जो त्रिय होइ न हरि की दासी।
कीजै कहा रूप गुण सुन्दर, नाहिंन श्याम उपासी।।
तौ दासी गणिका सम जानो दुष्ट राँड़ मसवासी।
निसिदिन अपनों अंजन मंजन करत विषय की रासी।।
परमारथ स्वप्ने नहिं जानत अन्ध बंधी जम फाँसी।।
यदि ये तीन रसिक शिरोमणि संत स्वामी श्री हरिदास, श्री हित हरिवंश महाप्रभु, और रसिक अनन्य श्री हरिराम व्यास अवतार नहीं लेते, तो वृंदावन की माधुर्य भक्ति रस उसी प्रकार होता जैसे कि एक सुंदर महिला हो जिसमें समस्त अच्छे गुण तो विद्यमान हो परंतु वह कृष्ण की उपासना भक्ति न करती हो अर्थात् भक्ति रहित हो । वह स्त्री गणिका की उस दासी (वैश्या) के समान है जो प्रतिदिन केवल शारीरिक कामनाओं एवं विषय वासनाओं से ग्रस्त हो । ऐसी सुंदर स्त्री होते हुए भी वह परमाथ के विषय में स्वप्न में भी कुछ नहीं जानती, और यमराज के द्वारा प्रताड़ित किए जाने योग्य है, वह एक अंधे व्यक्ति को यमराज द्वारा फांसी पर लटकाए जाने के समान है।
कीजै कहा रूप गुण सुन्दर, नाहिंन श्याम उपासी।।
तौ दासी गणिका सम जानो दुष्ट राँड़ मसवासी।
निसिदिन अपनों अंजन मंजन करत विषय की रासी।।
परमारथ स्वप्ने नहिं जानत अन्ध बंधी जम फाँसी।।
यदि ये तीन रसिक शिरोमणि संत स्वामी श्री हरिदास, श्री हित हरिवंश महाप्रभु, और रसिक अनन्य श्री हरिराम व्यास अवतार नहीं लेते, तो वृंदावन की माधुर्य भक्ति रस उसी प्रकार होता जैसे कि एक सुंदर महिला हो जिसमें समस्त अच्छे गुण तो विद्यमान हो परंतु वह कृष्ण की उपासना भक्ति न करती हो अर्थात् भक्ति रहित हो । वह स्त्री गणिका की उस दासी (वैश्या) के समान है जो प्रतिदिन केवल शारीरिक कामनाओं एवं विषय वासनाओं से ग्रस्त हो । ऐसी सुंदर स्त्री होते हुए भी वह परमाथ के विषय में स्वप्न में भी कुछ नहीं जानती, और यमराज के द्वारा प्रताड़ित किए जाने योग्य है, वह एक अंधे व्यक्ति को यमराज द्वारा फांसी पर लटकाए जाने के समान है।

