमधुर वर्णन आपके काव्य में उपलब्ध हैं।
रूपसखी जी की भाषा बड़ी प्रवाह पूर्ण और सरस है। उनमें उक्तिवैचित्र्य एवं वाक् विदग्धता दर्शन भी अनेक स्थलों पर होते हैं। वृन्दावनवासी रसिकों को ही सच्चा "रजपूत" बताते हुए इन्होंने लिखा है

“वृन्दाबनधाम अभिराम नाम साँचे रचे, रज में परे हैं तेई बड़े रजपूत हैं।"

रसिकों द्वारा श्री रूपसखी के स्वरुप का वर्णन :

श्री स्वामी किशोरदास जी ने आपके स्वरूप का वर्णन किया है
रूपसखी वैराग्य स्वरूपा। रसिक अनन्य प्रवीन अनूपा।
रसिक चरन के दृढ़ व्रत धारी। सेये अति उनमत्त बिहारी॥


श्री जमुनादास जी ने वर्णन किया है
स्वामी रसिक देव के चेला। रूप रसिकबर भये नवेला॥
बानी अतिही मृदु रस सानी। रूप रंग मिलि सुरति बखानी॥


विराजमान काल :
श्री रूपसखी जी लगभग सं 1773 तक विराजते हुए रस-माधुरी का वितरण करते रहे। श्री रूप सखी जी को आज भी वृंदावन में उत्सवों में याद किया जाता है एवं पर उनके पदों का गान किया जाता है ।

श्री रूप सखी जी का एक प्रसिद्ध पद:

कीजै रंगमहल की दासी।
स्यामा स्याम केलि अवलोकौं श्रीहरिदासी पासी।।
बिबिध बिहार सार सुख सजनी बिपुल बिहारिनि आसी।
सरस नागरी नरहरि रसिक ललित जु चरन उपासी।।
वृन्दावन की सहज माधुरी श्रीस्वामी परकासी।
रूप अनूप निरखि छबि अद्भुत महामधुर मृदु हासी।।