फूलन के हार डोर, फूलनि की माला - श्री नागरीदेव जी

फूलन के हार डोर, फूलनि की माला - श्री नागरीदेव जी

(राग विहागरौ)
फूलन के हार डोर, फूलनि की माला, फूल सौं रसिक नव रचित रसाला।
फूलन के आभरन फूल गूँथे केस घन, फूलन की सारी चोली फूली नव बाला॥ [1]
फूलन की सेज बनी फूल बैठे धन-धनी, फूलन के महल विचित्र बिसाला।
फूल सों बिलास हास फूली श्रीनागरीदास, फूलन की छबि देखी भई हौं निहाला॥[2]

- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी, श्रिंगार रस के पद (32)

नवल नागर रसिक शिरोमणि लाल ने बड़ी प्रफुल्लता से आज श्रीप्रियाजी का फूल श्रिंगार किया है । फूलों (प्रफुल्लता) की कलियों से ही उन्होंने हार की लड़ियों को सँजोया है और फूलों (प्रफुल्लता) की ही माला उन्हें धारण करायी है । फूलों (प्रफुल्लता) के अनेकानेक आभुषणों से वे सजी हैं और पुष्पों (प्रफुल्लता) से ही उन्होंने उनके काले घुघराले घने केशों को सजाया है । और तो और, फूलों (प्रफुल्लता) की लड़ियों से ही सुन्दर साड़ी एवं चोली की रचना हुई है, जिन्हें धारण करके श्रीप्रियाजी फूल उठी हैं। [1]

न जाने किन-किन मनोरथों से सुरभित पुष्पों (प्रफुल्लताओं) का चयन करके उन्होंने सुन्दर शय्या सजाई है। उस पर आनन्दोल्लास से भरे प्रिया-प्रियतम विराजमान हैं। निकुज में विचित्र और विशाल महल भी फूलों (प्रफुल्लताओं) से रचित हैं, फूलों (प्रफुल्लता) के ही हास-परिहास यहाँ पर होते हैं । फूलों (प्रफुल्लताओं) की इस अदुभुत छवि को देखकर कृतार्थ हुई श्रीनागरीदासी भी फूल उठी हैँ । [2]