कुल रूप उज़ारी मेरी स्वामिनी - श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (25)

कुल रूप उज़ारी मेरी स्वामिनी - श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (25)

कुल रूप उज़ारी मेरी स्वामिनी ।
कंचन तन नीलांबर सोभित गुन निधि राधा नामिनी ।। [1]
कुंजमहल राजत मोहन सँग जैसे घन सँग दामिनी ।
गोविंदसरन कौं सरन राख अब हरि प्रीतम अभिरामिनी ।। [2]

- श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (25)

मेरी स्वामिनी समस्त रूप की उजियारी हैं । इनका कंचन [सोने] के समान तन है, नीलांबर वस्त्र अलंकृत हैं, एवं समस्त गुणों की निधि मेरी स्वामिनी हैं जिनका नाम राधा है । [1]

श्री राधिका ज़ू अपने प्रियतम मनमोहन संग कुंज महल में ऐसे विराजती हैं जैसे घन और दामिनी की जोरी होती है । श्री गोविंद शरण देवाचार्य जी कहते हैं कि “हे हरि प्रीतम की अभिरामिनी, मुझे अब अपनी शरण में रखिए” ।  [2]