यह अचरज देख्यौ न सुन्यौ कहूँ - श्री स्वामी हरिदास, केलीमाल (91)

यह अचरज देख्यौ न सुन्यौ कहूँ - श्री स्वामी हरिदास, केलीमाल (91)

(राग मलार)
यह अचरज देख्यौ न सुन्यौ कहूँ
नवीन मेघ संग बिजुरी एक रस ।
तामें मौज उठति अधिक बहु भाँति लस ।। [1]
मन के हरिवे कौं और सुखनहिंने
चितवत चितहिं करत बस ।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी
बिहारिनि जू कौ पवित्र जस ।। [2]

- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (91)

एक सखी अपनी अंतरंग सखी से कहती है: ऐसा आश्चर्य न ही कभी देखा है और न ही सुना है कि एक दामिनी [श्री राधा] एक नवीन मेघ [श्री कृष्ण] संग नित्य एक रस विलस रही हैं जिसमें अनंत प्रकार से विनोद उमड़ रहा है एवं जिसकी दीप्ति विभिन्न प्रकार से प्रकट हो रही है। [1]

इस दिव्य दम्पति [श्री राधा कृष्ण] को लगातार निहारने के अतिरिक्त मन को कहीं भी सुख प्राप्त नहीं होता है, जिनकी एक मधुर चितवन ही मन को वश में कर लेती है ।
श्री हरिदासी [ललिता अवतार] सखी के स्वामी श्री श्यामा कुंजबिहारी [राधा कृष्ण] का यह पवित्र यश है । [2]