परिचय :
श्री सरसदेव जी अपने पूर्वाचार्यों के समान ही सरस एवं परम रसिक अनन्य हुए हैं जो सदैव श्री श्यामा कुँजबिहारी को अपने ह्रदय में बसाये रहते। जीव मात्र इनका मित्र था, पर्वत राज के समान भारी होते हुए भी स्वयं को लघु मानते थे। आकाश के समान स्वच्छ एवं ह्रदय की गहराइयों में प्रेम समाये हुए घने बादलों के समान करुणा बरसानेवाले थे। ये समुद्र के समान गंभीर, पृथ्वी के समान क्षमाशील तथा जल के समान नम्र थे। इनका शरीर अग्नि के समान तेजस्वी तथा पवन के समान स्वछन्द था। नित्य विहार केलि के मूर्तिमान रस रूप थे। इनकी ऑंखें कमल की कोमल पंखुड़ियों के समान विशाल थे एवं जब मुख से कुछ कहते तो लगता वाणी से पुष्प झर रहे हैं। चंद्र के समान शीतल एवं सूर्य के समान प्रकाशवान थे। रसिक भक्तगण सहज ही इनके पास आते एवं इष्ट के रस में डूबते-उतराते।
श्री सरसदेव श्री स्वामी हरिदास कुल के महंतमणि थे जिन्होंने अखंड वृन्दावन वास किया। नित्य विहार रस का उल्लास ही इनका सुख था।
जन्म :
श्री सरसदेव भक्तवर श्री नागरीदास के छोटे भाई थे। वे बंगाल के राज्य मंत्री कमलापति के छोटे पुत्र थे। वे भी नागरीदास जी की तरह श्री बिहारिनदास जी के शिष्य हुए थे। वे परम भक्त, श्यामा श्याम के अनन्य उपासक तथा संतों एवं रसिक जनों के सर्वस्व थे ।
श्री सरसदेव का जन्म सं० 1611 की आश्विन पूर्णिमा को हुआ था।
सोरहसै इकदस की साला। क्वार मास पून्यौ सुख काला॥
सरद चंद पूरन ह्वै आयौ। सरसदेव को जन्म सुहायौ॥
- निजमत सिद्धांत, अवसान खंड
श्री सरसदेव 30 वर्ष तक घर पर रहे।
“तीस वर्ष लौं बसे सु गेहा”
- निजमत सिद्धांत, अवसान खंड
वृन्दावन आगमन एवं दीक्षा :
घर पर 30 वर्ष बिताने के बाद श्री सरसदेव जी अपने बड़े भाई श्री नागरीदास जी के संग वृन्दावन आ गए एवं श्री बिहारिन देव जी से दीक्षा प्राप्त की।
श्री सरसदेव जी 42 वर्ष तक वृंदावन में रहे थे।
द्वै चालीस वर्ष बनवासा। कीनौं निज गुरु धर्म प्रकासा॥
- निजमत सिद्धांत, अवसान खंड
शिष्य परंपरा :
श्री सरसदेव सिद्ध कोटि के महात्मा थे। उनके विषय में कहा जाता है कि उन्होंने अपने उत्तराधिकारी नरहरिदास का नाम बिना परिचय के ही घोषित कर दिया था। उनकी भविष्य वाणी अंत में अक्षरशः सत्य हुई थी। कथा इस प्रकार है -
एक समय की बात है, निधिवन में स्वामी हरिदासी कुल के चतुर्थ आचार्य श्री सरसदेव जी विराजमान थे एवं समस्त शिष्य एवं भक्त गण भी चरणों में बैठे थे। श्री सरसदेव जी वृद्ध हो गए थे लेकिन एक भी शिष्य नहीं किया। अब प्रश्न यह था की गद्दी पर आगे कौन विराजमान होगा। सब शिष्यों ने प्रीती पूर्वक आचार्य के चरणों में एक प्रश्न निवेदन किया।
"हे प्रभु, अब आप एक ऐसा शिष्य कीजिये जो आप पर अपना तन-मन-प्राण न्योंछावर कर दे, और जो आगे स्वामी श्री हरिदास की प्रशंशित गद्दी पर विराजमान हो सबका कल्याण करे।"
स्वामी श्री सरसदेव ने संतों की मृदु वाणी को सुनकर कहा की
"हे संत एवं भक्त गण, मेरी बात को ध्यान पूर्वक सुनो: बुंदेलखंड नामक देश में धसान नदी के किनारे एक गांव है जिसका नाम गूढ़ा है। इसी स्थान पर विश्वामित्र जी ने तप किया था एवं श्री हरी ने इन्हें वहाँ आकर दर्शन दिए थे। उस गांव में विप्रवर श्री विष्णुदास जी रहते हैं जिनके यहाँ एक पुत्र का प्राकट्य हुआ है जिसका नाम नरहरिदेव है, यही बालक मेरी आज्ञा से श्री कुँज बिहारी बिहारिणी जू का भजन करते हुए इस गद्दी पर आरूढ़ होगा।"
इस वचन को सुन समस्त संत एवं भक्त गण बहुत प्रसन्न हुए।
ग्रन्थ रचना :
श्री सरसदेव जी की वाणी में कवित्त, सवैया और पद मिलते हैं, जो परिमाण में नागरीदास जी से भी कम है। उनकी भाषा में ब्रज के साथ ही साथ अन्य क्षेत्रीय बोलियों तथा फारसी के भी कुछ शब्द हैं। इनसे उनकी बहुज्ञता तथा विद्वता का परिचय मीलता है।
लीला संवरण :
श्री सरसदेव जी 72 वर्ष की आयु में सं० 1683 की श्रावण पूर्णिमा को पार्थिव शरीर को त्याग कर निकुंज महल में प्रवेश किया। वे श्री बिहारिनदास जी के पश्चात् 24 वर्ष तक जीवित रहे थे। हरिदासी संप्रदाय के प्राचार्यों में उनका नाम अपने विनम्र स्वभाव और सत्संगप्रेमी होने के कारण प्रसिद्ध है।
वर्ष बहत्तर धरि सुभ देहा।
संवत सोरहसै तेरासी। निज तनु त्यागि भये सुख-रासी॥
सावन सुदि पुन्यौ तनु त्यागौ। सरसदेव निज बपु अनुराग्यौ॥
- निजमत सिद्धांत, अवसान खंड
श्री सरसदेव जी अपने पूर्वाचार्यों के समान ही सरस एवं परम रसिक अनन्य हुए हैं जो सदैव श्री श्यामा कुँजबिहारी को अपने ह्रदय में बसाये रहते। जीव मात्र इनका मित्र था, पर्वत राज के समान भारी होते हुए भी स्वयं को लघु मानते थे। आकाश के समान स्वच्छ एवं ह्रदय की गहराइयों में प्रेम समाये हुए घने बादलों के समान करुणा बरसानेवाले थे। ये समुद्र के समान गंभीर, पृथ्वी के समान क्षमाशील तथा जल के समान नम्र थे। इनका शरीर अग्नि के समान तेजस्वी तथा पवन के समान स्वछन्द था। नित्य विहार केलि के मूर्तिमान रस रूप थे। इनकी ऑंखें कमल की कोमल पंखुड़ियों के समान विशाल थे एवं जब मुख से कुछ कहते तो लगता वाणी से पुष्प झर रहे हैं। चंद्र के समान शीतल एवं सूर्य के समान प्रकाशवान थे। रसिक भक्तगण सहज ही इनके पास आते एवं इष्ट के रस में डूबते-उतराते।
श्री सरसदेव श्री स्वामी हरिदास कुल के महंतमणि थे जिन्होंने अखंड वृन्दावन वास किया। नित्य विहार रस का उल्लास ही इनका सुख था।
जन्म :
श्री सरसदेव भक्तवर श्री नागरीदास के छोटे भाई थे। वे बंगाल के राज्य मंत्री कमलापति के छोटे पुत्र थे। वे भी नागरीदास जी की तरह श्री बिहारिनदास जी के शिष्य हुए थे। वे परम भक्त, श्यामा श्याम के अनन्य उपासक तथा संतों एवं रसिक जनों के सर्वस्व थे ।
श्री सरसदेव का जन्म सं० 1611 की आश्विन पूर्णिमा को हुआ था।
सोरहसै इकदस की साला। क्वार मास पून्यौ सुख काला॥
सरद चंद पूरन ह्वै आयौ। सरसदेव को जन्म सुहायौ॥
- निजमत सिद्धांत, अवसान खंड
श्री सरसदेव 30 वर्ष तक घर पर रहे।
“तीस वर्ष लौं बसे सु गेहा”
- निजमत सिद्धांत, अवसान खंड
वृन्दावन आगमन एवं दीक्षा :
घर पर 30 वर्ष बिताने के बाद श्री सरसदेव जी अपने बड़े भाई श्री नागरीदास जी के संग वृन्दावन आ गए एवं श्री बिहारिन देव जी से दीक्षा प्राप्त की।
श्री सरसदेव जी 42 वर्ष तक वृंदावन में रहे थे।
द्वै चालीस वर्ष बनवासा। कीनौं निज गुरु धर्म प्रकासा॥
- निजमत सिद्धांत, अवसान खंड
शिष्य परंपरा :
श्री सरसदेव सिद्ध कोटि के महात्मा थे। उनके विषय में कहा जाता है कि उन्होंने अपने उत्तराधिकारी नरहरिदास का नाम बिना परिचय के ही घोषित कर दिया था। उनकी भविष्य वाणी अंत में अक्षरशः सत्य हुई थी। कथा इस प्रकार है -
एक समय की बात है, निधिवन में स्वामी हरिदासी कुल के चतुर्थ आचार्य श्री सरसदेव जी विराजमान थे एवं समस्त शिष्य एवं भक्त गण भी चरणों में बैठे थे। श्री सरसदेव जी वृद्ध हो गए थे लेकिन एक भी शिष्य नहीं किया। अब प्रश्न यह था की गद्दी पर आगे कौन विराजमान होगा। सब शिष्यों ने प्रीती पूर्वक आचार्य के चरणों में एक प्रश्न निवेदन किया।
"हे प्रभु, अब आप एक ऐसा शिष्य कीजिये जो आप पर अपना तन-मन-प्राण न्योंछावर कर दे, और जो आगे स्वामी श्री हरिदास की प्रशंशित गद्दी पर विराजमान हो सबका कल्याण करे।"
स्वामी श्री सरसदेव ने संतों की मृदु वाणी को सुनकर कहा की
"हे संत एवं भक्त गण, मेरी बात को ध्यान पूर्वक सुनो: बुंदेलखंड नामक देश में धसान नदी के किनारे एक गांव है जिसका नाम गूढ़ा है। इसी स्थान पर विश्वामित्र जी ने तप किया था एवं श्री हरी ने इन्हें वहाँ आकर दर्शन दिए थे। उस गांव में विप्रवर श्री विष्णुदास जी रहते हैं जिनके यहाँ एक पुत्र का प्राकट्य हुआ है जिसका नाम नरहरिदेव है, यही बालक मेरी आज्ञा से श्री कुँज बिहारी बिहारिणी जू का भजन करते हुए इस गद्दी पर आरूढ़ होगा।"
इस वचन को सुन समस्त संत एवं भक्त गण बहुत प्रसन्न हुए।
ग्रन्थ रचना :
श्री सरसदेव जी की वाणी में कवित्त, सवैया और पद मिलते हैं, जो परिमाण में नागरीदास जी से भी कम है। उनकी भाषा में ब्रज के साथ ही साथ अन्य क्षेत्रीय बोलियों तथा फारसी के भी कुछ शब्द हैं। इनसे उनकी बहुज्ञता तथा विद्वता का परिचय मीलता है।
लीला संवरण :
श्री सरसदेव जी 72 वर्ष की आयु में सं० 1683 की श्रावण पूर्णिमा को पार्थिव शरीर को त्याग कर निकुंज महल में प्रवेश किया। वे श्री बिहारिनदास जी के पश्चात् 24 वर्ष तक जीवित रहे थे। हरिदासी संप्रदाय के प्राचार्यों में उनका नाम अपने विनम्र स्वभाव और सत्संगप्रेमी होने के कारण प्रसिद्ध है।
वर्ष बहत्तर धरि सुभ देहा।
संवत सोरहसै तेरासी। निज तनु त्यागि भये सुख-रासी॥
सावन सुदि पुन्यौ तनु त्यागौ। सरसदेव निज बपु अनुराग्यौ॥
- निजमत सिद्धांत, अवसान खंड

