जन्म :
1681 ई. के वैशाख कृ० 7 को श्रीहित हरिवंशजी महाराज के कुल में गोस्वामी श्रीरूप लालजी का जन्म हुआ। इनके पिता गोस्वामी श्रीहरिलालजी तथा माता श्रीकृष्णकुँवरि थीं।
बाल्यकाल : (श्री राधावल्लभ के दर्शन हेतु बाल-हठ)
उन दिनों यवन-शासकों का सर्वत्र आतंक था। भगवदर्चा-विग्रह भावुक-भक्तों द्वारा यत्र-तत्र छिपा दिए गए थे। श्रीराधावल्लभलालजी को कामवन के समीप अजानगढ़ में उन दिनों रक्खा गया था। श्रावण में श्रीयमुनाजी में बड़ी बाढ़ आई और अजानगढ़ डूबने लगा। इधर श्रीवन में बालक रूपलालजी ने अकस्मात् क्रन्दन प्रारम्भ किया और हठ पकड़ ली श्रीराधावल्लभजी के दर्शन की। पिता को विवश होकर इन्हें बाढ़ के कष्ट उठाकर भी अजानगढ़ ले जाना पड़ा। वहाँ पहुँच कर श्रीराधावल्लभलालजी के दर्शन करके यह प्रेम समाधि में मग्न हो गये। अपनी स्थिति भूलकर श्रीमन्दिर में जाने लगे और जब रोका गया तो रुदन करने लगे।
'श्रीराधावल्लभलालजी के चरणों का मैं स्पर्श करूँगा !' बालक का आग्रह अद्भुत था। बिना दीक्षादि संस्कार के, बिना स्नान किये श्रीमन्दिर में बालक को जाने देना उचित नहीं था। पिता ने समझाने की चेष्टा की, तो आप बाढ़ से उमड़ती यमुना में कूद पड़े -- 'स्नान मैं किये लेता हूँ'– कह कर।
नौ वर्ष के बालक की यह श्रद्धा, यह साहस अद्भुत था। पिता ने किसी प्रकार संभाला, स्नान कराया और संक्षिप्त रीति से मन्त्र दान करके अनुमति दे दी। मन्त्र श्रवण करके आप प्रेमावेश में आ गये और मन्दिर में जाकर श्रीराधावल्लभ के श्रीचरणों से लिपट गये। अपने प्रेमाश्रु से उन चरणों को आपने प्रक्षालित कर दिया। बड़ी कठिनाई से बड़ी देर में पिता आपको वहाँ से हटा सके और तब भी आप अञ्जलि बाँधे रुदन करते रहे।
बरसाना के साँकरी खोर में मतवाले हाथी का श्री रूपलाल जी को प्रणाम करना :
कुछ समय तक श्रीरूप लालजी पिता के साथ कामवन ही रहे। वहाँ से पीछे बरसाना होते श्रीवन आये। मार्ग में जब बरसाने की साँकरी-खोर होकर आ रहे थे, तब एक मतवाला हाथी इनकी पालकी की ओर आता दिखा। अङ्ग-रक्षक और कहार पालकी छोड़ कर भाग गये। इनके पिता घबरा उठे; किन्तु हाथी ने पालकी के पास आकर बालक रूपलाल का चरणस्पर्श किया अपनी सूँड से और शान्तभाव से से एक ओर चला गया। इस घटना से सभी प्रभावित हुए और इन्हें महापुरुष मानने लगे।
विद्याध्ययन एवं विवाह :
बचपन से ही श्रीरूप लालजी के भक्ति के प्रबल संस्कार थे। अपने हाथों रास-मण्डल की सोहनी (बुहारी) उल्लास सहित लगाया करते थे। विद्याध्ययन और विवाह-संस्कार 'के पश्चात् लगभग बीस वर्ष की अवस्था से आप भक्ति के प्रचार में लग गये और सम्पूर्ण समय भ्रमण करते बिताया।
विधि निषेध को लेकर पंडित गण एवं जयपुर नरेश से मतभेद :
ब्रज में ब्राह्मण पंडितों ने श्री रूपलाल जी से कहा कि
"आप संध्या कर्म इत्यादि नहीं करते?"
श्री रूपलाल जी ने उत्तर दिया "जो समय संध्या का है वही समय हमारी सेवा का है अर्थात प्रातः काल संध्या का समय है वही मंगला आरती का है और मध्यान्ह समय संध्या का है वही समय राज भोग का है एवं तीसरा समय सायंकाल संध्या का है वही समय हमारे प्रभु सेवा उत्थापन का है, इसलिये हम संध्या सेवा छोड़कर कुछ और नहीं करते। दूसरी बात यह कि जिन पुरुष की स्वांस से वेद प्रकट हुआ उसकी प्रणाली को करना ही वैदिक धर्म है परन्तु हम तो उन्हीं आदि पुरुष श्री राधावल्लभलाल की टहल परिचरिया किया करते हैं फिर हमको शाखा सिंचन से क्या।"
यह उत्तर सुन वे सब बहुत लज्जित हुए और जयपुर महाराज सवाई जयसिंह जी से चुगली की। पंडितों ने राजा से जाकर कहा कि श्री बन में गोस्वामी जी विराजते हैं परन्तु वैदिक धर्म नहीं करते तथा बिना वैदिक धर्म ब्राह्मणत्व ही नहीं। राजा श्री वृन्दावन आये और श्री रूपलाल जी से कहा कि आप संध्यादिक कर्म क्यों नहीं करते और आग्रह भी किया कि आपको यह वैदिक धर्म अवश्य करना चाहिये परन्तु श्री रूपलाल जी ने सेवा में बाधक समझ कर नहीं किया तब राजा ने क्षुभित होकर श्री रूपलाल जी की समस्त संपत्ति का अपहरण कर लिया और श्री रूपलाल जी श्री राधावल्लभलाल को साथ लेकर डोला सजवा सपरिवार श्री वृन्दावन से रोहतक नगर पधारे। वहां के राजा ने आपका बड़ा सम्मान किया और आपका सब वृत्तान्त जान कर ब्रज में आकर राजा जयसिंह को परास्त कर रोहतक नरेश ने कामवन राज पर अपना आधिपत्य किया और श्री रूपलाल जी को वहीं ठहरा लिये। श्री राधावल्लभ जी का मंदिर बनाकर स्थापना की और रूपलाल जी वहीं निवास करने लगे।
शिष्य द्वारा बरसाना में श्री वृषभानु मंदिर का निर्माण करवाना :
एक समय श्री रूपलाल जी के शिष्य सेवा सखी जी ने गौंडा के राजा को परिचय देकर शिष्य किया और एक लाख रुपया लेकर कामवन आए तथा श्री रूपलाल जी को भेंट किया। श्री रूपलाल जी ने आज्ञा दी कि इस संपत्ति से बरसाने में श्री वृषभानु जी का मंदिर बनाओ और श्री राधाअष्टमी का उत्सव भी वहीं होना चाहिये। यह आज्ञा सुनकर सेवा सखी जी ने मंदिर बनवाया और उत्सव इत्यादि विधिवत् किये। सेवा सखी जी ही ने इस मंदिर में मूर्ति स्थापना की और इन्ही के शिष्यों के आधीन यह मंदिर है।
तीर्थ यात्रा प्रारम्भ एवं गुजरात आगमन : (एक भावुक भक्त को श्री राधा कृष्ण के दर्शन करना)
एक यात्रा में गुजरात में श्रीरामकृष्ण मेहता के प्रेम के कारण श्री रूपलाल जी ने उनके घर आठ मास निवास किया। आपकी कृपा से मेहताजी को श्रीराधा कृष्ण के दर्शन हुए। ब्रजमण्डल की तो आपने अनेकों यात्रायें कीं। गोविन्द - कुण्ड पर निवास करके छः महीने एक गिरिराज शिला की आराधना की। उस शिला से श्रीयुगलकिशोर का श्रीविग्रह प्रकट हुआ अब वह श्रीविग्रह राधा - कुण्ड में विराजमान हैं।
प्रयाग में सिद्धि के प्रलोभन से बचना :
पूर्व भारत की यात्रा के समय प्रयाग में एक महात्मा ने श्री रूपलाल जी को एक नारियल दिया और कहा 'इसे खा लेने से अनेक सिद्धियाँ प्राप्त हो जायेंगी। लेकिन गोस्वामीजी ने नारियल लौटाते हुए कहा 'महाराज ! श्रीकृष्ण कृपा की इच्छा रखनेवाले के लिए सिद्धियाँ व्यर्थ हैं।'
अपने शिष्य की पुत्री का असाध्य रोग दूर करना :
प्रयाग से काशी होते श्री रूपलाल जी पटना पधारे। वहाँ रामदास वैष्णव के प्रेमाग्रह-वश उनके यहाँ विराजमान श्रीयुगलकिशोर का श्रीविग्रह आपने लेना स्वीकार किया। ये श्रीविग्रह अब वृन्दावन में विराजमान हैं। इस प्रकार आप पुरी तक पधारे। पूर्वभारत की यह यात्रा चार वर्ष में पूर्ण हुई। लौटते समय आपने आगरे में अपने शिष्य वैष्णव दयालदास की पुत्री विष्णीबाई का असाध्य रोग दूर किया।
बरसाना में श्री राधारानी का दर्शन :
जब श्री रूपलाल जी बरसाने पधारे तो श्रीराधाकिशोरीजी ने आपके भाव से प्रसन्न होकर आपको प्रत्यक्ष दर्शन दिया।
ग्रन्थ रचना :
गोस्वामी श्री रूपलाल जी ने छोटे-छोटे पद्य बद्ध ग्रन्थों की रचना की जिनमें उन्होंने अपनी काव्य प्रतिभा का उपयोग नित्य-विहार की रसमयी रचना के व्याख्यान में किया है। साथ ही लोक में प्रचलित उत्सवों में अपने भाव की प्रतिष्ठा करके उन्होंने नित्य-विहार के लीला-क्षेत्र को विस्तृत और लोक-भोग्य बनाने का प्रयास किया। उनकी साँझी लीला इसका उदाहरण है। उनसे पूर्व यह लीला राधावल्लभीय साहित्य में नहीं मिलती।
श्री रूपलाल जी के पदों की भाषा सरल और शब्द चयन सुन्दर है। पदों के अतिरिक्त इनके छोटे-छोटे अनेक स्वतन्त्र ग्रन्थ मिलते हैं जिनमें से अधिकांश दोहों में हैं। इनके पदों के दो संग्रह 'प्रथम विजय चौरासी' और 'द्वितीय विजय चौरासी' के नाम से प्रसिद्ध हैं जिनमें से प्रय्तेक में 84 पद संग्रहीत हैं।
अतिरिक्त रचित ग्रन्थ कुछ इस प्रकार हैं -
अष्टयाम सेवा प्रबन्ध, मानसी सेवा प्रबन्ध, नित्यविहार, गूढ़-ध्यान, पद सिद्धान्त, ब्रज-भक्ति, वाणीविलास-प्रभृति लगभग बीस ग्रन्थ उपलब्ध हुए हैं।
शिष्य परंपरा :
श्री रूपलाल जी के कई शिष्य हुए हैं जिनमे लालमुरलीधर, कस्तूरीबाई, श्री चाचाजी वृन्दावन दासजी, जनतिलोक, भानसखी, किशोरी दासजी प्रमुख थे।
निकुंज गमन :
श्री रूपलाल जी अपने अंतिम वर्षों में बरसाने में वासकर श्री प्रिया प्रीतम को लाड़ लड़ाने लगे और वहीं इन्होंने सं 1818 में देह त्याग कर निकुंज प्रवेश किया।
1681 ई. के वैशाख कृ० 7 को श्रीहित हरिवंशजी महाराज के कुल में गोस्वामी श्रीरूप लालजी का जन्म हुआ। इनके पिता गोस्वामी श्रीहरिलालजी तथा माता श्रीकृष्णकुँवरि थीं।
बाल्यकाल : (श्री राधावल्लभ के दर्शन हेतु बाल-हठ)
उन दिनों यवन-शासकों का सर्वत्र आतंक था। भगवदर्चा-विग्रह भावुक-भक्तों द्वारा यत्र-तत्र छिपा दिए गए थे। श्रीराधावल्लभलालजी को कामवन के समीप अजानगढ़ में उन दिनों रक्खा गया था। श्रावण में श्रीयमुनाजी में बड़ी बाढ़ आई और अजानगढ़ डूबने लगा। इधर श्रीवन में बालक रूपलालजी ने अकस्मात् क्रन्दन प्रारम्भ किया और हठ पकड़ ली श्रीराधावल्लभजी के दर्शन की। पिता को विवश होकर इन्हें बाढ़ के कष्ट उठाकर भी अजानगढ़ ले जाना पड़ा। वहाँ पहुँच कर श्रीराधावल्लभलालजी के दर्शन करके यह प्रेम समाधि में मग्न हो गये। अपनी स्थिति भूलकर श्रीमन्दिर में जाने लगे और जब रोका गया तो रुदन करने लगे।
'श्रीराधावल्लभलालजी के चरणों का मैं स्पर्श करूँगा !' बालक का आग्रह अद्भुत था। बिना दीक्षादि संस्कार के, बिना स्नान किये श्रीमन्दिर में बालक को जाने देना उचित नहीं था। पिता ने समझाने की चेष्टा की, तो आप बाढ़ से उमड़ती यमुना में कूद पड़े -- 'स्नान मैं किये लेता हूँ'– कह कर।
नौ वर्ष के बालक की यह श्रद्धा, यह साहस अद्भुत था। पिता ने किसी प्रकार संभाला, स्नान कराया और संक्षिप्त रीति से मन्त्र दान करके अनुमति दे दी। मन्त्र श्रवण करके आप प्रेमावेश में आ गये और मन्दिर में जाकर श्रीराधावल्लभ के श्रीचरणों से लिपट गये। अपने प्रेमाश्रु से उन चरणों को आपने प्रक्षालित कर दिया। बड़ी कठिनाई से बड़ी देर में पिता आपको वहाँ से हटा सके और तब भी आप अञ्जलि बाँधे रुदन करते रहे।
बरसाना के साँकरी खोर में मतवाले हाथी का श्री रूपलाल जी को प्रणाम करना :
कुछ समय तक श्रीरूप लालजी पिता के साथ कामवन ही रहे। वहाँ से पीछे बरसाना होते श्रीवन आये। मार्ग में जब बरसाने की साँकरी-खोर होकर आ रहे थे, तब एक मतवाला हाथी इनकी पालकी की ओर आता दिखा। अङ्ग-रक्षक और कहार पालकी छोड़ कर भाग गये। इनके पिता घबरा उठे; किन्तु हाथी ने पालकी के पास आकर बालक रूपलाल का चरणस्पर्श किया अपनी सूँड से और शान्तभाव से से एक ओर चला गया। इस घटना से सभी प्रभावित हुए और इन्हें महापुरुष मानने लगे।
विद्याध्ययन एवं विवाह :
बचपन से ही श्रीरूप लालजी के भक्ति के प्रबल संस्कार थे। अपने हाथों रास-मण्डल की सोहनी (बुहारी) उल्लास सहित लगाया करते थे। विद्याध्ययन और विवाह-संस्कार 'के पश्चात् लगभग बीस वर्ष की अवस्था से आप भक्ति के प्रचार में लग गये और सम्पूर्ण समय भ्रमण करते बिताया।
विधि निषेध को लेकर पंडित गण एवं जयपुर नरेश से मतभेद :
ब्रज में ब्राह्मण पंडितों ने श्री रूपलाल जी से कहा कि
"आप संध्या कर्म इत्यादि नहीं करते?"
श्री रूपलाल जी ने उत्तर दिया "जो समय संध्या का है वही समय हमारी सेवा का है अर्थात प्रातः काल संध्या का समय है वही मंगला आरती का है और मध्यान्ह समय संध्या का है वही समय राज भोग का है एवं तीसरा समय सायंकाल संध्या का है वही समय हमारे प्रभु सेवा उत्थापन का है, इसलिये हम संध्या सेवा छोड़कर कुछ और नहीं करते। दूसरी बात यह कि जिन पुरुष की स्वांस से वेद प्रकट हुआ उसकी प्रणाली को करना ही वैदिक धर्म है परन्तु हम तो उन्हीं आदि पुरुष श्री राधावल्लभलाल की टहल परिचरिया किया करते हैं फिर हमको शाखा सिंचन से क्या।"
यह उत्तर सुन वे सब बहुत लज्जित हुए और जयपुर महाराज सवाई जयसिंह जी से चुगली की। पंडितों ने राजा से जाकर कहा कि श्री बन में गोस्वामी जी विराजते हैं परन्तु वैदिक धर्म नहीं करते तथा बिना वैदिक धर्म ब्राह्मणत्व ही नहीं। राजा श्री वृन्दावन आये और श्री रूपलाल जी से कहा कि आप संध्यादिक कर्म क्यों नहीं करते और आग्रह भी किया कि आपको यह वैदिक धर्म अवश्य करना चाहिये परन्तु श्री रूपलाल जी ने सेवा में बाधक समझ कर नहीं किया तब राजा ने क्षुभित होकर श्री रूपलाल जी की समस्त संपत्ति का अपहरण कर लिया और श्री रूपलाल जी श्री राधावल्लभलाल को साथ लेकर डोला सजवा सपरिवार श्री वृन्दावन से रोहतक नगर पधारे। वहां के राजा ने आपका बड़ा सम्मान किया और आपका सब वृत्तान्त जान कर ब्रज में आकर राजा जयसिंह को परास्त कर रोहतक नरेश ने कामवन राज पर अपना आधिपत्य किया और श्री रूपलाल जी को वहीं ठहरा लिये। श्री राधावल्लभ जी का मंदिर बनाकर स्थापना की और रूपलाल जी वहीं निवास करने लगे।
शिष्य द्वारा बरसाना में श्री वृषभानु मंदिर का निर्माण करवाना :
एक समय श्री रूपलाल जी के शिष्य सेवा सखी जी ने गौंडा के राजा को परिचय देकर शिष्य किया और एक लाख रुपया लेकर कामवन आए तथा श्री रूपलाल जी को भेंट किया। श्री रूपलाल जी ने आज्ञा दी कि इस संपत्ति से बरसाने में श्री वृषभानु जी का मंदिर बनाओ और श्री राधाअष्टमी का उत्सव भी वहीं होना चाहिये। यह आज्ञा सुनकर सेवा सखी जी ने मंदिर बनवाया और उत्सव इत्यादि विधिवत् किये। सेवा सखी जी ही ने इस मंदिर में मूर्ति स्थापना की और इन्ही के शिष्यों के आधीन यह मंदिर है।
तीर्थ यात्रा प्रारम्भ एवं गुजरात आगमन : (एक भावुक भक्त को श्री राधा कृष्ण के दर्शन करना)
एक यात्रा में गुजरात में श्रीरामकृष्ण मेहता के प्रेम के कारण श्री रूपलाल जी ने उनके घर आठ मास निवास किया। आपकी कृपा से मेहताजी को श्रीराधा कृष्ण के दर्शन हुए। ब्रजमण्डल की तो आपने अनेकों यात्रायें कीं। गोविन्द - कुण्ड पर निवास करके छः महीने एक गिरिराज शिला की आराधना की। उस शिला से श्रीयुगलकिशोर का श्रीविग्रह प्रकट हुआ अब वह श्रीविग्रह राधा - कुण्ड में विराजमान हैं।
प्रयाग में सिद्धि के प्रलोभन से बचना :
पूर्व भारत की यात्रा के समय प्रयाग में एक महात्मा ने श्री रूपलाल जी को एक नारियल दिया और कहा 'इसे खा लेने से अनेक सिद्धियाँ प्राप्त हो जायेंगी। लेकिन गोस्वामीजी ने नारियल लौटाते हुए कहा 'महाराज ! श्रीकृष्ण कृपा की इच्छा रखनेवाले के लिए सिद्धियाँ व्यर्थ हैं।'
अपने शिष्य की पुत्री का असाध्य रोग दूर करना :
प्रयाग से काशी होते श्री रूपलाल जी पटना पधारे। वहाँ रामदास वैष्णव के प्रेमाग्रह-वश उनके यहाँ विराजमान श्रीयुगलकिशोर का श्रीविग्रह आपने लेना स्वीकार किया। ये श्रीविग्रह अब वृन्दावन में विराजमान हैं। इस प्रकार आप पुरी तक पधारे। पूर्वभारत की यह यात्रा चार वर्ष में पूर्ण हुई। लौटते समय आपने आगरे में अपने शिष्य वैष्णव दयालदास की पुत्री विष्णीबाई का असाध्य रोग दूर किया।
बरसाना में श्री राधारानी का दर्शन :
जब श्री रूपलाल जी बरसाने पधारे तो श्रीराधाकिशोरीजी ने आपके भाव से प्रसन्न होकर आपको प्रत्यक्ष दर्शन दिया।
ग्रन्थ रचना :
गोस्वामी श्री रूपलाल जी ने छोटे-छोटे पद्य बद्ध ग्रन्थों की रचना की जिनमें उन्होंने अपनी काव्य प्रतिभा का उपयोग नित्य-विहार की रसमयी रचना के व्याख्यान में किया है। साथ ही लोक में प्रचलित उत्सवों में अपने भाव की प्रतिष्ठा करके उन्होंने नित्य-विहार के लीला-क्षेत्र को विस्तृत और लोक-भोग्य बनाने का प्रयास किया। उनकी साँझी लीला इसका उदाहरण है। उनसे पूर्व यह लीला राधावल्लभीय साहित्य में नहीं मिलती।
श्री रूपलाल जी के पदों की भाषा सरल और शब्द चयन सुन्दर है। पदों के अतिरिक्त इनके छोटे-छोटे अनेक स्वतन्त्र ग्रन्थ मिलते हैं जिनमें से अधिकांश दोहों में हैं। इनके पदों के दो संग्रह 'प्रथम विजय चौरासी' और 'द्वितीय विजय चौरासी' के नाम से प्रसिद्ध हैं जिनमें से प्रय्तेक में 84 पद संग्रहीत हैं।
अतिरिक्त रचित ग्रन्थ कुछ इस प्रकार हैं -
अष्टयाम सेवा प्रबन्ध, मानसी सेवा प्रबन्ध, नित्यविहार, गूढ़-ध्यान, पद सिद्धान्त, ब्रज-भक्ति, वाणीविलास-प्रभृति लगभग बीस ग्रन्थ उपलब्ध हुए हैं।
शिष्य परंपरा :
श्री रूपलाल जी के कई शिष्य हुए हैं जिनमे लालमुरलीधर, कस्तूरीबाई, श्री चाचाजी वृन्दावन दासजी, जनतिलोक, भानसखी, किशोरी दासजी प्रमुख थे।
निकुंज गमन :
श्री रूपलाल जी अपने अंतिम वर्षों में बरसाने में वासकर श्री प्रिया प्रीतम को लाड़ लड़ाने लगे और वहीं इन्होंने सं 1818 में देह त्याग कर निकुंज प्रवेश किया।

