कोउ सुकिया, कोउ परकिया, कलपि किये मत बादि ।
जोरी भगवतरसिक की, नित्य अनंत अनादि ।। [1]
नित्य अनंत अनादि, लोक ते रीति विलक्षन ।
स्तृति-असतृती बिलगाइ, देखि अनुभव के अक्षम ।। [2]
सहज प्रेम माधुर्य रहत अनुरागे दोउ ।
ललिता सखी प्रसार, बिना तहॅ जात न कोउ ।। [3]
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (5)
किसी ने स्वकीया आरै परकीया (नायिका) के रूप में श्री प्रिया जी की कल्पना करके एक व्यर्थ का बखेड़ा सा खड़ा कर दिया है।भगवत रसिक जी कहते हैं कि हमारी प्रिया जी यानी यह रसिकों की जोड़ी एक क्षण को भी बिछुड़ नहीं सकती, यह नित्य, अनंत और अनादि है । [1]
इस जोड़ी की प्रीति रीति सांसारिक समस्त रीतियों से विलक्षण है । श्रुति स्मृतियों से अलग हटकर इन्हे अनुभव [प्रेम] की आँखो से देखो । [2]
श्री भगवत रसिक जी कहते है की ये दोनों प्रिया प्रियतम जहाँ सहज प्रेम की माधुरी में सतत अनुरक्त रहते हैं, वहाँ ललिता सखी (श्रीस्वामी हरिदास जी) की कृपा से ही वह जीव श्रीप्रियाप्रियतम के स्वरुप को जान सकता है और उन तक पहुँच सकता है । [3]
इस जोड़ी की प्रीति रीति सांसारिक समस्त रीतियों से विलक्षण है । श्रुति स्मृतियों से अलग हटकर इन्हे अनुभव [प्रेम] की आँखो से देखो । [2]
श्री भगवत रसिक जी कहते है की ये दोनों प्रिया प्रियतम जहाँ सहज प्रेम की माधुरी में सतत अनुरक्त रहते हैं, वहाँ ललिता सखी (श्रीस्वामी हरिदास जी) की कृपा से ही वह जीव श्रीप्रियाप्रियतम के स्वरुप को जान सकता है और उन तक पहुँच सकता है । [3]

