हौं वृषभानु नन्दिनि भजौं।
जुगल की सहचरि कहावति माँहि मन के लजौं॥ [1]
रहत जद्यपि लाल ढिंग ही कुंवरि के दिनरात।
हौं न जानौं गौर छबि सों अटकि साँवर गात॥ [2]
करि अलिंगन रहत छिन-छिन लाल गोरी संग।
मम नैन मुख श्रीराधिका के नाँहि दूजौ अंग॥ [3]
तहाँ ही लपटी विलोकों लाल मन की प्रीति।
तासु नाते नन्द-सुत सों बन गयी कछु रीति॥ [4]
श्रीराधिकापदकमल बिनु मम ह्रदय नाँहिन और।
जै श्रीवंशीअलि कहत टेरें करत जग में रौर॥ [5]
- श्री वंशी अलि
श्री वंशी अली जी कहते हैं "युगल किशोर श्री राधा कृष्ण की सहचरी कहाने से मेरे मन में लाज आती है, परन्तु सत्य यह है की मैं तो श्री राधा का ही भजन करता हूँ।" [1]
यद्यपि श्री लाल जी सदैव श्री राधा के निकट ही रहते हैं लेकिन मैं तो केवल श्री किशोरी जी को ही जानता हूँ, सांवरे श्री कृष्ण को नहीं। [2]
श्री कृष्ण सदैव श्री राधा से आलिंगनबद्ध रहते हैं लेकिन मेरी आँखों को तो श्री राधिका के गौर अंगों के सिवा और कोई अंग दिखाई ही नहीं देता। [3]
श्री लाल जी के ह्रदय की प्रसन्नता के लिए श्री राधा उन्हें सदैव अपने ह्रदय से लगाए रहतीं हैं, इसी नाते से नन्द-नन्दन से मेरा कुछ रिश्ता बन गया है। [4]
श्री वंशी अली कहते हैं "मैं जग में गर्जना करके कहता हूँ की मेरे ह्रदय में श्री राधा के चरण कमलों के सिवा कोई नहीं है।" [5]
जुगल की सहचरि कहावति माँहि मन के लजौं॥ [1]
रहत जद्यपि लाल ढिंग ही कुंवरि के दिनरात।
हौं न जानौं गौर छबि सों अटकि साँवर गात॥ [2]
करि अलिंगन रहत छिन-छिन लाल गोरी संग।
मम नैन मुख श्रीराधिका के नाँहि दूजौ अंग॥ [3]
तहाँ ही लपटी विलोकों लाल मन की प्रीति।
तासु नाते नन्द-सुत सों बन गयी कछु रीति॥ [4]
श्रीराधिकापदकमल बिनु मम ह्रदय नाँहिन और।
जै श्रीवंशीअलि कहत टेरें करत जग में रौर॥ [5]
- श्री वंशी अलि
श्री वंशी अली जी कहते हैं "युगल किशोर श्री राधा कृष्ण की सहचरी कहाने से मेरे मन में लाज आती है, परन्तु सत्य यह है की मैं तो श्री राधा का ही भजन करता हूँ।" [1]
यद्यपि श्री लाल जी सदैव श्री राधा के निकट ही रहते हैं लेकिन मैं तो केवल श्री किशोरी जी को ही जानता हूँ, सांवरे श्री कृष्ण को नहीं। [2]
श्री कृष्ण सदैव श्री राधा से आलिंगनबद्ध रहते हैं लेकिन मेरी आँखों को तो श्री राधिका के गौर अंगों के सिवा और कोई अंग दिखाई ही नहीं देता। [3]
श्री लाल जी के ह्रदय की प्रसन्नता के लिए श्री राधा उन्हें सदैव अपने ह्रदय से लगाए रहतीं हैं, इसी नाते से नन्द-नन्दन से मेरा कुछ रिश्ता बन गया है। [4]
श्री वंशी अली कहते हैं "मैं जग में गर्जना करके कहता हूँ की मेरे ह्रदय में श्री राधा के चरण कमलों के सिवा कोई नहीं है।" [5]

