आज तू ग्वाल गोपाल सों खेलि री। [1]
छाँड़ि अति मान, बन चपल चलि भामिनी,
तरु तमाल सों अरुझि कनक-की-बेलि री॥ [2]
सुभट सुंदर ललन, ताप परबल दमन,
तू व ललना रसिक काम की केलि री। [3]
बेनु कानन कुनित, श्रवन सुंदरी सुनत,
मुक्ति सम सकल सुख पाय पग पेलि री॥ [4]
विरह-व्याकुल नाथ गान गुन जुवति तव,
निरखि मुख, काम कौ कदम अबहेलि री॥ [5]
सुनत हरिवंश हित, मिलत राधा-रमन,
कंठ भुज मेलि, सुख-सिंधु रस झेलि री॥ [6]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (14)
सखी भावापन्न श्री हित हरिवंश श्रीराधा से कहते हैं “आज तुम गोपकुमार मदन गोपाल के साथ क्रीड़ा करो।” [1]
हे भामिनी, अपना अत्यन्त मान छोड़कर शीघ्र वन में चलो और वहाँ तरु तमाल के समान श्याम वर्ण अपने प्रियतम से कनक-लता के समान गाढ़ आलिंगन में आबद्ध हो जाओ। [2]
सुन्दर ललन श्रीश्यामसुन्दर महायोद्धा के समान कामदेव की सेना का दमन करने वाले हैं और है ललना, तुम रसिकतामयी काम-कलि हो।
(श्रीराधावल्लभीय रस रीति में श्रीश्यामसुन्दर भोक्ता और श्रीप्रिया भोग्य हैं। यहाँ सुन्दर ललन को कामदेव की सेना को दमन करने वाला बतलाकर उनका भोक्ता स्वरूप एवं श्रीराधा को काम की केलि कहकर भोग्य स्वरूप ध्वनित किया गया है और इस प्रकार दोनों की परस्पर पूरकता सिद्ध की गई है।) [3]
हे सुन्दरि, वृन्दाकानन में वेणु बज रही है। उसको सुनकर मुक्ति के समान पूर्ण सुख को भी पैरों से ठेल दो। (और चलकर प्रियतम से मिलो।) [4]
हे युवति, तुम्हारे नाथ श्रीश्यामसुन्दर विरह से व्याकुल हो रहे हैं और तुम्हारा गुणगान कर रहे हैं। तुम उनका दर्शन करके उनकी विरह वेदना को दूर कर दो। [5]
सखी भावापन्न श्री हित हरिवंश कहते हैं कि यह सुनते ही श्रीराधा अपने प्रियतम को मिल गईं और दोनों परस्पर कंठों में भुजा डालकर सुख सिन्धु में निमग्न हो गये। [6]
छाँड़ि अति मान, बन चपल चलि भामिनी,
तरु तमाल सों अरुझि कनक-की-बेलि री॥ [2]
सुभट सुंदर ललन, ताप परबल दमन,
तू व ललना रसिक काम की केलि री। [3]
बेनु कानन कुनित, श्रवन सुंदरी सुनत,
मुक्ति सम सकल सुख पाय पग पेलि री॥ [4]
विरह-व्याकुल नाथ गान गुन जुवति तव,
निरखि मुख, काम कौ कदम अबहेलि री॥ [5]
सुनत हरिवंश हित, मिलत राधा-रमन,
कंठ भुज मेलि, सुख-सिंधु रस झेलि री॥ [6]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (14)
सखी भावापन्न श्री हित हरिवंश श्रीराधा से कहते हैं “आज तुम गोपकुमार मदन गोपाल के साथ क्रीड़ा करो।” [1]
हे भामिनी, अपना अत्यन्त मान छोड़कर शीघ्र वन में चलो और वहाँ तरु तमाल के समान श्याम वर्ण अपने प्रियतम से कनक-लता के समान गाढ़ आलिंगन में आबद्ध हो जाओ। [2]
सुन्दर ललन श्रीश्यामसुन्दर महायोद्धा के समान कामदेव की सेना का दमन करने वाले हैं और है ललना, तुम रसिकतामयी काम-कलि हो।
(श्रीराधावल्लभीय रस रीति में श्रीश्यामसुन्दर भोक्ता और श्रीप्रिया भोग्य हैं। यहाँ सुन्दर ललन को कामदेव की सेना को दमन करने वाला बतलाकर उनका भोक्ता स्वरूप एवं श्रीराधा को काम की केलि कहकर भोग्य स्वरूप ध्वनित किया गया है और इस प्रकार दोनों की परस्पर पूरकता सिद्ध की गई है।) [3]
हे सुन्दरि, वृन्दाकानन में वेणु बज रही है। उसको सुनकर मुक्ति के समान पूर्ण सुख को भी पैरों से ठेल दो। (और चलकर प्रियतम से मिलो।) [4]
हे युवति, तुम्हारे नाथ श्रीश्यामसुन्दर विरह से व्याकुल हो रहे हैं और तुम्हारा गुणगान कर रहे हैं। तुम उनका दर्शन करके उनकी विरह वेदना को दूर कर दो। [5]
सखी भावापन्न श्री हित हरिवंश कहते हैं कि यह सुनते ही श्रीराधा अपने प्रियतम को मिल गईं और दोनों परस्पर कंठों में भुजा डालकर सुख सिन्धु में निमग्न हो गये। [6]

