पिय-प्यारी के पद-कमल - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन शत (38)

पिय-प्यारी के पद-कमल - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन शत (38)

पिय-प्यारी के पद-कमल, निसि-वासर करि ध्यान।
रे मन भजन-अनन्य में, मिलवहु मति कछु आन॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन शत (38)

श्री ध्रुवदास जी मन को सावधान करते हुए कहते हैं— ‘हे मन! तू श्री लाड़िली-लाल के चरण-कमलों का ही अहर्निश ध्यान करता रह और अनन्य-भजन की परिपाटी में अन्य किसी को सम्मिलित मत कर।’