यह सब जानों भक्त के लच्छन - श्री सूरदास, सूर सागर

यह सब जानों भक्त के लच्छन - श्री सूरदास, सूर सागर

(राग नट)
यह सब जानों भक्त के लच्छन।
कोऊ निन्दो कोऊ बन्दो,
कोऊ मरि लेहु धन गच्छन॥ [1]
कोऊ एक आनि लगावत चन्दन,
डारि धूरि कोऊ देत है भच्छन।
कोऊ कहे मूरख महा अधर्मी,
कोऊ कहै यह बड़ौ विलच्छन॥ [2]
भली बुरी मन में नहीं आवैं,
कृष्ण चरन रति टरे न एक छिन।
'सूर' सुख दुःख जिनको नहिं,
ब्यापै तिनको गिरधर मिलै तत्छिन॥ [3]

- श्री सूरदास, सूर सागर

श्री सूरदास कहते हैं "यह सब भक्त के लक्षण हैं। कोई उनकी निंदा करता है तो कोई उनकी वंदना करता है, तथा कोई उनपर प्रहार कर उनका धन लेकर भाग सकता है।" [1]

कोई उन्हें चन्दन का तिलक लगाता है तो कोई उनपर धूल फेंक सकता है, कोई उन्हें भोजन देता है तो कोई उन्हें मूर्ख तथा महा अधर्मी कहता है, कोई उन्हें देख कर कहता है की ये बड़ा विलक्षण है। [2]

इतने पर भी उस भक्त के मन में अच्छी या बुरी भावना नहीं आती, वह अपना मन श्री कृष्ण के चरणों में ही लगाए रहता है, एक क्षण के लिए भी नहीं भूलता। श्री सूरदास कहते हैं की जो सुख दुःख से विचलित नहीं होता उसे तत्क्षण गिरिधर श्री कृष्ण मिल जाते हैं। [3]