बिगरी लेहि सँवारि कै, श्रीकुंजबिहारिनि बाल।
और न ऐसो करि सकै, अपने को प्रतिपाल॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (149)
नित्य निकुञ्जेश्वरी श्री श्यामा प्यारी का यह स्वभाव है कि वे अपने आश्रित जनों की बिगड़ी हुई बात को भी सुधारकर उसे स्वीकार कर लेती हैं। अपने जनों का इस प्रकार पालन करने वाला दूसरा कोई कहीं भी नहीं हो सकता।
और न ऐसो करि सकै, अपने को प्रतिपाल॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (149)
नित्य निकुञ्जेश्वरी श्री श्यामा प्यारी का यह स्वभाव है कि वे अपने आश्रित जनों की बिगड़ी हुई बात को भी सुधारकर उसे स्वीकार कर लेती हैं। अपने जनों का इस प्रकार पालन करने वाला दूसरा कोई कहीं भी नहीं हो सकता।

