प्यारी तेरे ललित चरन पिय वंदै-  श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (514)

प्यारी तेरे ललित चरन पिय वंदै- श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (514)

(राग विहागरौ)
प्यारी तेरे ललित चरन पिय वंदै ।
कोटि इंदु वदनारबिंद दुति देत चिनौती चंदै ।। [1]
अरुन अधर लोचन रतनारे जीतैं चाल गयंदै ।
रूप रसिक वृन्दावन रानी मोद सदा आनंदै ।। [2]
- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (514) 

हे श्री राधा प्यारी आपके ललित चरणों का श्री श्यामसुंदर भी वंदन करते हैं । आपके वदनारबिंद की दुति पर कोटी कोटी चंद्रमा के प्रदीपन को न्यौछावर किया जा सकता है। [1]

आपके अधर अरुण हैं, नेत्र रतनारे हैं, एवं चाल को देखकर मदमत्त हाथी भी लज्जित हो जाता है ।श्री रूप सखी जी कहते हैं कि श्री राधा रानी वृंदावन धाम की महारानी हैं जो सदा ही अपने आश्रित रसिक जनों पर रस बरसाती हैं एवं नित्य ही आनंदित रहती हैं । [2]