परिचय :
श्री भक्तमाल में श्री नाभादास जी कहते हैं -
गुननिकर गदाधरभट्ट अति, सबहिन कौ लागै सुखद॥
सज्जन सुहृद् सुशील, वचन आरज प्रतिपालय।
निर्मत्सर निहकाम, कृपा करुणा कौ आलय॥
अनन्य भजन दृढ़ करनि, धर्यो वपु भक्तनि काजै।
परम धरम कौ सेतु, विदित वृन्दावन गाजै॥
भागौत सुधा बरषै वदन, काहू कौं नाहिन दुखद।
गुननिकर गदाधरभट्ट अति, सबहिन कौ लागै सुखद॥
- श्री भक्तमाल (138)
गदाधर भट्ट सभी गुणों के भण्डार थे और सभी को सुख देने वाले थे। वे स्वाभाविक रूप से एक सज्जन व्यक्ति थे और आचार्यों की शिक्षाओं के अनुसरण करनेवाले थे। वे ईर्ष्या और कामना जैसे दोषों से मुक्त थे, और दीन जनों के लिए कृपा और करुणा के सागर थे। ऐसा लगता था कि उन्होंने भक्तों के ह्रदय में अनन्य भजन को दृढ करने के लिए ही देह धारण किया था। वे परम धर्म श्री हरी के अनुराग के सेतु थे जो अंत समय तक वृन्दावन में ही रहे। उनके अंग-अंग से भागवत कथामृत की वर्षा होती थी जिससे सबको सुख होता था। गदाधर भट्ट सभी गुणों के भण्डार थे और सभी को सुख देने वाले थे।
जन्म एवं बाल्यकाल :
कुछ महापुरुष जन्म से दिव्य सद्गुण सम्पन्न होते हैं। श्रीगदाधरभट्टजी ऐसे ही महापुरुष थे। इन्हें बाल्यकाल से उज्ज्वल प्रतिभा, सुललित स्वर प्राप्त हुआ था और इनके साथ नम्रता, दया, संत सेवादि सद्गुण स्वभाव में आ बसे थे। आप श्याम सुन्दर की ललित लीला, अनुपम रूपमाधुरी तथा विनय के पद प्रायः स्वयं बनाकर बड़े प्रेम से गाया करते थे।
श्रीगदाधर भट्ट जी के पद को सुनकर श्री जीव गोस्वामी का पत्र भेजना :
श्रीगदाधर भट्ट जी के बनाये पद इनके यहाँ पधारे सन्त भी प्रायः कण्ठस्थ कर लिया करते थे। इस प्रकार दूर दूर तक इनके रचित पद साधुओं के द्वारा गाये जाने लगे।
श्रीवृन्दावन में श्रीजीवगोस्वामीजी ने किसी के मुख से श्रीगदाधरजी का एक पद सुना।
सखी, हौं स्याम रंग रँगी।
देखि बिकाइ गई वह मूरति सूरति माहिं पगी॥
संग हुतौ अपनौ सपनौ-सौ सोइ रही रस खोइ।
जागेहुं आगें दृष्टि परै सखि नेकु न न्यारौ होइ॥
एक जु मेरी अंखियन में निसिद्योस रह्यौ कर भौन।
गाय चरावन जात सुन्यौ सखि! सो धौं कन्हैया कौन॥
कासौं कहौं कौन पतियाबै, कौन करै बकवाद।
कैसें के कहि जात गदाधर गूंगे कौ गुड़ स्वाद॥
हे सखी! मैं तो श्याम के रंग में रंग गयी हूँ। मैं उनके रूप माधुरी में डूबी हुई बिक गयी हूँ। उनकी सुंदरता में मैंने खुद को खो दिया है। जब मैं सो जाती हूँ तो उनके सपने में स्वयं को विस्मृत कर बैठती हूँ, और जब मैं जागती हूँ, तो मुझे उनसे अलग कुछ भी नहीं दिखता। ऐसा लगता है जैसे मेरी आँखें उनके रूप में फंस गई हैं, जैसे रात में कमल के फूल में फंसा हुआ भौंरा। जब मैंने सुना कि वह गाय चराने गया है, मुझे नहीं पता कि कौनसे कन्हैया के विषय में लोग बातें कर रहे हैं [क्योंकि वे सदैव मेरे साथ ही रहते हैं]। मेरी बात कौन सुनेगा? मेरे कहने पर कौन विश्वास करेगा की यह कन्हैया की बातें सब बकवास है। मैं इसकी व्याख्या कैसे कर सकता हूँ? मैं उस गूंगे व्यक्ति की तरह हूँ जो गुड़ का स्वाद समझाने की कोशिश कर रहा है।
इस पद को सुनते ही जीव गोस्वामी जी प्रसन्न हुए और निराश भी, क्योंकि लेखक के पास शुद्ध भक्ति और प्रतिभा थी, लेकिन श्रीमती राधारानी का कोई उल्लेख नहीं था। फिर भी उन्होंने सोचा, मैं ऐसे भक्त का संग करना चाहता हूँ और उनके पद और सुनना चाहता हूँ। जब उन्हें पता चला कि गदाधर भट्ट ब्रज के बाहर कहीं रहते हैं, तो उन्होंने सोचा कि ऐसा भक्त वृंदावन धाम का है। इसलिए उन्होंने गदाधर भट्ट को दो विश्वासपात्रों के साथ एक पत्र भेजा। पत्र में रघुनाथ दास गोस्वामी द्वारा लिखित केवल यही एक श्लोक था -
अनाराध्य राधापदाम्भोजयुग्ममाश्रित्य वृन्दाटवीं तत्पदाकम्।
असम्भाष्य तद्भावगम्भीरचित्तान कुत:श्यामासिन्धो: रहस्यावगाह:॥
- स्व-संकल्प-प्रकाश-स्तोत्र (1)
जिसने श्री राधारानी के चरण रज की एक बार भी आराधना नहीं कि, उनके चरण चिन्ह से आच्छादित श्री ब्रज धाम की एक बार भी शरण ग्रहण नहीं की, उनको नित्य लाड़ लड़ाने वाले प्रेमी रसिक भक्तों से एक बार भी वार्ता नहीं कि, वह कितना मूर्ख है जो सोचता है कि वह श्री श्याम सुन्दर के रहस्य रुपी प्रेम समुद्र में अवगाहन करेगा।
वृन्दावन आगमन :
जीव गोस्वामी द्वारा भेजे गए दोनों संत गदाधर जी के ग्राम पहुँचे। प्रात:काल का समय था। सूर्योदय हुआ नहीं था। गदाधर जी दांतौन कर रहे थे। संतों ने उनसे ही पूछा- "इस ग्राम में गदाधर भट्ट जी का मकान कौन-सा है।" गदाधर भट्ट की प्रसन्नता का क्या पूछना। आज प्रात:काल ही संतों के दर्शन हुए और वे आये भी उन्हीं के यहाँ हैं। संतों की सेवा का सौभाग्य प्राप्त होगा, इनके मुख से भगवान का गुणानुवाद सुनने को मिलेगा। धन्य है आज का दिन। आनन्द के भावों में निमग्न भट्ट जी ने सहज ही संतों से पूछा- "आप लोग कहाँ से पधारे हैं।" संतों ने उत्तर दिया- "हम श्रीवृन्दावन से आये हैं।" 'श्रीवृन्दावन'! भट्ट जी के श्रवणों में यह शब्द पड़ा और वे धड़ाम से गिर पड़े मूर्च्छित होकर। दांतौन दूर गिर गया। नेत्रों से अश्रुप्रवाह चलने लगा। विचित्र दशा हो गयी उनकी। पहले से ही हृदय में भाव उमड़ रहा था। श्रीधाम वृन्दावन का नाम सुनते ही वह उद्दीप्त हो उठा। शरीर संज्ञाहीन हो गया। दोनों संतों ने चकित होकर संभाला उन्हें। लोगों से पता लगा कि गदाधर भट्ट जी तो यही हैं। तब संतों ने उनके कानों के पास मुख ले जाकर जोर से कहा- "हम वृन्दावन से आपके लिये एक पत्र ले आये हैं।" पत्र का नाम कानों मे जाते ही गदाधर भट्ट उठ बैठे। जैसे उनके प्राण इसी पत्र की प्रतीक्षा करते रहे हों। पत्र को लेकर उन्होंने मस्तक से, नेत्रों से, हृदय से लगाया। पत्र को बार-बार पढ़ते, अश्रु बहाते विह्वल होते रहे। संतों का भली प्रकार सत्कार किया और फिर सर्वस्व दीन-दु:खियों को बांटकर उन संतों के साथ ही वृन्दावन चले आये।
अब श्रीजीवगोस्वामीजी एवं श्री रघुनाथ दास गोस्वामी का सान्निध्य प्राप्त हो गया। गोस्वामीजी से भक्ति-शास्त्र का अध्ययन किया और अब वृन्दावन में श्रीमद्भागवत की कथा कहने लगे।
वृन्दावन में एक नारी द्वारा लाँछन लगाने का प्रयास :
श्रीगदाधरभट्ट की भावपूर्ण कथा सुनने दूर-दूर के लोग आने लगे। इन श्रोताओं में एक वृन्दावन के समीप धौरहरा ग्राम के रहने वाले राजपूत कल्याणसिंह थे। कल्याणसिंह शुद्ध-हृदयके थे, नियमित रूप से नित्य कथा सुनने आते थे। श्रद्धा तो थी ही, हृदय में भगवत्प्रेम का उदय हुआ। जब श्याम का प्रेम आता है तब संसार का प्रेम स्वतः छूट जाता है। कल्याणसिंह ने घर-द्वार छोड़ा तो नहीं; किन्तु सांसारिक विषयभोगों से उन्हें विरक्ति हो गई। वे एक संयमी साधककी भाँति रहने लगे।
कल्याणसिंह की पत्नी सामान्य नारी थी। पति का वैराग्य उसे बहुत कष्टदायक लगा। उसका रोष श्रीगदाधरभट्ट पर उमड़ा। उसे लगता था कि भट्टजी ने ही उसके पति को कुछ कर दिया है। फलतः भट्टजी से बदला लेने का उसने निश्चय किया। एक गर्भवती भिखारिन को रुपये देकर उसने भट्टजी को लांछन लगाने के लिये उद्यत कर लिया।
श्रीगदाधरभट्टजी कथा कर रहे थे। श्रोताओं का समाज एकत्र था। उसी समय वह भिखारिन आई और कहने लगी- 'महाराज ! यह आपका दिया गर्भ पूरा होने को आया। इसे लेकर मैं कहाँ भटकती फिरूँ ? अब तो मेरे रहने का कोई प्रबन्ध कीजिये !'
श्रोताओं में श्री गदाधर भट्ट जी के प्रति अपार श्रद्धा थी। अधिकांश लोग क्रोध में आ गये - 'झूठ बोलती है, निर्लज्ज कहीं की ! एक सन्त को बदनाम करना चाहती है ? मार डालो इसे !"
लेकिन श्रीगदाधरभट्ट बीच में बोल पड़े—'यह ठीक कहती है। आप लोग क्रोध न करें।' सब लोग आश्चर्य से स्तब्ध रह गये। उधर भट्टजी ने उस स्त्री से कहा - 'देवि ! तुम अब तक कहाँ थीं ? मैं तो तुम्हें बराबर स्मरण करता हूँ। अच्छा हुआ जो आज तुम आ गई। बैठो, कथा सुनो।'
धोताओं की समझ में नहीं आता था कि बात क्या है ? वे इस भिखारिन की बात मानने को उद्यत नहीं थे। दुःख से उनका हृदय व्याकुल हो रहा था। उनमें से एक सन्त उस भिखारिन को एक ओर बुला ले गये और शपथ देकर सच बात पूँछने लगे। उस भिखारिन का चित्त भी व्याकुल था। ऐसा महापुरुष जिसने भरे समाज में इतनी भद्दी बात कहने पर भी 'देवि' कहा, उसे एक कठोर शब्द जिसने नहीं सुनाया, उसे कलंकित करके किस नरक में जायगी वह। भिखारिन ने सन्त से सच्ची बात बता दी और फूट-फूट कर रोने लगी।
श्रीगदाधर भट्ट जी ने भिखारिन को आश्वासन दिया। श्रोताओं में आनन्द की लहर फैल गई। कल्याणसिंह के नेत्र अङ्गार बन गये। वे क्रोध से काँपने लगे। तलवार खींचकर वे उठे और घर जाने को मुड़े। महापुरुष को कलंकित करने की चेष्टा करने वाली स्त्री को मार देना चाहते थे। भट्टजी ने उन्हें रोक लिया। उन्हें समझाया और आदेश दिया कि अपनी स्त्री के साथ वे कोई कठोर व्यवहार न करे।
एक वैष्णव महन्तजी का प्रसंग जो नेत्रों में लाल मिर्च लगकर आँसु बहाता था :
भट्टजी की कथा में एक वैष्णव महन्तजी भी आया करते थे जो माया करते थे। सम्मानित होने के कारण उन्हें बैठने के लिए सम्मुख स्थान मिलता था। कथा में प्रायः सभी श्रोताओं के नेत्रों से अश्रु बहने लगते थे, किन्तु महन्तजी के नेत्रों में अश्रु आते ही नहीं थे। इससे महन्तजी को बड़ा संकोच होता था। महन्तजी एक पिसी लाल मिर्च की एक छोटी पोटली साथ ले आये। जब दूसरे श्रोता कथा में रुदन करने लगे तो महन्तजी ने भी नेत्र पोंछने के बहाने वह पोटली नेत्रों पर रगड़ दी। उनके नेत्रों से भी अश्रु गिरने लगे।
महन्तजी से सटकर पीछे बैठे श्रोता ने महन्तजी की इस क्रिया को देख लीया। उसने यह भी जान लिया कि पोटली में लालमिर्च है। कथा समाप्त होने पर वह श्रोता भट्टजीसे अकेले मिला और बोला - 'कथा में आने वाला महन्त बड़ा दम्भी है। उसके नेत्रों में आँसू नहीं आते तो लालमिर्च की पोटली आँखों पर रगड़ कर रोने का बहाना करता है।
गदाधर भट्ट जी तो भगवान् के परम भक्त थे। उन्हें भला दूसरे के दोष कहाँ दीख सकते थे ? उस व्यक्ति की बात सुनते ही उन महन्तजी के यहाँ चल पड़े। महन्तजी को प्रणिपात करके कहने लगे। - 'आप धन्य हैं ! आपका भगवत्प्रेम धन्य है ! हमने पढ़ा - सुना था कि भगवत्चर्चा सुनकर जिन नेत्रों में अश्रु न आवें, उन नेत्रों में धूलि डालना चाहिए; किन्तु आप तो इससे भी बढ़े भगवद्-भक्त निकले। नेत्रों को दण्ड देने के लिए आपने उनमें लालमिर्च लगाई।'
महन्तजी श्रीगदाधर भट्टजी के चरणों की ओर झुके। भट्टजी ने उन्हें हृदय से लगा लिया। अब दोनों महापुरुषों के नेत्रों से अश्रु धारा चल रही थी।
एक चोर का प्रसंग :
एकबार श्रीगदाधरभट्टजी की कुटिया में चोर आया। उसे जो कुछ मिला, उसने बाँध लिया। भट्टजी पड़े-पड़े सब देख रहे थे और प्रसन्न हो रहे थे कि माखन चोर न सही उसका कोई सङ्गीसाथी तो आया अपने यहाँ। गठरी भारी थी, चोरसे उठ नहीं रही थी। आप उठे और गठरी उठवादी। चोर ने पूछा- 'आप कौन हैं ?' गदाधरभट्टजी ने नाम बताया, तब तो गठरी फेंक कर वह उनके चरणों पर गिर पड़ा।
भट्टजी उसे समझाने लगे - 'भैया ! तुमने अँधेरी रात में आने का कष्ट किया। इतना श्रम और उठाया। अवश्य तुम्हारे बाल - बच्चे भूखे होंगे। तुम्हें आवश्यकता होगी, यह सब ले जाओ। संसार का जो पालन करता है, वह मुझे कल और दे देगा।'
चोर फूटकर रो पड़ा। कोमल हृदय भट्टजी द्रवित हो गये। उन्होंने चोर को चोरी न करने तथा भगवद्भजन का उपदेश किया।
भगवत सेवा प्रसंग :
एक बार श्रीगदाधर भट्टजी भगवत्प्रसाद प्रस्तुत करने के लिए चौका लगा रहे थे। इतने में एक सेवक ने सूचना दी - 'अमुक श्रद्धालु बहुत-सी भेंट लेकर आ रहे हैं। आप हाथ धोकर उनसे बात कर लें। मैं तब तक चौका लगाये देता हूँ।'
भट्टजी ने सेवक को समझाया - 'भगवत्सेवा से महान् और कोई कार्य नहीं। त्रिभुवन के स्वामी की सेवा छोड़ कर मैं किस का स्वागत करने उठूं। कोई श्रद्धालु आता है तो अच्छा ही है। मुझे भगवत्सेवा के कार्य में लगा देखकर वह भी प्रेरणा पावेगा।'
इस प्रकार भट्टजी ने सम्पूर्ण जीवन भगवत्सेवा, भगवद् गुणानुवाद में लगाया। उनके प्रवचन तथा सान्निध्य से बहुत-से प्राणी पवित्र हुए और भगवत्पथ में लगे।
ब्रज वास के प्रति निष्ठा :
श्री गदाधर भट्ट जी की ऐसी निष्ठा थी कि वह ब्रज धाम को छोड़ कर कदापि कहीं और नहीं जाना चाहते थे। इसका प्रमाण उन्ही के एक पद से प्राप्त होता है -
हौं ब्रज माँगनों जू। ब्रज तजि अनत न जाऊँ जू॥
बूढ़े-बड़े भूपति भूतल में दाता सूर सुजान जू।
कर न पसारों सिर न नवाऊं या ब्रज के अभिमान जू॥
- श्री गदाधर भट्ट, वाणी, उपदेश पद
श्री गदाधर भट्ट के लिए तो ब्रज-वृन्दावन वास ही उत्तम है, क्योंकि यह अभय प्रदान करने वाला है। इस ब्रजवास के अभिमान में तो श्री गदाधर भट्ट जी किसी के समक्ष मस्तक झुकाने तथा हाथ फैलाने तक को भी तैयार नहीं हैं।
निकुंज गमन :
इस प्रकार जीवन भर भगवदसेवा, श्रीमद्भागवत प्रवचन एंव संतों का सत्कार करते हुए श्रीगदाधर भट्ट जी वृन्दावन में ही रहे। अन्त में उनका पार्थिव शरीर उसी नित्य धाम की पावन रज में एक हो गया और उन्होंने अपने श्यामसुन्दर का शाश्वत सान्निध्य प्राप्त किया।
श्री भक्तमाल में श्री नाभादास जी कहते हैं -
गुननिकर गदाधरभट्ट अति, सबहिन कौ लागै सुखद॥
सज्जन सुहृद् सुशील, वचन आरज प्रतिपालय।
निर्मत्सर निहकाम, कृपा करुणा कौ आलय॥
अनन्य भजन दृढ़ करनि, धर्यो वपु भक्तनि काजै।
परम धरम कौ सेतु, विदित वृन्दावन गाजै॥
भागौत सुधा बरषै वदन, काहू कौं नाहिन दुखद।
गुननिकर गदाधरभट्ट अति, सबहिन कौ लागै सुखद॥
- श्री भक्तमाल (138)
गदाधर भट्ट सभी गुणों के भण्डार थे और सभी को सुख देने वाले थे। वे स्वाभाविक रूप से एक सज्जन व्यक्ति थे और आचार्यों की शिक्षाओं के अनुसरण करनेवाले थे। वे ईर्ष्या और कामना जैसे दोषों से मुक्त थे, और दीन जनों के लिए कृपा और करुणा के सागर थे। ऐसा लगता था कि उन्होंने भक्तों के ह्रदय में अनन्य भजन को दृढ करने के लिए ही देह धारण किया था। वे परम धर्म श्री हरी के अनुराग के सेतु थे जो अंत समय तक वृन्दावन में ही रहे। उनके अंग-अंग से भागवत कथामृत की वर्षा होती थी जिससे सबको सुख होता था। गदाधर भट्ट सभी गुणों के भण्डार थे और सभी को सुख देने वाले थे।
जन्म एवं बाल्यकाल :
कुछ महापुरुष जन्म से दिव्य सद्गुण सम्पन्न होते हैं। श्रीगदाधरभट्टजी ऐसे ही महापुरुष थे। इन्हें बाल्यकाल से उज्ज्वल प्रतिभा, सुललित स्वर प्राप्त हुआ था और इनके साथ नम्रता, दया, संत सेवादि सद्गुण स्वभाव में आ बसे थे। आप श्याम सुन्दर की ललित लीला, अनुपम रूपमाधुरी तथा विनय के पद प्रायः स्वयं बनाकर बड़े प्रेम से गाया करते थे।
श्रीगदाधर भट्ट जी के पद को सुनकर श्री जीव गोस्वामी का पत्र भेजना :
श्रीगदाधर भट्ट जी के बनाये पद इनके यहाँ पधारे सन्त भी प्रायः कण्ठस्थ कर लिया करते थे। इस प्रकार दूर दूर तक इनके रचित पद साधुओं के द्वारा गाये जाने लगे।
श्रीवृन्दावन में श्रीजीवगोस्वामीजी ने किसी के मुख से श्रीगदाधरजी का एक पद सुना।
सखी, हौं स्याम रंग रँगी।
देखि बिकाइ गई वह मूरति सूरति माहिं पगी॥
संग हुतौ अपनौ सपनौ-सौ सोइ रही रस खोइ।
जागेहुं आगें दृष्टि परै सखि नेकु न न्यारौ होइ॥
एक जु मेरी अंखियन में निसिद्योस रह्यौ कर भौन।
गाय चरावन जात सुन्यौ सखि! सो धौं कन्हैया कौन॥
कासौं कहौं कौन पतियाबै, कौन करै बकवाद।
कैसें के कहि जात गदाधर गूंगे कौ गुड़ स्वाद॥
हे सखी! मैं तो श्याम के रंग में रंग गयी हूँ। मैं उनके रूप माधुरी में डूबी हुई बिक गयी हूँ। उनकी सुंदरता में मैंने खुद को खो दिया है। जब मैं सो जाती हूँ तो उनके सपने में स्वयं को विस्मृत कर बैठती हूँ, और जब मैं जागती हूँ, तो मुझे उनसे अलग कुछ भी नहीं दिखता। ऐसा लगता है जैसे मेरी आँखें उनके रूप में फंस गई हैं, जैसे रात में कमल के फूल में फंसा हुआ भौंरा। जब मैंने सुना कि वह गाय चराने गया है, मुझे नहीं पता कि कौनसे कन्हैया के विषय में लोग बातें कर रहे हैं [क्योंकि वे सदैव मेरे साथ ही रहते हैं]। मेरी बात कौन सुनेगा? मेरे कहने पर कौन विश्वास करेगा की यह कन्हैया की बातें सब बकवास है। मैं इसकी व्याख्या कैसे कर सकता हूँ? मैं उस गूंगे व्यक्ति की तरह हूँ जो गुड़ का स्वाद समझाने की कोशिश कर रहा है।
इस पद को सुनते ही जीव गोस्वामी जी प्रसन्न हुए और निराश भी, क्योंकि लेखक के पास शुद्ध भक्ति और प्रतिभा थी, लेकिन श्रीमती राधारानी का कोई उल्लेख नहीं था। फिर भी उन्होंने सोचा, मैं ऐसे भक्त का संग करना चाहता हूँ और उनके पद और सुनना चाहता हूँ। जब उन्हें पता चला कि गदाधर भट्ट ब्रज के बाहर कहीं रहते हैं, तो उन्होंने सोचा कि ऐसा भक्त वृंदावन धाम का है। इसलिए उन्होंने गदाधर भट्ट को दो विश्वासपात्रों के साथ एक पत्र भेजा। पत्र में रघुनाथ दास गोस्वामी द्वारा लिखित केवल यही एक श्लोक था -
अनाराध्य राधापदाम्भोजयुग्ममाश्रित्य वृन्दाटवीं तत्पदाकम्।
असम्भाष्य तद्भावगम्भीरचित्तान कुत:श्यामासिन्धो: रहस्यावगाह:॥
- स्व-संकल्प-प्रकाश-स्तोत्र (1)
जिसने श्री राधारानी के चरण रज की एक बार भी आराधना नहीं कि, उनके चरण चिन्ह से आच्छादित श्री ब्रज धाम की एक बार भी शरण ग्रहण नहीं की, उनको नित्य लाड़ लड़ाने वाले प्रेमी रसिक भक्तों से एक बार भी वार्ता नहीं कि, वह कितना मूर्ख है जो सोचता है कि वह श्री श्याम सुन्दर के रहस्य रुपी प्रेम समुद्र में अवगाहन करेगा।
वृन्दावन आगमन :
जीव गोस्वामी द्वारा भेजे गए दोनों संत गदाधर जी के ग्राम पहुँचे। प्रात:काल का समय था। सूर्योदय हुआ नहीं था। गदाधर जी दांतौन कर रहे थे। संतों ने उनसे ही पूछा- "इस ग्राम में गदाधर भट्ट जी का मकान कौन-सा है।" गदाधर भट्ट की प्रसन्नता का क्या पूछना। आज प्रात:काल ही संतों के दर्शन हुए और वे आये भी उन्हीं के यहाँ हैं। संतों की सेवा का सौभाग्य प्राप्त होगा, इनके मुख से भगवान का गुणानुवाद सुनने को मिलेगा। धन्य है आज का दिन। आनन्द के भावों में निमग्न भट्ट जी ने सहज ही संतों से पूछा- "आप लोग कहाँ से पधारे हैं।" संतों ने उत्तर दिया- "हम श्रीवृन्दावन से आये हैं।" 'श्रीवृन्दावन'! भट्ट जी के श्रवणों में यह शब्द पड़ा और वे धड़ाम से गिर पड़े मूर्च्छित होकर। दांतौन दूर गिर गया। नेत्रों से अश्रुप्रवाह चलने लगा। विचित्र दशा हो गयी उनकी। पहले से ही हृदय में भाव उमड़ रहा था। श्रीधाम वृन्दावन का नाम सुनते ही वह उद्दीप्त हो उठा। शरीर संज्ञाहीन हो गया। दोनों संतों ने चकित होकर संभाला उन्हें। लोगों से पता लगा कि गदाधर भट्ट जी तो यही हैं। तब संतों ने उनके कानों के पास मुख ले जाकर जोर से कहा- "हम वृन्दावन से आपके लिये एक पत्र ले आये हैं।" पत्र का नाम कानों मे जाते ही गदाधर भट्ट उठ बैठे। जैसे उनके प्राण इसी पत्र की प्रतीक्षा करते रहे हों। पत्र को लेकर उन्होंने मस्तक से, नेत्रों से, हृदय से लगाया। पत्र को बार-बार पढ़ते, अश्रु बहाते विह्वल होते रहे। संतों का भली प्रकार सत्कार किया और फिर सर्वस्व दीन-दु:खियों को बांटकर उन संतों के साथ ही वृन्दावन चले आये।
अब श्रीजीवगोस्वामीजी एवं श्री रघुनाथ दास गोस्वामी का सान्निध्य प्राप्त हो गया। गोस्वामीजी से भक्ति-शास्त्र का अध्ययन किया और अब वृन्दावन में श्रीमद्भागवत की कथा कहने लगे।
वृन्दावन में एक नारी द्वारा लाँछन लगाने का प्रयास :
श्रीगदाधरभट्ट की भावपूर्ण कथा सुनने दूर-दूर के लोग आने लगे। इन श्रोताओं में एक वृन्दावन के समीप धौरहरा ग्राम के रहने वाले राजपूत कल्याणसिंह थे। कल्याणसिंह शुद्ध-हृदयके थे, नियमित रूप से नित्य कथा सुनने आते थे। श्रद्धा तो थी ही, हृदय में भगवत्प्रेम का उदय हुआ। जब श्याम का प्रेम आता है तब संसार का प्रेम स्वतः छूट जाता है। कल्याणसिंह ने घर-द्वार छोड़ा तो नहीं; किन्तु सांसारिक विषयभोगों से उन्हें विरक्ति हो गई। वे एक संयमी साधककी भाँति रहने लगे।
कल्याणसिंह की पत्नी सामान्य नारी थी। पति का वैराग्य उसे बहुत कष्टदायक लगा। उसका रोष श्रीगदाधरभट्ट पर उमड़ा। उसे लगता था कि भट्टजी ने ही उसके पति को कुछ कर दिया है। फलतः भट्टजी से बदला लेने का उसने निश्चय किया। एक गर्भवती भिखारिन को रुपये देकर उसने भट्टजी को लांछन लगाने के लिये उद्यत कर लिया।
श्रीगदाधरभट्टजी कथा कर रहे थे। श्रोताओं का समाज एकत्र था। उसी समय वह भिखारिन आई और कहने लगी- 'महाराज ! यह आपका दिया गर्भ पूरा होने को आया। इसे लेकर मैं कहाँ भटकती फिरूँ ? अब तो मेरे रहने का कोई प्रबन्ध कीजिये !'
श्रोताओं में श्री गदाधर भट्ट जी के प्रति अपार श्रद्धा थी। अधिकांश लोग क्रोध में आ गये - 'झूठ बोलती है, निर्लज्ज कहीं की ! एक सन्त को बदनाम करना चाहती है ? मार डालो इसे !"
लेकिन श्रीगदाधरभट्ट बीच में बोल पड़े—'यह ठीक कहती है। आप लोग क्रोध न करें।' सब लोग आश्चर्य से स्तब्ध रह गये। उधर भट्टजी ने उस स्त्री से कहा - 'देवि ! तुम अब तक कहाँ थीं ? मैं तो तुम्हें बराबर स्मरण करता हूँ। अच्छा हुआ जो आज तुम आ गई। बैठो, कथा सुनो।'
धोताओं की समझ में नहीं आता था कि बात क्या है ? वे इस भिखारिन की बात मानने को उद्यत नहीं थे। दुःख से उनका हृदय व्याकुल हो रहा था। उनमें से एक सन्त उस भिखारिन को एक ओर बुला ले गये और शपथ देकर सच बात पूँछने लगे। उस भिखारिन का चित्त भी व्याकुल था। ऐसा महापुरुष जिसने भरे समाज में इतनी भद्दी बात कहने पर भी 'देवि' कहा, उसे एक कठोर शब्द जिसने नहीं सुनाया, उसे कलंकित करके किस नरक में जायगी वह। भिखारिन ने सन्त से सच्ची बात बता दी और फूट-फूट कर रोने लगी।
श्रीगदाधर भट्ट जी ने भिखारिन को आश्वासन दिया। श्रोताओं में आनन्द की लहर फैल गई। कल्याणसिंह के नेत्र अङ्गार बन गये। वे क्रोध से काँपने लगे। तलवार खींचकर वे उठे और घर जाने को मुड़े। महापुरुष को कलंकित करने की चेष्टा करने वाली स्त्री को मार देना चाहते थे। भट्टजी ने उन्हें रोक लिया। उन्हें समझाया और आदेश दिया कि अपनी स्त्री के साथ वे कोई कठोर व्यवहार न करे।
एक वैष्णव महन्तजी का प्रसंग जो नेत्रों में लाल मिर्च लगकर आँसु बहाता था :
भट्टजी की कथा में एक वैष्णव महन्तजी भी आया करते थे जो माया करते थे। सम्मानित होने के कारण उन्हें बैठने के लिए सम्मुख स्थान मिलता था। कथा में प्रायः सभी श्रोताओं के नेत्रों से अश्रु बहने लगते थे, किन्तु महन्तजी के नेत्रों में अश्रु आते ही नहीं थे। इससे महन्तजी को बड़ा संकोच होता था। महन्तजी एक पिसी लाल मिर्च की एक छोटी पोटली साथ ले आये। जब दूसरे श्रोता कथा में रुदन करने लगे तो महन्तजी ने भी नेत्र पोंछने के बहाने वह पोटली नेत्रों पर रगड़ दी। उनके नेत्रों से भी अश्रु गिरने लगे।
महन्तजी से सटकर पीछे बैठे श्रोता ने महन्तजी की इस क्रिया को देख लीया। उसने यह भी जान लिया कि पोटली में लालमिर्च है। कथा समाप्त होने पर वह श्रोता भट्टजीसे अकेले मिला और बोला - 'कथा में आने वाला महन्त बड़ा दम्भी है। उसके नेत्रों में आँसू नहीं आते तो लालमिर्च की पोटली आँखों पर रगड़ कर रोने का बहाना करता है।
गदाधर भट्ट जी तो भगवान् के परम भक्त थे। उन्हें भला दूसरे के दोष कहाँ दीख सकते थे ? उस व्यक्ति की बात सुनते ही उन महन्तजी के यहाँ चल पड़े। महन्तजी को प्रणिपात करके कहने लगे। - 'आप धन्य हैं ! आपका भगवत्प्रेम धन्य है ! हमने पढ़ा - सुना था कि भगवत्चर्चा सुनकर जिन नेत्रों में अश्रु न आवें, उन नेत्रों में धूलि डालना चाहिए; किन्तु आप तो इससे भी बढ़े भगवद्-भक्त निकले। नेत्रों को दण्ड देने के लिए आपने उनमें लालमिर्च लगाई।'
महन्तजी श्रीगदाधर भट्टजी के चरणों की ओर झुके। भट्टजी ने उन्हें हृदय से लगा लिया। अब दोनों महापुरुषों के नेत्रों से अश्रु धारा चल रही थी।
एक चोर का प्रसंग :
एकबार श्रीगदाधरभट्टजी की कुटिया में चोर आया। उसे जो कुछ मिला, उसने बाँध लिया। भट्टजी पड़े-पड़े सब देख रहे थे और प्रसन्न हो रहे थे कि माखन चोर न सही उसका कोई सङ्गीसाथी तो आया अपने यहाँ। गठरी भारी थी, चोरसे उठ नहीं रही थी। आप उठे और गठरी उठवादी। चोर ने पूछा- 'आप कौन हैं ?' गदाधरभट्टजी ने नाम बताया, तब तो गठरी फेंक कर वह उनके चरणों पर गिर पड़ा।
भट्टजी उसे समझाने लगे - 'भैया ! तुमने अँधेरी रात में आने का कष्ट किया। इतना श्रम और उठाया। अवश्य तुम्हारे बाल - बच्चे भूखे होंगे। तुम्हें आवश्यकता होगी, यह सब ले जाओ। संसार का जो पालन करता है, वह मुझे कल और दे देगा।'
चोर फूटकर रो पड़ा। कोमल हृदय भट्टजी द्रवित हो गये। उन्होंने चोर को चोरी न करने तथा भगवद्भजन का उपदेश किया।
भगवत सेवा प्रसंग :
एक बार श्रीगदाधर भट्टजी भगवत्प्रसाद प्रस्तुत करने के लिए चौका लगा रहे थे। इतने में एक सेवक ने सूचना दी - 'अमुक श्रद्धालु बहुत-सी भेंट लेकर आ रहे हैं। आप हाथ धोकर उनसे बात कर लें। मैं तब तक चौका लगाये देता हूँ।'
भट्टजी ने सेवक को समझाया - 'भगवत्सेवा से महान् और कोई कार्य नहीं। त्रिभुवन के स्वामी की सेवा छोड़ कर मैं किस का स्वागत करने उठूं। कोई श्रद्धालु आता है तो अच्छा ही है। मुझे भगवत्सेवा के कार्य में लगा देखकर वह भी प्रेरणा पावेगा।'
इस प्रकार भट्टजी ने सम्पूर्ण जीवन भगवत्सेवा, भगवद् गुणानुवाद में लगाया। उनके प्रवचन तथा सान्निध्य से बहुत-से प्राणी पवित्र हुए और भगवत्पथ में लगे।
ब्रज वास के प्रति निष्ठा :
श्री गदाधर भट्ट जी की ऐसी निष्ठा थी कि वह ब्रज धाम को छोड़ कर कदापि कहीं और नहीं जाना चाहते थे। इसका प्रमाण उन्ही के एक पद से प्राप्त होता है -
हौं ब्रज माँगनों जू। ब्रज तजि अनत न जाऊँ जू॥
बूढ़े-बड़े भूपति भूतल में दाता सूर सुजान जू।
कर न पसारों सिर न नवाऊं या ब्रज के अभिमान जू॥
- श्री गदाधर भट्ट, वाणी, उपदेश पद
श्री गदाधर भट्ट के लिए तो ब्रज-वृन्दावन वास ही उत्तम है, क्योंकि यह अभय प्रदान करने वाला है। इस ब्रजवास के अभिमान में तो श्री गदाधर भट्ट जी किसी के समक्ष मस्तक झुकाने तथा हाथ फैलाने तक को भी तैयार नहीं हैं।
निकुंज गमन :
इस प्रकार जीवन भर भगवदसेवा, श्रीमद्भागवत प्रवचन एंव संतों का सत्कार करते हुए श्रीगदाधर भट्ट जी वृन्दावन में ही रहे। अन्त में उनका पार्थिव शरीर उसी नित्य धाम की पावन रज में एक हो गया और उन्होंने अपने श्यामसुन्दर का शाश्वत सान्निध्य प्राप्त किया।

