कुल एवं माता पिता का परिचय :
नारनौल ग्राम में सांझापुर नामक स्थान है जहाँ एक गौड़ ब्राम्हण कुल के धर्मात्मा रहते थे जिनका नाम श्री चौबेलाल था। ये वेद शास्त्र के पूर्ण ज्ञाता थे तथा बहुत धनवान भी थे। इनका वंश चौबे नाम से विख्यात था। इनकी पत्नी का नाम श्रीमती रामकुँवरि था।
श्री चौबेलाल भगवान शिव एवं माता पारवती के भक्त थे। इनके गले में रुद्राक्ष की माला विराजमान रहती तथा मस्तक पर त्रिपुण्ड्र तिलक शोभीत रहता परन्तु वैष्णव के प्रति इनका आदर भाव न था। इनकी पत्नी रामकुँवरि श्री कृष्ण की परम भक्त थीं एवं अपने पति को हरिभक्ति से शून्य देख इन्हें चैन न था। इन्होंने विचार किया की कोई ऐसा उपाय किया जाये जिससे मेरे पति भी कृष्ण भक्त हो जाएँ।
एक दिन श्री रामकुँवरि श्री राधा कृष्ण के सुन्दर विग्रह को ले आयीं एवं घर में स्थापना कर अपने पति से छुप कर उनकी पूजा करतीं तथा श्री कृष्ण को ही अपना पति मानने लगीं।
श्री रामकुँवरि अब श्री कृष्ण से कहतीं "हे कृष्ण, आप मेरे पति हैं एवं मैं आपकी पत्नी हूँ, मुझे ऐसा पुत्र दीजिये जो आपके ही समान हो, क्यूँकि इस संसार में मेरा आपके सिवा और कौन है।"
इस प्रकार सदैव ही श्री रामकुँवरि श्री कृष्ण से विनती करतीं एवं प्रभु की छवि का दर्शन कर मन ही मन प्रफुल्लित होती।
दिव्य जन्म प्रसंग :
अब श्री रामकुँवरि जी की आयु 14 वर्ष हो गयी थी। एक दिन श्री कृष्ण उनके स्वप्न में आये और कहा "अब आपकी कामना पूर्ण होगी"
श्री रामकुँवरि स्वप्न में श्री कृष्ण के वचन सुनते ही जाग गयीं एवं प्रसन्नता से विचार करने लगी की अब हरि ने मुझपर दया की है एवं मेरी कामना की पूर्ति होगी।
श्री रामकुँवरि ने बिना पुरुष संसर्ग के ही दिव्य गर्भ धारण किया। जब इनकी सास एवं ननद को इनके गर्भ धारण की सुचना मिली तो परिवार के सभी लोग बड़े प्रसन्न हुए। घर के मंदिर में माता पार्वती का पूर्ण श्रृंगार किया गया एवं उनके दर्शन कर सभी को सुख अनुभव हो रहा है।
माता देवकी, यशोदा तथा कौशल्या के समान ही श्री रामकुँवरि के शरीर से तेज प्रकट होने लगा। घर में अनायास ही बिना किसी प्रयत्न अथवा उपाय के लाखों रुपये प्रकट होने लगे।
जब बालक के जन्म की तिथि आ पहुंची तो सभी लोगों के मन में उत्साह होने लगा।
श्री रामकुँवरि अति प्रसन्नता वश उठीं और घर के गौशाला में आ गयीं। भाद्र कृष्ण अष्टमी तिथि को संध्या समय पर गोशाला में श्री रामकुँवरि ने एक बालक को जन्म दिया। बालक की छवि श्री कृष्ण जैसी ही थी। सब नारियाँ गोशाला की ओर दौड़ीं और बालक समेत श्री रामकुँवरि को घर में ले आयीं। गांव के समस्त नर नारी उत्सव करने लगे। साधु महात्मा भी बालक के जन्म से बहुत प्रसन्न थे। बालक का नाम प्रयागदास रखा गया।
बालक प्रयागदास अब एक वर्ष का हो गया एवं गांव के सभी नर नारी इनके बाल लीलाओं से आनंदित होते। परिवार में जिस कार्य के लिए प्रयास किया जाता वो सफल हो जाता, गहरे शत्रु भी मित्र होने लगे।
श्री प्रयागदास का शरीर तेज पुंज के समान था एवं शरीर के प्रत्येक अंग सुगठित थे।
श्री प्रयागदास के ऐश्वर्य का एक प्रसंग (सिद्ध फकीर शाह हुसैन):
पंजाब में शाह हुसैन नाम के एक धैर्यवान सिद्ध फकीर थे जो एक कृष्ण भक्त थे। शाह हुसैन अति विवेकी एवं वैराग्यवान थे जो स्वछन्द रूप से विचरण करते। संतों के दर्शन से ही इन फकीर को आनंद होता। यह सुन्दर इमारतों से स्नेह करते एवं अपने सिद्धि के बल से जहाँ तहाँ घर बनवाते रहते। अपने आसन के निचे से अपार धन निकालते एवं बड़ी रूचि से भवन निर्माण करवाते एवं किसी गरीब को दे देते।
जो संत श्री हरि के विरह में डूबे रहते उनसे शाह फकीर बहुत प्रेम करते एवं उनकी सेवा करते। श्री कृष्ण के अनुरागी संतों को ये अपना इष्ट देव मानते थे। यद्यपि शाह हुसैन मुस्लिम थे लेकिन अपनी जाती धर्म को छोड़ कर वे कृष्ण भक्तों से प्रेम करते। इनकी सुन्दर वाणी से हरि विरह का भाव प्रकट होता जिसे सुनकर साधु, संत तथा महंत भी आनंदित होते।
शाह फकीर को अपने पिछले जन्म का ज्ञान था, भविष्य का भी ज्ञान था एवं वर्त्तमान में बड़ी सावधानी से रहते, कोई सम्मान करता तो ये उल्टा उसका सम्मान करते।
शाह फकीर परम प्रतापी महात्मा थे। निशिदिन कृष्ण नाम का जप करते। ये पंजाब से विचरण करते-करते साँझापुर आ गए। समस्त जन ऐसे सिद्ध फकीर के दर्शनों के लिए आने लगे। जो जैसी मनोकामना करता वो वैसा फल प्राप्त कर लेता। गांव की 200 नारी फकीर के दर्शनों के लिए आयीं जिनमे रामकुँवरि भी बालक प्रयागदास को गोद में लिए साथ थीं। श्री रामकुँवरि ने फकीर के दर्शन किये तथा फकीर की दृष्टि बालक प्रयागदास पर पड़ी। बालक को देखते ही शाह फकीर अपना आसन छोड़ बालक की ओर दौड़े एवं श्री रामकुँवरि के गोद से बालक प्रयागदास को लेकर अपने ह्रदय से लगा लिया। शाह फकीर ने बालक प्रयागदास के चरणों को अपने आँखों से लगाया तथा मस्तक से लगाया एवं बालक के पूर्व जन्मों की कथा गाकर सुनाने लगे। अनेक प्रकार की स्तुति करने लगे एवं बार-बार बालक के चरण अपने मस्तक से लगाते।
शाह फकीर कहने लगे "बालक पूर्व जन्म में परम वैरागी संत थे, जो श्री राधा कृष्ण के रूप के प्रेमी थे। मैं इनका शिष्य था परन्तु इनके आदेश का पालन नहीं करता था। इन्होंने बड़े विस्तार से मुझे गूढ़ धर्म का उपदेश किया लेकिन मैं मुर्ख अज्ञानी समझ ही नहीं पाया, मैं अपने अहंकार के कारण इनसे तर्क करता जिसपर ये मुझसे रुष्ट हो गए। इसी कारण से मुझे मुस्लिम शरीर प्राप्त हुआ और मेरे गुरुदेव अब कृपा करके मुझे अपना दर्शन दे रहे हैं। इनके माता पिता धन्य हैं, यह ग्राम धन्य है जहाँ स्वयं परम पुरुष श्री हरि प्रकट हुए हैं।"
इतना कह कर शाह फकीर ने बालक प्रयागदास को रामकुँवरि को दे दिया एवं बार-बार दण्डवत करते। सब नारियाँ थक गयी थीं एवं अपने-अपने घर को लौट आयीं।
परिवार का दिल्ली आना :
श्री चौबेलाल जी परिवार सहित साँझापुर को छोड़ कर दिल्ली में आकर बस गए। दिल्ली में कोठी बनवायी, कपड़े की दुकान बनवायी एवं श्री प्रयागदास जी को दुकान पर बैठाया। श्री प्रयागदास जी कपड़े की दुकान सँभालने लगे। श्री स्वामी रसिकदेव जी के एक शिष्य श्री मनोहरदास जी, जो वणिक थे, अक्सर श्री प्रयागदास के पास आते एवं कुछ पैसे उधार ले जाते तथा अपनी दुकान चलाते।
श्री प्रयागदास का जाती अभिमान का त्याग करना एवं सिद्ध स्वरुप का बोध होना :
एकबार श्री मनोहरदास जी जब श्री प्रयागदास जी के दुकान पर पैसे का हिसाब करने आये हुए थे, तो उनको बड़ी जोर की प्यास लगी, उनकी अपनी दुकान बहुत दूर थी, तो उन्होंने श्री प्रयागदास जी से कहा
"मेरा गला सूख रहा है, यहाँ पास में ही एक कायस्थ भक्त श्री प्रेमदास जी रहते है, मैं उनके घर से अभी पानी पिकर आता हूँ, फिर हिसाब करूँगा।"
श्री प्रयागदास जी ने कहा "मनोहरदास जी ! मेरे पास तो स्वच्छ जल भर कर रखा है, समस्त ब्राह्मण गण यहाँ जल पिने आते हैं, और तुम ब्राम्हणों का जल त्याग कर एक कायस्थ के यहाँ जल पिने जा रहे हो जो शूद्र के समान है ?"
इतना कह कर श्री प्रयागदास जी अंदर गए और एक लोटे में स्वच्छ जल भर कर लाये एवं श्री मनोहरदास जी को जल पिने के लिए दिया। श्री मनोहरदास जी ने थोड़ा भी जल नहीं पिया तथा बिना कोई जवाब दिए श्री प्रयागदास जी को दण्डवत प्रणाम करके चले गए।
श्री मनोहरदास जी श्री प्रेमदास जी के घर चले गए और जल पी कर पुनः लौट आए। इसपर श्री प्रयागदास जी को कुछ संदेह हुआ और उन्होंने कहा
"मेरी बात सुनो मनोहरदास ! तुम वणिक कुल के हो एवं ज्ञानी हो, ब्राम्हणों का जल छोड़ कर तुम दौड़े गए और शूद्र के घर का जल पी आये। ब्राह्मणों के जैसा पवित्र शरीर और किसका होगा, जिसका जल तुमने शूद्रवत त्याग कर दिया। मेरे मन में यही आशंका है, कृपया इसका उत्तर दो।"
श्री मनोहरदास जी श्री प्रयागदास जी को एकांत में ले गए एवं अपनी उपासना के बारे में बताने लगे। पहले वैष्णव धर्म बताया फिर रसिकों का यश गान करते हुए रसिकों की रीति बताई।
"सकल भक्त जो कोटि हौं, तामें सुद्ध जो एक।
कोटि सुद्ध सम रसिक एक, रसिक अनन्य विशेष॥"
श्री मनोहरदास जी ने श्री प्रयागदास जी से हरि भक्ति से शून्य श्रेष्ठ ब्राह्मणों की दुर्गति बताई तथा हरि भक्तों को ही वास्तविक ब्राम्हण बताया।
श्री हरि के दृष्टि में उनका भक्त ही श्रेष्ठ है चाहे वह किसी भी जाती का हो, जैसे श्री कृष्ण का विदुरानी के घर जाना एवं विदुरानी के दिए केले के छिलके भी प्रेम सहित पाना। श्री राम का शबरी की कुटिया में पधारना एवं शबरी के दिए जूठे बेर भी प्रेम से पाना। परन्तु हरि भक्ति से शून्य श्रेष्ठ ब्राह्मण भी निंदनीय है जैसे श्रीमद्भागवत के माहात्म्य में वर्णित धुंधकारी का प्रेत बनना और छटवें स्कंध के प्रथम अध्याय में अजामिल को यमदूतों के दर्शन होना।
श्री मनोहरदास जी की शास्त्र सिद्धांत सहित रस से सनी वाणी को सुनकर श्री प्रयागदास जी अति प्रसन्न हुए एवं मनोहरदास जी को ह्रदय से लगा लिया।
श्री मनोहरदास जी के सत्संग के प्रभाव से श्री प्रयागदास जी के ह्रदय में दिव्य स्वरुप प्रकाशित होने लगा एवं उन्हें अपने नित्य सिद्ध स्वरुप का भान हो आया। अब श्री प्रयागदास जी को घर संसार से वैराग्य हो गया एवं समस्त सुख समृद्धि खारे लगने लगे तथा रसिक भक्त जन अति प्यारे लगने लगे।
श्री प्रयागदास का प्रथम वृन्दावन आगमन एवं दीक्षा :
एक दिन श्री प्रयागदास जी कायस्थ भक्त श्री प्रेमदास जी के पास चले आए। वहां उन्होंने श्री रसिकदेव जी की भजन की रीति सुनी एवं रसिकदेव के चरणों में अकस्मात ही प्रेम बढ़ने लगा।
श्री प्रयागदास जी चुप-चाप घर संसार को छोड़ श्री वृन्दावन आ गए तथा श्री रसिकदेव जी के चरणों में उपस्थित हुए। श्री प्रयागदास को देखते ही श्री रसिकदेव जी प्रसन्न हो गए एवं अपने आसन से उठ कर उन्हें ह्रदय से लगा लिया। जैसे कोयल का बच्चा कौए के घोसले में पलता है परन्तु बड़ा होते ही कौवों का संग छोड़ कर कोयल से आ मिलता है, उसी प्रकार श्री प्रयागदास जी सब त्याग कर अपने गुरु चरणों में आये तथा श्री रसिकदेव ने उन्हें अपना जान कर अपना लिया।
श्री रसिकदेव जी श्री प्रयागदास जी को पहचान गए की ये निकुंज महल की नित्य सिद्ध सखी हैं, तथा उन्हें अपना शिष्य बना लिया एवं उन्हें श्री पीताम्बर दास नाम प्रदान किया।
श्री पीताम्बर देव जी के पिता का वृन्दावन आना एवं उन्हें साथ लेकर दिल्ली जाना :
यहाँ दिल्ली में श्री पीताम्बरदास जी के पिता श्री चौबेलाल को कहीं से पुत्र की दीक्षा तथा रीति की सुचना मिली तो वे अपने पुत्र की खोज करने लगे। श्री चौबेलाल कायस्थ भक्त श्री प्रेमदास के पास आये तथा उन्हें मारने पीटने लगे एवं डराने लगे। श्री प्रेमदास जी ने कहा की आपके पुत्र श्री वृन्दावन को चले गए हैं एवं श्री रसिकदेव जी के शिष्य हो गए हैं। श्री चौबेलाल यह सुनते ही वृन्दावन चले आये तथा अपने पुत्र को श्री रसिकदेव जी के पास पाया।
अपने पुत्र को देखते ही श्री चौबेलाल तुरंत श्री पीताम्बरदास जी के पास आये तथा उनके गले की कंठी तोड़ कर फेंक दी एवं माथे का तिलक पोंछ दिया और श्री रसिकदेव जी से कहने लगे "यदि मेरे पुत्र को पुनः यहाँ आने दिया तो फिर देखना मैं तुम्हारे साथ क्या करता हूँ।" परन्तु श्री रसिकदेव जी तो अपने दिव्य चिंतन में दुबे हुए हैं, उन्होंने इस खरी-खोटी की ओर ध्यान ही नहीं दिया।
इस प्रकार श्री रसिकदेव जी को खरी-खोटी सुनाते हुए श्री चौबेलाल जी अपने पुत्र श्री पीताम्बरदास जी को अपने संग दिल्ली ले आये। घर में श्री पीताम्बरदास जी के लिए श्री चौबेलाल ने 8 बलिष्ठ ब्राम्हण देख-रेख के लिए नियुक्त किये की मेरा पुत्र कहीं बाहर न जाए, किसी से मिले नहीं, किसी से कोई बात भी न करे। वे आठों दुष्ट ब्राम्हण श्री पीताम्बरदास जी को बार-बार डराते रहते।
श्री पीताम्बर देव जी का द्वितीय वृन्दावन आगमन तथा यज्ञोपवीत का त्याग कर कुल के बंधन से मुक्त होना :
एक दिन श्री पीताम्बरदास जी सबसे दृष्टि बचाते हुए श्री वृन्दावन आ गए एवं गुरुदेव श्री रसिकदेव जी को शाष्टांग प्रणाम किया। श्री रसिकदेव जी ने कहा
"हे पीताम्बरदास, तुम तो मुझे अति प्यारे हो, परन्तु तुम्हारे घर का यह झगड़ा मेरे चिंतन में विघ्न उत्पन्न करता है, इसलिए ऐसा करो, संसार को दिखाने के लिए कुछ काल तक तुम कहीं और निवास करो।"
गुरुदेव की वाणी सुन कर श्री पीताम्बरदास जी ने ऐसा ही किया। वे अपने गुरुदेव के चरणों में विश्वास रख कर श्री यमुना पुलिन पर आये और अपना यज्ञोपवीत तोड़ कर फेंक दिया तथा गुदड़ी धारण कर ली एवं हाथ में करुवा ले वहीँ विराजने लगे।
श्री पीताम्बर देव जी के पिता का 200 ब्राम्हणों के साथ मथुरा आना तथा राजा जयसिंह से श्री रसिकदेव जी की शिकायत करना :
दिल्ली में श्री चौबेलाल को जब यह मालूम हुआ की मेरा पुत्र पुनः सबसे बचते हुए वृन्दावन को भाग गया तो वे 200 ब्राम्हणों को अपने साथ लेकर मथुरा नरेश श्री जयसिंह के दरबार में आये।
श्री चौबेलाल जी ने महाराज जयसिंह से कहा
"हे महाराज, आप श्री रघुनाथ जी के वंश के राजा हैं, इसलिए आपको ब्राम्हणों की सहायता करनी चाहिए। श्री वृन्दावन में रसिकदास नाम का एक वैरागी संत रहता है, वह बड़ा छलिया है परन्तु अपना वेश विरक्त त्यागियों जैसा बना रखा है। उसने मेरे पुत्र को छल से साधु बना दिया है एवं समस्त शास्त्रीय कर्म को छुड़वाकर जनेऊ भी तोड़ दिया है तथा वो मेरे पुत्र को जूठा खिलाता है। वह जगह-जगह से सात जातियों के घर से भिक्षा मंगवाता है एवं वहाँ उपस्थित ब्राम्हणों को खिलाता है। इसके बाद वह सबको उपदेश करता है की इसप्रकार जो जूठा खाता है वह श्री हरि को पाता है, जो गायत्री एवं संध्या वंदन का त्याग करता है वही श्री हरि के मार्ग में चल सकता है, जो शूद्रों के साथ मिलकर भोजन करता है वह मुक्त हो कर परम पद प्राप्त करता है। हे महाराज, उस छलिया संत से मेरे पुत्र को परम तत्व के नाम पर यह सब उपदेश दिया है, एवं मेरे पुत्र को गले में गुदड़ी तथा हाथों में करुवा दे समस्त अंगों में मिट्टी लगा दी है, ऐसा अमंगल वेश प्रदान किया है।"
महाराज जयसिंह ने जब ब्राम्हणों की यह बात सुनी तो उन्हें अति ग्लानि होने लगी। अपने भाई श्री दीपसिंह कामानी को फरमान दिया की "हे दीप सिंह, 200 बैलदार सिपाहियों को ले जाओ तथा श्री रसिकदेव के कुञ्ज को गिरा दो, सब नष्ट कर दो।"
महाराज की आज्ञा प्राप्त कर दीपसिंह 200 बैलदार सिपाहियों को लेकर वृन्दावन की ओर चल दिए।
यहाँ वृन्दावन में सारी सुचना श्री रसिकदेव तक पहुंची। उन्होंने तुरंत श्री पीताम्बर देव जी को बुलाया तथा सारा वृत्तांत सुनाया। गुरु से यह वृत्तांत सुन कर श्री पीताम्बर देव जी को फ़िक्र होने लगी। उसी समय उन्होंने एक उपाय सोचा, जब समस्त ब्राम्हण दीपसिंह एवं 200 बैलदार सिपाहियों को लेकर वृन्दावन की ओर चले आ रहे थे तो मार्ग में केवारी नाम के एक स्थान पर श्री पीताम्बर देव जी स्वयं ही सामने आ गए। श्री चौबेलाल जी ने अपने पुत्र को देखते ही उसका हाथ पकड़ लिया, और दीपसिंह के पास लाए। दीपसिंह ने श्री पीताम्बर देव जी से विस्तार पूर्वक सब वृत्तांत सुना और यह सुचना महाराज जयसिंह को भेजी, जिसे सुनकर महाराज ने सबको वापस महल में बुला लिया।
सब महल में पहुंचे। महाराज जयसिंह श्री पीताम्बर देव को देख कर प्रसन्न हुए और कहा "तुमने विप्रवंश का त्याग क्यों किया, और इसके पश्चात् तुमने किससे उपदेश ग्रहण किया।"
महाराज जयसिंह की बात सुनकर श्री पीताम्बर देव जी ने कहा "हे महाराज, हरि तथा गुरु की भक्ति करना, यही ब्राम्हण का धर्म है, और प्रभु से विमुख रहना तो नीचों का काम है। जो अपने जाती एवं वर्ण अभिमान के अहंकार में ही स्थित रहता है वह कभी भी हरि की भक्ति नहीं जान पाता। श्री हरि के दासों की कोई जाती या वर्ण नहीं होता, यह जाती और वर्ण सब भ्रम है, हरि के भक्त इस भ्रम को मैल के समान धो देते हैं। जो वर्ण अभिमान में स्थित है वह श्री हरी के दास के अभिमान को नहीं समझ सकता। मैं गुरुदेव श्री रसिकदेव जी का दास हूँ, मेरा जाती और वर्ण से कैसा सम्बन्ध ? अब न मुझे स्वर्ग का लोभ है, न नर्क का भय है और न ही मुझे उच्च लोकों का मोह है, मैं तो श्री गुरु चरणों के प्रताप से श्री श्यामाश्याम के नित्य विहार रस में मग्न रहता हूँ।"
महाराज जयसिंह ने श्री पीताम्बर देव जी की अलौकिक वाणी को सुन कर मन में विचार किया की यह तो गूढ़ एवं सर्वोपरि वाणी है, और इनके चरणों की रज की मन-ही-मन अभिलाषा करने लगे। महाराज ने ब्राम्हणों से कहा
"हे समस्त ब्राम्हण गण, मेरी बात सुनो, आपके झूठ को मैं जान गया हूँ, श्री रसिकदेव जी तो पूर्ण निष्काम हैं, वे महापुरुष हैं, उनके चरणों में तुम सब का अपराध हुआ है, आप सब ने ऋषिकुल की मर्यादा का त्याग कर अपराधी हो गए हो, इस कारण आप सब शीघ्र श्री रसिकदेव जी के पास जाओ और उनके चरणों में क्षमा प्रार्थना करो। संतों के दोष को मन से त्याग कर अपने पुत्र को अपने घर ले जाओ।"
श्री पीताम्बर देव जी के पिता का उन्हें साथ लेकर पुनः दिल्ली जाना :
महाराज जयसिंह की बात सुन कर भी उन अभिमानी ब्राह्मणों को कोई पश्चाताप न हुआ। ब्राम्हणों सहित श्री चौबेलाल श्री पीताम्बर देव को साथ लेकर दिल्ली आ गए।
श्री चौबेलाल का हठ देख कर श्री पीताम्बर देव जी एक वर्ष तक घर में रहे लेकिन अपनी उपासना का त्याग नहीं किया। श्री श्यामदास नाम का एक ब्राम्हण श्री पीताम्बर देव जी के पास आता और उन्हें कटु वचन कह कर डराने का प्रयास करता तथा अनेक प्रकार के ज्ञान का उपदेश करता। वह अनेक कवित्त कहता एवं धर्म का उपदेश करता। कभी तो वह ब्राम्हण वर्ण की बड़ाई करता तो कभी कुल की। कभी वह धन एवं स्त्री सुख का ज्ञान देता तो कभी श्री पीताम्बर देव जी के चरणों में अपना माथा रख देता। इस प्रकार सब रीति से वह ब्राम्हण श्री पीताम्बर देव जी को समझाता।
लेकिन श्री पीताम्बर देव को तो अपने गुरु श्री रसिकदेव ही प्यारे थे, किसी और का उपदेश इनके कानों तक पहुँचता ही न था।
(श्री पीताम्बर देव जी की अद्भुत रहनी तथा पिता का उनको त्यागना)
श्री पीताम्बर देव को समस्त जगत तृणवत भासता था। जैसे कमल जल में रहते हुए भी जल का स्पर्श नहीं करता वैसे ही श्री पीताम्बर देव भी संसार में रहते हुए भी संसार से विरक्त एवं उदास रहते। इनके माता पिता इन्हें सुन्दर-सुन्दर वस्त्र पहनाते तो श्री पीताम्बर देव उन वस्त्रों को उतार कर आग में जला देते थे। मट्टी के बर्तन जिसमें अनाज भरे होते, उन बर्तनों को श्री पीताम्बर देव फोड़ देते एवं सब अनाज एक कर देते। बना हुआ काम भी बिगाड़ देते।
जब कोई संत श्री पीताम्बर देव के घर भिक्षा के लिए आता तो उसे सारा धन धान्य उठा कर दे देते, संत का आसन लगवाते, उन्हें प्रसाद पवाते एवं स्वयं शित प्रसाद लेते। जब यह सारा वृत्तांत श्री चौबेलाल ने सुना तो बड़े दुखी हुए। कभी अपना सर दीवार पर पीटते तो कभी मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ते। अपनी पगड़ी उतार कर श्री पीताम्बर देव जी के चरणों में रख देते। बहुत प्रकार से समझाते की यह सब छोड़ दो, जैसा मैं कहता हूँ वैसा करो। लेकिन श्री पीताम्बर देव के मन पर कोई असर न होता।
इस वित्तान्त को सुन कर बहुत सारे ब्राम्हण एक जूट होकर श्री चौबेलाल के पास आये और कहने लगे "हे चौबेलाल जी, समस्त ब्राम्हण समाज में आप अधिक प्रशंशित हैं, आप गायत्री मन्त्र के जापक हैं, अधर्म के त्यागी हैं एवं कर्म को प्रधान मानने वाले हैं, भगवान शिव एवं माता पारवती के भक्त तथा सेवक हैं, सब प्रकार से वेदवर्णित ब्रम्ह कर्म के अधिकारी हैं, आप जैसा पिता पाना तो बहुत पुण्यों का फल है, जिससे पुत्र का भी सुयश होता है, श्री पीताम्बर देव जी अपने सौभाग्य को नहीं जानते, ब्राम्हण कुल पाकर भी भ्रम नहीं गया। जो भी ऊंच नीच अपना सर मुंडवाकर साधु हुए उन्हीं का इसने संग किया, उनका जूठन खा कर अपना ब्राम्हण धर्म भ्रष्ट कर लिया। हम और आप श्री पीताम्बर देव जी को चाहे करोड़ों उपदेश क्यों न कर दे, लेकिन आपके पुत्र पर कोई असर नहीं होगा। शास्त्र में वर्णन है की कैसे कलियुग आएगा, वर्णाश्रम धर्म एवं समस्त विधियों का लोप हो जायेगा, आज वही समय आ पहुंचा है, एक-एक कर सब वर्ण नष्ट हो जायेंगे। इसलिए आप अपने पुत्र का त्याग कर दीजिये एवं अपना मन भगवान शिव के चरणों में लगाइए।"
ब्राम्हणों की बात सुनकर श्री चौबेलाल ने उसी क्षण निर्णय किया एवं श्री पीताम्बर देव जी को बुलाकर कहा "हे पुत्र, मैं आज से तुम्हारा त्याग करता हूँ, और समस्त ब्राम्हण समाज इसका साक्षी है।"
जब श्री पीताम्बर देव जी ने यह वाणी सुनी तो सबको सुनाकर कहने लगे "हे पिता जी, आप अपने जाती एवं कुल के अभिमानी हो, लेकिन मैं इन सब वर्ण तथा जाती से अतीत हूँ तथा आप सब के द्वारा सम्मानित होता हूँ। (ब्राम्हण भी हरि के दासों का सम्मान करते हैं।) एक बार अग्नि के बुझने पर वह पुनः प्रज्वलित नहीं होती, लकड़ी एक बार कट जाये तो पुनः नहीं जुड़ती, हाथी के दांत एक बार निकल जाए तो पुनः नहीं लगते, छाछ से एक बार घी अलग हो जाये तो फिर छाछ में नहीं मिलता, इसी प्रकार जब श्री हरि के भक्तजन अपनी जाती का त्याग कर देते हैं, फिर जाती के बंधन में कभी नहीं बंधते। जीवनमुक्त महापुरुष को बांध सके ऐसा कौन है, आप सब संसार के मोह से बंधे हैं परन्तु यह संसार सत्य नहीं है, हाथी की सवारी को छोड़ गधे की सवारी कौन करता है। आप सब श्री हरि के भजन रुपी चिन्तामणि को छोड़ काँच बटोरने में लगे हैं, सद्गुरु को छोड़ कर जाती अभिमान में स्थित हैं। इसके उपरांत आप सब ने अपने मन में मोह को बसाये रखा है, और इसी कारण मुझे नाना प्रकार का उपदेश कर रहे हैं एवं मेरी अभिलाषा करते हैं। मेरा शरीर आपके द्वारा ही प्रकट हुआ है, इस सम्बन्ध को मान कर आप मुझसे स्नेह करते हैं। यदि मैं अपने इष्ट की आराधना करूँगा तो आपके समस्त कुल का उद्धार हो जायेगा।
आप सब मिलकर एक पत्र लिखो की हमारा अब इससे कोई सम्बन्ध नहीं है, यह हमारा पुत्र नहीं है एवं हम इसके पिता नहीं हैं, यह अपने गुरु श्री स्वामी रसिकदेव जी का दास है। यदि हम फिर भी इसे अपना पुत्र कहें तो सौ जन्मों के लिए हमें नर्क प्राप्त हो।"
इस प्रकार श्री पीताम्बर देव जी ने पत्र लिखवाकर उसपर दस्तखत एवं मुहर लगवाई एवं अपने समस्त कुटुम्बी जनों को रोते देख वृन्दावन की ओर चल दिए।
श्री पीताम्बर देव जी का पुनः वृन्दावन आगमन :
चलते-चलते श्री पीताम्बर देव जी वृन्दावन पहुंचे एवं श्री रसिकदेव जी के सम्मुख उपस्थित हुए। श्री रसिकदेव को शिष्य के लौटने पर बड़ी प्रसन्नता हुई, लेकिन वे कहने लगे
"हे पीताम्बर दास, कहो अब कैसे आये, किस प्रकार घर से भाग कर आये, अब तुम्हारे पिता ब्राम्हण समाज को लेकर यहाँ आ जायेंगे और मुझे तथा तुमको बड़ा दुःख देंगे।"
गुरुदेव के इन वचनों को सुनकर श्री पीताम्बर देव जी ने पत्र को श्री गुरुदेव को दे दिया। श्री रसिकदेव जी ने वह पत्र पढ़ा और बहुत प्रसन्न हुए तथा अपने आसन से उठ कर श्री पीताम्बर देव जी को ह्रदय से लगा लिया।
तीर्थ यात्रा :
यहाँ दिल्ली में पुत्र मोह में श्री चौबेलाल जी व्याकुल हो रहे थे। उन्होंने ब्राम्हणों को अपने साथ ले वृन्दावन को आये। जब श्री पीताम्बर देव जी ने अपने पिता श्री चौबेलाल जी के साथ समस्त ब्राम्हणों को देखा तो समझ गए की ये सब फिर मुझे अपने घर ले जायेंगे। यह विचार कर उसी क्षण श्री गुरुदेव से आज्ञा प्राप्त कर श्री पीताम्बर देव जी वृन्दावन को छोड़ कर तीर्थ यात्रा को चल पड़े। उनके सुन्दर अंग-प्रत्यंगों सहित गौर वर्ण का शरीर था, हाथ में करुवा तथा कंधे पर कामरी थी, ह्रदय में गुरु तथा हरि को बसाये हुए श्री कुञ्ज बिहारी बिहारिणी जू के रस में डूबे हुए हैं।
श्री पीताम्बर देव जी प्रथम गिरिराज गोवर्धन पहुंचे। इसके पश्चात् आँवैरि पुर, मालकेतु, पुष्कर तीर्थ, चतुर्भुज रूप, राजसमुद्र होते हुए नाथद्वारा पहुंचे और श्रीनाथ जी के दर्शन किये। इसके बाद एकलिंग भगवान शिव के दर्शन किये, तथा उदयपुर, डूंगरपुर, मोहनपुर, जालिया, बनपुर होते हुए अहमदाबाद पहुँचे। वहाँ से ब्रह्मकुंड, पंचतीर्थ, गिरनार होते हुए सुदामा पूरी आये। इसके बाद गोमती नदी एवं सागर के संगम स्थल का दर्शन किया एवं स्नान किया, जिसके पश्चात् भाव ग्राम पहुंचे। वहां से बेट आये तथा वहीँ पर एक मास तक वास किया। वहां से गोपीचन्दन स्थान पर पहुंचे एवं प्रणाम किया, इसके बाद तारक पिंड, मोरवी, बड़पुर, सिद्धपुर होते हुए बिंदु सरोवर पहुंचे, जहाँ कर्दम ऋषि ने तप किया था, उनकी पत्नी मनु पुत्री माता देवहुति ने यहीं भगवान कपिल को जन्म दिया था। श्री पीताम्बर देव जी ने इस स्थान पर 6 मास तक वास किया, नित्य बिंदु सरोवर में स्नान करते और अपने इष्ट का ध्यान करने लगते। कुछ पुण्यात्मा जन इनके लिए मधुकरी लाते जिसका एक चौथाई अंश श्री पीताम्बर देव जी ग्रहण करते और निशिदिन युगल मन्त्र का जप करते। ये सदा त्रितापों से मुक्त रहते। इस प्रकार बिंदु सरोवर में वास करते हुए 6 मास बीत गए।
श्री पीताम्बर देव जी का दिव्य महात्माओं से भेंट एवं सिद्धि प्राप्त करना :
एक दिन एक अद्भुत पुरुष श्री पीताम्बर देव जी के पास आया एवं उनके दर्शन कर प्रसन्न हुआ। उस पुरुष को देख कर श्री पीताम्बर देव जी ने पूछा "हम आपका परिचय जानना कहते हैं।"
वह पुरुष श्री पीताम्बर देव जी के चरणों में दण्डवत कर कहने लगा
"मेरा नाम नागार्जुन है, मैं इच्छा रूप ग्रहण कर सकता हूँ, यह स्थान अनुपम है एवं योग विद्या से ओत प्रोत है। यह जो सुन्दर पर्वत है, इसे यहाँ के लोग आभू पर्वत कहते हैं। इस पर्वत के मध्य बड़े-बड़े सिद्ध एवं विज्ञानी महात्मा जन निवास करते हैं, जिनकी साधना योग से सम्बंधित है। ये महात्मा शुद्ध क्रिया करनेवाले हैं जिन्होंने शरीर तथा मन से संसार की समस्त व्याधियों का त्याग कर दिया है। इस पर्वत पर बहुत सारे ऋषि मुनि निवास करते हैं जो उच्च कोटि के वैराग्यवान एवं तपमूर्ति हैं जिनका ह्रदय श्री हरि में लगा हुआ है। यह श्री कपिल भगवान का स्थान है और वे यहाँ स्वछन्द रूप से निवास करते हैं। मेरे साथ चलिए और सब ऋषि मुनियों का दर्शन कीजिये।"
नागार्जुन की बात सुनकर श्री पीताम्बर देव जी उनके साथ चलने लगे। पर्वत के भीतर 6 योजन तक चलते हुए श्री पीताम्बर देव एवं नागार्जुन एक चोटी पर पहुंचे। वहां की छवि उन्मत्त करनेवाली थी। वहां से आधे योजन की ऊंचाई पर एक और चोटी थी। नागार्जुन ने श्री पीताम्बर देव जी से कहा
"आप उस चोटी पर चले जाइये एवं चारों ओर के कोट का दर्शन कीजिये। एक ऐसे कोट के दर्शन होंगे जिसका द्वार बड़ा सूक्ष्म होगा एवं द्वार पर एक बड़ा भयानक काल रुपी सिंह बैठा होगा। उसी कोट के भीतर श्री कपिल भगवान विराजमान हैं जो सांख्य योग के महागुरु हैं। यदि आप उस सिंह से डर कर वापस लौट आये तो आप आधे सिद्ध हो जाओगे और यदि आप सिंह से बिना डरे भगवान कपिल के दर्शन कर लौटे तो पूर्ण सिद्ध रूप हो जाओगे।"
नागार्जुन की बात सुनकर श्री पीताम्बर देव जी उस चोटी पर चढ़ने लगे। उस चोटी के ऊपर सिद्धा गंगा बहती थी। श्री पीताम्बर देव जी उस चोटी पर पहुँच गए एवं देखा की कोट के द्वार पर एक भयानक सिंह बैठा है और दहाड़ते हुए आगे आया। उसी समय आकाशवाणी हुई के अब तुम सिद्ध हो गए एवं तुम्हारा सम्मान है।
अब आप यहाँ से लौट जाइये, काल की चाल अर्थात अब जो भी घटित होनेवाला होगा वह सब आपको कान में सुनाई देगा। भूत, भविष्य और वर्त्तमान में घटित होने वाले निर्धारित घटना आपको हर क्षण सुनाई देगा। आप इस पर्वत से उतर कर निचे भूमि पर जाइये तब आपको मेरे भी दर्शन होंगे।
श्री पीताम्बर देव जी ने इस आकाशवाणी को सुना तो इसका भाव जान गए और पर्वत से निचे भूमि पर उतर आए। लेकिन वहां नागार्जुन भी नहीं मिले। उसी क्षण वहाँ दो दिव्य पुरुष आये, माथे पर तिलक है एवं गले में कंठी है। दोनों साधुओं ने श्री पीताम्बर देव जी के चरणों में शाष्टांग दण्डवत कर प्रणाम किया तथा इस प्रकार बात करने लगे जैसे श्री पीताम्बर देव जी को पहले से ही जानते हों।
श्री पीताम्बर देव जी का भगवान कपिल से मिलन एवं वार्ता :
अब श्री पीताम्बर देव सहित दोनों पुरुष साथ में विचरण करने लगे तथा पर्वत के गहन मार्गों को देखते जो भयभीत करनेवाला था। पर्वत के वन में सघन काटों वाले वृक्ष थे तथा वहां भयानक रूप वाले भालू घूम रहे थे। बन्दर आपस में लड़ रहे हैं तथा बहुत शब्द ध्वनि कर रहे हैं। सिंह मेघ के समान गरज रहे हैं, बाघ भी भयंकर शब्द कर रहे हैं। सिंघों वाले बड़े-बड़े हिरण वन में घूम रहे हैं एवं चीते उनका शिकार करने के लिए छल रूप से डोल रहे हैं। बड़े-बड़े विषधर सर्प एवं बिच्छू घूम रहे हैं। बड़ी-बड़ी गुफाएं है जो पुष्प एवं लताओं से आच्छादित हैं। पके आम के वृक्ष है जिसका स्वाद अमृत तुल्य है एवं कोयल, कीर तथा कोक मधुर ध्वनि कर रहे हैं। वन में बरना, खिरनी, तंदुका, बील, जम्बु, अंजीर, करौंदा, आमली, कंद जैसे मधुर फल उपलब्ध हैं। कुछ ऐसे बाग़ हैं जहाँ नाना प्रकार के कंद एवं साग लगे हैं। आगे एक प्राचीन जैन भवन है जिसमे गौर एवं श्याम वर्ण की प्रतिमा है। वहाँ स्वच्छ जल का एक झरना था जो की एक सिद्ध स्थान था। श्री पीताम्बर देव जी एवं वे दोनों पुरुष साथ में विचरण कर रहे हैं। वहीँ पर श्री पीताम्बर देव जी ने एक पुरुष को देखा जिसका शरीर क्षीण एवं दुर्बल था। वह अपने फटे पुराने वस्त्र को सिर पर रख कर खुरपा ले घास खन रहा था। उस पुरुष को देख कर श्री पीताम्बर देव जी वहीँ एक वृक्ष के निचे विश्राम करने लगे।
वह दुर्बल पुरुष श्री पीताम्बर देव जी के पास आया और बात करने लगा। परन्तु वह श्री पीताम्बर देव जी से आँखें नहीं मिला रहा है और उसके मुख से तेज निर्झर हो रहा है। देखने में अति प्रवीण एवं दिव्य ऐश्वर्य संपन्न सहित क्रियावान जान पड़ते हैं। उसके बात करने का ढंग भी निराला है, वह पत्थर तथा वृक्षों से श्री पीताम्बर देव जी को सुना कर बोल रहा है। श्री पीताम्बर देव जी उस पुरुष की वाणी को सुनकर मन में शांति का अनुभव कर उत्तर देते हैं। श्री पीताम्बर देव जी का उत्तर सुनकर वह पुरुष बड़ा प्रसन्न होता। फिर उस पुरुष ने कहा
"आज एकादशी है, आज के दिन अन्न ग्रहण करना वर्जित है।"
लेकिन श्री पीताम्बर देव जी अन्न मांग रहे हैं और वह पुरुष तरह-तरह की बात कर मना कर देता। फिर उसने श्री पीताम्बर देव जी से पूछा की
"एकादशी के दिन आप अन्न ग्रहण करते हो या फलाहार करते हो। यदि अन्न ग्रहण करते हो तो मैं अन्न मंगा दूँ और यदि फलाहार करते हो तो फल मंगा दूँ।"
श्री पीताम्बर देव जी ने कहा "हमारा तो सदा एक ही व्रत रहता है और वो है अनन्य व्रत, परन्तु यहाँ अन्न उपलब्ध नहीं है इसलिए आज फलाहार ही करूँगा।"
यह सुनकर वह दिव्य पुरुष एक ऊँचे टीले पर चढ़कर उच्च स्वर में कुछ कहा, और अचानक वहाँ लाखों की संख्या में भैंसे आये जिनपर अति मधुर सरदा फल लदा हुआ था, परन्तु आश्चर्य की भैसों के संग एक भी मनुष्य न था। वह दिव्य पुरुष एक सरदा फल लेकर आया और श्री पीताम्बर देव जी को खिलाया। श्री पीताम्बर देव जी के साथ जो दो पुरुष आये थे उन्होंने ने भी सरदा फल खाया। फिर उस दिव्य पुरुष ने श्री पीताम्बर देव जी से कहा की हम तुम कहीं एकांत में चलें और कुछ वार्तालाप करें। इसके उपरांत श्री पीताम्बर और वह दिव्य पुरुष एकांत में जाकर वार्तालाप करने लगे।
यह दिव्य पुरुष और कोई नहीं बल्कि आकाशवाणी करनेवाले भगवान कपिल देव जी ही थे।
श्री पीताम्बर देव जी का अवधूत अवस्था में विचरण करना :
इसके उपरांत वे सात वर्ष आबू में रहे तथा वहां से पुष्कर तीर्थ पहुँचे। वहां बड़ा सुन्दर पर्वत था जहाँ ऋषि मुनियों का वास था। श्री पीताम्बर देव जी अब अवधूत स्वरुप में विचरण करने लगे। उनका शरीर एक तेज पुंज प्रतीत होता था, न उनके शरीर पर कोई वस्त्र था न ही कोपीन। नित्य विहार रस में छके हुए वनों में गज चाल वत डोल रहे थे, एवं किसि से कुछ बोलते नहीं, मौन रहते। मन में नित्य ही श्री श्यामश्याम का दर्शन करते। कभी नागबाड़ पर्वत पर निवास करते तो कभी पुष्कर के मध्य।
श्री पीताम्बर देव जी का अजमेर में ख्वाजे मीरा से भेंट :
एक दिन वे पर्वत से होते हुए अजमेर पुरी आए, जहाँ एक पर्वत पर चढ़ वहीँ निवास करने लगे। वर्षा के समय अर्ध रात्रि में ख्वाजे मीरा श्री पीताम्बर देव जी के पास आए और उन्हें संकोच करते हुए निद्रा से जगाया। श्री पीताम्बर देव जी जागे और देखा तो विचार किया यह भयानक रूप वाला कौन है। श्री पीताम्बर देव जी ने ख्वाजे मीरा से पूछा
"आप कौन हैं, हम आपका परिचय जानना चाहते हैं।"
ख्वाजे मीरा ने कहा "हम और आप दोनों पीर हैं, मेरा तो यहीं निवास है, पर आप बाहर से आये हो, आप कौन हो।"
श्री पीताम्बर देव जी ने कहा "हम आपके जमाई हैं।"
यह सुनकर ख्वाजे मीरा निकट आ गए और दोनों हँस-हँस कर बातें करने लगे। ख्वाजे मीरा ने कहा
"आप सत्य में मेरे जमाई ही हो, मैं यह मानता हूँ। अब आप अजमेर में ही वास कीजिये, यहाँ आपका यश विस्तार होगा। मेरा वंश आपका दास बन कर रहेगा, और आप जो करेंगे वह सब स्वीकार करेंगे। आप मेरे जमाई हैं और मैं आपका स्वसुर हूँ, हम दोनों के जैसा इस पुरी में और कौन है।"
याह सुन श्री पीताम्बर देव अजमेर में वास करने लगे। इनके प्रताप से वहां के हिन्दू और मुस्लमान एक दूसरे से नम्रता का व्यव्हार करने लगे एवं श्री पीताम्बर देव जी को अपना गुरु कहने लगे।
श्री पीताम्बर देव जी की जब इच्छा होती तो दौड़ कर ख्वाजे पर चढ़ जाते और विराजित हो जाते। सेवा में उपस्थित म्लेक्ष गणों ने यह देखा तो क्रोधवश मारने दौड़े लेकिन ख्वाजे मीरा ने भयानक रूप धारण कर प्रकट होकर उन्हें मृत्यु का भय दिखाया जिसके कारण सभी म्लेक्ष गण श्री पीताम्बर देव के चरणों में आये और उनकी स्तुति करने लगे। श्री पीताम्बर देव बादशाह के समान वहां बालकों के संग खेलने लगे। वहीँ पर तम्बू लगा कर अपना डेरा किया। दधीचि कुल के ब्राम्हण बालक उनकी सेवा में रहते। मट्टी के हाथी तथा लकड़ी के बन्दुक एवं तलवार लिए वे बालक पहरा देते। कोई बालक मंत्री बना है तो कोई वज़ीर, कोई सिपाही है तो कोई दास, सब मिलकर बादशाह श्री पीताम्बरदेव संग खेलते। अनेक जन वहां आते और पकवान भेंट चढ़ाते, जिसे श्री पीताम्बर देव जी बाँट देते।
श्री पीताम्बर देव जी का ख्वाजे मीरा पर ऐसा खेल जब वहां के सूबेदार को पता चला तो क्रोधित हो उसने दीवान को वहां पीताम्बर देव को हटाकर सब ठीक करने भेजा। वह दीवान सेना को साथ ले श्री पीताम्बर देव के पास आया तो श्री पीताम्बर देव ने मट्टी के बने हाथी, घोड़े एवं सिपाहियों पर जैसे ही हाथ रखा तो वे सब जीवित हो गए एवं दीवान की सेना से युद्ध कर उनको पराजित जिया। दीवान ने जब यह चमत्कार और उनकी रीति देखि, तो उसके ह्रदय में श्री पीताम्बर देव जी के चरणों में श्रद्धा उत्पन्न हो गयी। दीवान सूबेदार के पास गया और सारा वृत्तांत सुनाया तो सूबेदार भी श्री पीताम्बर देव जी के चरणों में आकर पड़ गया।
श्री पीताम्बर देव जी का वृन्दावन आगमन एवं गुरु कृपा से सिद्धि से मुक्त होना :
यहाँ वृन्दावन में श्री रसिक देव जी को श्री पीताम्बर देव जी के इस कौतुक का पता चला तो उन्होंने पत्र भेज कर बुलवाया। पत्र पढ़ते ही श्री पीताम्बर जी वृन्दावन को चले और श्री रसिक देव जी के चरणों में शाष्टांग प्रणाम किया।
श्री रसिकदेव जी ने कहा "कहो सिद्ध जी, अच्छे से तो आये हो, तुमको देख कर आनंद हो रहा है। हम तुमपर प्रसन्न हैं, जो भी मन हो माँग लो।"
श्री पीताम्बर देव जी ने कहा "हे श्री गुरुदेव, मेरे मन में सदैव आपके चरणों का विश्वास बना रहे, एवं मैं सदैव आपका निज दास बन कर रहूँ। मुझे दृढ़ गुरु भक्ति प्रदान कीजिये, तथा मैं नित्य विहार के सार का अनुगामी बनूँ। मैं तीर्थ यात्रा में नागार्जुन से मिला, जिन्होंने मुझे भगवान कपिल देव के भवन को भेजा। मैं तुरंत वहां गया तो आकाशवाणी हुई की यहाँ से अब लौट जाओ, उसी समय मैं पर्वत से उतर आया। उसी क्षण से भूत एवं भविष्य की सब बातें मेरे कानों में सुनाई देने लगी। हर क्षण कानों में शब्द सुनाई देता है, और मुझे यह अच्छा नहीं लगता। पंडित, साधु तथा सिद्ध, सब यह कहते हैं की अधिक प्रसिद्धि से भजन भावना का लोप होने लगता है और समय वृथा ही नष्ट होने लगता है। मुझे यह वरदान दीजिये की सब प्रकार से मैं केवल आपकी ही सेवा करून।"
श्री पीताम्बर देव जी की इस वाणी को सुनकर श्री रसिक देव जी बोले
"जैसे दिया दीपक से मिलकर दीपक हो जाता है उसी प्रकार तुम मेरे सामान ही हो जाओगे। तुम्हें जो कानों में शब्द सुनाई देता है वह अब बंद हो जायेगा और फिर कभी सुनाई नहीं देगा।" ऐसा कह कर श्री रसिकदेव जी ने श्री पीताम्बर देव जी को ह्रदय से लगा लिया एवं अपने समान ही बना लिया।
बहुत सारे पतित जीव श्री पीताम्बर देव जी के चरणों में आये और वे सब नित्य केलि रस में डूबने लगे।
एक दिन श्री रसिकदेव देव जी के आज्ञा से श्री पीताम्बर देव जी ठाकुर जुगलबिहारी को लेने जयपुर गए। जयपुर आते ही बहुत सारे ब्राम्हणों को अपना शिष्य बना लिया जिनमें श्री किशोर दास जी भी थे।
श्री पीताम्बर देव जी के शीत प्रसाद पाने से एक भयंकर प्रेत की मुक्ति :
एक बार श्री पीताम्बर देव जी के शीत प्रसाद पाने से एक प्रेत मुक्त हो गया था। उसकी कथा इस प्रकार है -
साम्हरि शहर में एक कायस्थ रहता था जो प्रबल प्रेत हो गया था। उसका नाम सहजराम था। वह प्रेत बहुत भयानक था तथा सब कुटुम्बी जनों को दुःख देता। अपने छोटे भाई की पत्नी के देह में वह प्रेत निवास करता था। बड़े-बड़े तांत्रिक और पंडित उस नारी के अंदर से प्रेत को निकालने आते।
जब कोई तांत्रिक नारी के इलाज के लिए आता तो वह प्रेत उसको पढ़ कर मन्त्र सुनाता। जब कोई तंत्र की क्रिया का विस्तार करता तो उसको निर्धारित विधि बताता। जब कोई कहीं से यंत्र बनवाकर लता तो उसकी साधना की विधि वह प्रेत बताता। यदि कोई दोहा सुनाता तो वह प्रेत उसे संस्कृत के श्लोक सुनाता। वह प्रेत फ़ारसी, अर्बी तथा तुर्की में भी बोलता। यदि कोई उस प्रेत से चर्चा करता तो तुरंत उसे शास्त्रीय प्रमाण द्वारा पराजित कर देता।
ऐसा प्रेत बड़ा दुखकारी होता है क्यूंकि इसके समक्ष कोई उपाय काम नहीं करता। जितने भी पंडित, तांत्रिक एवं बुद्धि जीव थे वह सब इस प्रेत से पराजित हो गए थे एवं समस्त कुटुम्बी जन भयभीत थे।
पास में एक कायस्थ भक्त रहता था जिसका नाम नगजी था। वह दिन प्रतिदिन उस प्रेत के उपद्रव को सुनता। श्री नगजी बड़े अनुरागी भक्त थे, हरि गुरु संत की सेवा करते थे, उन्होंने विवेक से विचार किया की यह प्रेत सब रीतियों में निपुण है, पंडित और संतों से अधिक ज्ञानी है। एक दिन उन्होंने विचार किया की प्रेत से पूछूं की उसे प्रेत शरीर क्यों प्राप्त हुआ। ऐसा विचार कर नगजी उस प्रेत के पास आये। प्रेत ने नगजी को देखा तो प्रसन्न हुआ और अपना सर उनके चरणों में रख कर प्रणाम किया। नगजी ने उस प्रेत को देखा तो हरि गुरु को मना कर कहने लगे
"मैं तुमसे विनती कर रहा हूँ, कृपया मुझे बताओ की तुम्हें यह प्रेत योनि क्यूँ प्राप्त हुई।"
नगजी की बात सुनकर प्रेत ने कहा "हे पुत्र, मेरी बात सुनो, मैं तुम्हें अपने पूर्व जन्म का वृत्तांत कहता हूँ, जिन श्री हरि ने मुझे यह मनुष्य शरीर दिया मैंने उन्हीं का भजन नहीं किया। जिन सद्गुरु की कृपा से मुझमें सद्गुण आये मैंने उन्हीं सद्गुरु की सेवा नहीं की। यदि कोई साधु संत मेरे घर आते तो उन्हें मेरे द्वारा अपमान मिलता। इस मिथ्या शरीर के अभिमान से सदा गर्वित रहता, एवं सब प्रकार से अहंकार में ही रहता। मुझे यवनों की सभा हर क्षण अच्छी लगने लगी थी एवं सद्गुरु के वचन नहीं सुहाते थे। बिना श्री हरि को भोग लगाए ही भोजन करता था एवं अपने गुण के गर्व में अज्ञान वश कभी भी गुरु के समक्ष दीन नहीं हुआ। मैं जीवों को मार कर खा जाता था एवं मदिरा पान करता तथा विषयों से ही प्रेम करता। पराई स्त्री पर धन लुटाता एवं असत वचन सुनता तथा बोलता। इसके अतिरिक्त और भी बहुत दुराचार कर समस्त पापों को कमाया जिसके फल स्वरुप मुझे प्रेत शरीर प्राप्त हुआ।"
नगजी ने प्रेत की सारी कहानी सुनी और परमार्थ के वचन कहने लगे
"हे तात, मेरी बात सुनो, मुझे सत्य बताओ, पहले तो आपने पाप कर्म कमाया, जिसके फलस्वरूप आपने प्रेत शरीर पाया, अब मुझे यह बताओ की आप इस प्रेत शरीर से कैसे मुक्त हो सकते हैं, इसका क्या उपाय है, मुझसे कुछ न छुपाना।"
नगजी की बात मानते हुए प्रेत बोला
"श्री हरि रूप में सब गुरुओं के गुरु श्री पीताम्बर देव जी हैं। उनके शीत प्रसादी को पाते ही मनुष्य भेद दृष्टि से मुक्त हो जाता है। वे श्री वृन्दावन से जयपुर महाराज जयसिंह के महल में पधारे हैं, वे 10 दिन में इस साम्हरि ग्राम में आएंगे, तुम उनके सम्मुख जाना एवं उनका शीत प्रसाद लेकर मेरे मुख में डालना जिससे तत्काल मुझे इस प्रेत शरीर से मुक्ति मिल जाएगी।"
नगजी ने प्रेत की सब बात सुनी और हृदयंगम कर लिया। इसके बाद श्री पीताम्बर देव जी साम्हरि ग्राम में पधारे, समस्त जन उनके दर्शनों के लिए जाने लगे। श्री पीताम्बर देव सुकरी नदी के तट पर आए एवं स्नान कर प्रभु को पधराया। सामग्री तथा भोग मंगवाकर ठाकुर जी को भोग लगाया। श्री पीताम्बर देव जी ने ठाकुर प्रसाद पाया तथा नगजी उनके शीत प्रसाद को लेकर प्रेत के पास आए। प्रेत अति प्रसन्न हो प्रकट हुआ, और जैसे ही शीत प्रसाद मुख में लिया उसी क्षण भूमि पर गिर पड़ा तथा प्रेत शरीर से मुक्त हो गया।
श्री पीताम्बर देव जी के शीत प्रसाद का प्रताप ऐसा ही प्रेत भी मुक्त हो गया। गांव के लोगों ने जब श्री पीताम्बर देव जी का यह प्रभाव देखा तो सब जन उनके शिष्य हो गए। नगजी भी श्री पीताम्बर देव जी के शिष्य हो गए एवं उनका नाम श्री नागरी दास हुआ।
वाम मार्गीय बामाचार्य से भेंट एवं श्रीविग्रह का प्राकट्य :
इसके पश्चात् श्री पीताम्बर देव जी आगे बढ़ गए एवं चलते-चलते डूँगरपुर आये। श्री जुगलबिहारी जी के श्रीविग्रह को खोजने के लिए कुछ दिन के लिए वहीँ रुक गए। वहां वाम मार्ग के साधकों का निवास था जो हरि विमुख एवं व्यभिचारी थे। उनके आचार्य बड़े प्रबल महात्मा थे, जिनका नाम बामाचार्य था। समस्त प्रजाजन एवं वहां का राजा इनकी ही बात मानते थे।
बामाचार्य के संग नित्य ही 10 स्त्री रहती थीं। उसका निवास स्थान मंदिर के भाँती था और उसका सिंहासन बहुत सुन्दर था।
सिंहासन के चारों ओर अति कोमल तथा बहुमूल्य बिछौना बिछा था तथ हर तरफ पर्दा लगा था। मध्य में बामाचार्य विराजते एवं चारों ओर नग्न स्त्रियां उपस्थित रहतीं। बामाचार्य दिगम्बर रहते। वहां के राजा का इनमें अधिक प्रतीति थी। श्री पीताम्बर देव जी ने बामाचार्य की रीति सुनी, और कौतुक वश एक श्याम वर्ण की कामरी ओढ़ कर बामाचार्य के पास चले गए। बामाचार्य श्री पीताम्बर देव जी को देखते ही उठ खड़े हुए एवं दोनों हाथ जोड़ कर चरणों में प्रणाम किया। बामाचार्य ने एक कपड़े से अपना अंग ढक लिया तथा उन स्त्रियों का भी अंग ढक दिया। अपने सिंहासन पर श्री पीताम्बर देव जी को विराजमान कर हाथ जोड़ कर कहने लगे
"आप तो सिद्ध महापुरुष हैं, प्रसिद्ध हैं, इष्ट मन्त्र के जापक हैं, पहले मेरी क्रिया और रीति सुनिए एवं इसके पश्चात् अपनी रीति सुना कर मेरा भ्रम दूर कीजिये। स्त्री ही मेरी इष्ट हैं, आप मुझे विकारी न समझिये, मैं आपको विधिवत अपनी क्रिया बताता हूँ, मेरे आस-पास नग्न स्त्रियां उपस्थित रहतीं हैं लेकिन मेरा मन इनके ओर कभी नहीं जाता। मेरे समीप मास-मदिरा है लेकिन मैंने कभी इनका स्वाद नहीं लिया। मैंने अपनी समस्त इन्द्रियों को वश में कर रखा है। मैं जिसके समक्ष शीश झुकाता हूँ वह तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, मैं जिस प्रतिमा के समक्ष शीश झुकाता हूँ वह प्रतिमा उसी क्षण फट कर टुकड़े-टुकड़े हो जाती है। मैंने उठ कर आपके समक्ष शीश झुकाया लेकिन आपकी मृत्यु के स्थान पर यह उल्टा ही हो गया, आपका शरीर तो और सुन्दर हो गया। इसलिए मैं आपको कोटि-कोटि प्रणाम करता हूँ। आप यहाँ विश्राम कीजिये। यह बताइये की आपके इष्ट कौन हैं, मैं आपकी सेवा करना चाहता हूँ।"
बामाचार्य की वाणी को सुनकर श्री पीताम्बर देव जी कहने लगे
"प्रेम सहित सुनो, हम भी बाम धर्मी ही हैं, नित्य बिहारी जू हमारे इष्ट हैं जो सगुण एवं निर्गुण के सार रूप हैं। उन दिव्य दम्पति की हम बाम (सखी) हैं, यही हमारा बाम मार्ग है, हमारे इष्ट सबके कारण हैं एवं सबसे परे भी हैं, स्वयं प्रकाशक हैं। ऐसे हमारे इष्ट स्वछन्द रूप से विचरण करते हैं, जो परमानन्द सागर के फल हैं। अब हमारा एक काम करो, हमारा एक मनोरथ है जो सफल होने पर ही हमको सुख होगा, आप हिरे की खान से शिला लाइए और सुन्दर श्रीविग्रह बनवाइए तथा उसे वृन्दावन भेज दीजिये।"
बामाचार्य ने श्री पीताम्बर देव जी की वाणी सुनी तो हिरे की खान से शिला मंगवाई। शिला को देख श्री पीताम्बर देव जी हर्षित होने लगे। शिला से श्रीविग्रह बनाई गई, जिसके समस्त अंग अति सुन्दर थे।
डूँगरपुर से जयपुर पश्चात् वृन्दावन आगमन एवं श्री जुगलबिहारी जी की स्थापना :
श्री पीताम्बर देव श्री विग्रह को लेकर डूँगरपुर से जयपुर आये। यहाँ उन्होंने श्री राधारानी का सुन्दर श्रीविग्रह प्रकट किया। अब श्री ठाकुर जी एवं ठकुरानी जी की सुन्दर जोड़ी अति मधुर प्रतीत होती।
श्री पीताम्बर देव जी दोनों श्रीविग्रह लिए जयपुर से वृन्दावन आ गए। श्री रसिकदेव जी के दर्शन कर उनके चरणों में शाष्टांग दण्डवत किया। श्री रसिकदेव जी ने श्री पीताम्बर देव जी को उठा कर ह्रदय से लगाया और प्रसन्न हुए। श्री श्यामश्याम के सुन्दर श्रीविग्रह के दर्शन कर रसिक जनों को सुखानुभूति हुई। श्रीविग्रह को सूरज घाट में एक कुञ्ज में पधराया गया। श्रीविग्रह का नाम श्री जुगलबिहारी रखा एवं श्री पीताम्बर देव जी वहीँ निवास करने लगे।
पुष्कर तीर्थ में पुनः आगमन एवं निद्रा को जीतने का प्रसंग :
एक दिन श्री पीताम्बर देव जी वृन्दावन से पुष्कर तीर्थ आ गए। वहां नागबाड़ पर्वत के पास मंकन ऋषि का निवास स्थान था। श्री पीताम्बर देव जी संध्या समय यहीं आते और रात्रि में इष्ट का चिंतन करते।
जब भी इष्ट चिंतन करते उसी समय उन्हें निद्रा आती। श्री पीताम्बर देव जी ने निद्रा को जीतने का विचार किया। एक मास तक जागते रहे एवं एक क्षण के लिए भी पलकों को गिरने नहीं दिया। तब प्रकट रूप में निद्रा देवी श्री पीताम्बर देव जी के पास आयीं। श्री पीताम्बर देव जी को लगा जैसे श्री श्यामसुंदर ही मुझसे रीझ कर मेरे पास आये हैं। उसी समय निद्रा देवी ने श्री पीताम्बर देव जी से कहा की अब मैं कभी तुम्हारे पास नहीं आउंगी। इतना कह कर निद्रा देवी अंतर्ध्यान हो गयीं। श्री पीताम्बर देव जी इससे बड़े प्रसन्न हुए। इसके बाद श्री पीताम्बर देव जी के मन अनुसार कभी भी उन्हें निद्रा नहीं आयी।
श्री रसिकदेव जी का निकुंज प्रवेश, कलियुग प्रसंग, श्री पीताम्बर देव जी का गद्दी पर विराजना :
श्री वृन्दावन में विराजमान श्री रसिक देव जी ने एक दिन विचार किया की अब शरीर का त्याग कर निकुंज में प्रवेश करना चाहिए। उन्होंने अपने सब शिष्यों को बुलाया और अपने पास बैठाया और अति प्रसन्न हो कर पूछने लगे
"मेरे शरीर त्यागने का समय निकट आ गया है, इस स्थान का महंत किसको बनाना चाहिए। तुम सब जैसा कहोगे मैं वैसा ही करूँगा।"
शिष्य गण जानते थे की श्री पीताम्बर देव ही इस गद्दी के एकमात्र अधिकारी हैं, फिर भी गुरु के मुख से सुनने के लिए सबने कहा "हे गुरुदेव, हम आपके दास हैं, आप ही अपने मुख से प्रकाश कीजिये।"
श्री रसिकदेव जी सबके संकेतों को जान कर कहने लगे
"हे शिष्यगण, मेरे सत्य वचन का श्रवण करो, अपने मन में कोई ग्लानि न करना। कलियुग इस कुञ्ज के द्वार पर ही खड़ा है, मेरे कारण वह भीतर प्रवेश नहीं कर सकता। जब मैं शरीर का त्याग करूँगा तब कलियुग इस कुञ्ज में प्रवेश करेगा। तुम सब के रोके वह रुकेगा नहीं। उसने बड़े-बड़े देवता एवं ऋषियों को नचाया है। श्री स्वामी हरिदास के धर्म का रूप अति गंभीर है, जैसे बाघिन का दूध स्वर्ण पात्र में ही टिकता है अन्य पात्र में नहीं, उसी प्रकार यह अनन्य व्रत रुपी धर्म भी बिना पात्रता के समां नहीं सकता। यदि मेरे वचनों को सत्य मानते हो तो श्री पीताम्बर देव को यहाँ बुलाओ। उन्हीं से धर्म का बीज दृढ होगा एवं कलियुग का प्रभाव नहीं होगा।"
श्री रसिकदेव जी के वचन सबको अति प्रिय लगे और उन्होंने श्री पीताम्बर देव जी को पत्र लिखा और एक साधु के संग भेज दिया। पत्र को पाते ही श्री पीताम्बर देव जी वृन्दावन आये और गुरु चरणों में दण्डवत प्रणाम किया। गुरुदेव प्रसन्न हो इन्हें ह्रदय से लगा लिया। उसी क्षण श्री रसिकदेव जी ने श्री पीताम्बर देव जी के गले में अपनी कंठी बाँध दी, गले में माला पहनाई, चादर और गुदड़ी प्रदान की, विधिवत उनका अभिषेक किया। श्री पीताम्बर देव जी कुञ्ज में महंत रूप में विराजित हुए।
इसके पश्चात् श्री रसिकदेव जी अपना शरीर त्याग कर निकुंज में प्रवेश कर गए।
अखिल महत सभा के मणि तथा धर्म, धीर एवं गंभीर मति वाले श्री पीताम्बर देव जी गद्दी पर विराजमान हो सबका कल्याण करने लगे।

