सबकौ भाँवतौ राधावर - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (49)

सबकौ भाँवतौ राधावर - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (49)

(राग बिलावल)
सबकौ भाँवतौ राधावर।
पूत यशोदाकौ नँदनंदन व्रजलाड़िलौ स्यामसुन्दर॥ [1]
कुंजविहारी सदा सिंगारी, गावत नाचत सदा सुघर।
कोककला-कुल रसिकमुकुटमनि, वारिज मुख सुख सागर॥ [2]
महा पतित पावन चरनिनिके शरन रहत काकौ डर।
व्यास अनन्य रसिकमंडल कौ, पोषक मान सरोवर॥ [3]

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (49)

ब्रज के लाड़िले यशोदा पुत्र नंदनंदन राधावर श्री श्यामसुंदर की रूप माधुरी सबके हृदय को भाती है। [1]

कुंजबिहारी सदैव श्रृंगार संपन्न नाचते गाते ब्रज में घर-घर डोलते हैं, ये कोक कलाओं से सम्पन्न रसिक मुकुटमणि हैं जिनके मुख चंद्र के सुख सागर पर मैं स्वयं को न्योछावर करता हूँ। [2]

श्री हरिराम व्यास कहते हैं "जिन चरणों की कृपा से महा पतित भी पावन बन जाते हैं मैं उन्ही चरणों की शरण में हूँ, अब मुझे भला किस बात का भय? अनन्य रसिकों की मंडली के लिए तो यह चरण मान सरोवर के समान हैं जो नित्य रस ही बरसाते हैं ।”