आनँद की मूरति देखौ माई - श्री हित कमलनैन, श्री हित कमलनैन जी की वाणी, अष्टायामी पदावली (57)

आनँद की मूरति देखौ माई - श्री हित कमलनैन, श्री हित कमलनैन जी की वाणी, अष्टायामी पदावली (57)

आनँद की मूरति देखौ माई।
नन्दनन्दन-वृषभानुदुलारी, कैसैं रहे लपटाई॥ [1]
अंगनि-अंग अनंग विराजत, निरखि-निरखि मेरौ मन ललचाई।
जैश्रीकमलनैंन हित यह सुख नैंननि, संतत रहौ समाई॥ [2]

- श्री हित कमलनैन, श्री हित कमलनैन जी की वाणी, अष्टायामी पदावली (57)

अरे सखी, आनंद की मूर्ति श्री श्यामा श्याम को निहार, कैसा सुंदर दृश्य है जब यह एक दूसरे से लिपटे हुए हैं । [1]

इस दिव्य दम्पति के अंगों में प्रेम स्वरूपी अनंग विराजमान है जिसे निहार निहार कर मेरा मन ललचा रहा है । श्री हित कमल नैंन जी कहते हैं कि हित स्वरूप श्री श्यामा श्यामा को निहार कर मेरे नैंन नित्य ही शीतल [सुखी] बने हुए हैं । [2]