घर घर टहल करत है लक्ष्मी - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी) की वाणी, छूटक पद (133)

घर घर टहल करत है लक्ष्मी - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी) की वाणी, छूटक पद (133)

घर घर टहल करत है लक्ष्मी, छिन कतहूं नहिं जाय।
व्रज वृन्दावन सुख वैभव लखि, मुक्ति रही सिरनाय॥

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (133)

ब्रज में स्वयं लक्ष्मीजी एक घर से दूसरे घर विचरण करती रहती हैं और कभी भी ब्रज से दूर नहीं जातीं। ब्रज-वृन्दावन की महिमा का वर्णन कौन कर सकता है, जहाँ मुक्ति भी सदा हाथ जोड़कर खड़ी रहती है।