​​नमो वनवृन्द अरविंद रससिंध कौ - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (6)

​​नमो वनवृन्द अरविंद रससिंध कौ - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (6)

(सवैया)
​​नमो वनवृन्द अरविंद रससिंध कौ, स्त्रवत मकरंद आनन्दकारी।
हरत मन नीलमनि जगमगत कनक दुति, चकाचौंध लषि चषत हारी॥ [1]
महेस और सेस ब्रह्मादि शुकमुनि सबै,  कोटि सत सारदा कहत हारी।
पार को पाइ है और अलबेली जहाँ, फिरत उन्मत्त तहां पीय प्यारी॥ [2]

- श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (6)

श्री वृन्दावन को प्रणाम है, जो रस-सागर का पूर्ण खिला हुआ कमल है, जहाँ से आनंद की अमृत-धारा निरंतर प्रवाहित होती रहती है। वहाँ नीलमणि श्रीकृष्ण का झिलमिलाता प्रकाश मन को मोहित कर लेता है, और श्रीराधा के स्वर्ण-ज्योति से नेत्र चकाचौंध हो उठते हैं। [1]

जिसकी महिमा का वर्णन करते-करते ब्रह्मा, महेश, शेषनाग, शुकदेव और अनगिनत शारदाएँ थक गईं, फिर उसका पार कौन पा सकता है? जहाँ श्री अलबेली राधा अपनी सखियों संग क्रीड़ा करती हैं, वहीं प्रिय श्रीकृष्ण संग नित्य विहार का रस बरसाती हैं। [2]