तेई रसिक अनन्य जानिवै - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्द्ध (178)

तेई रसिक अनन्य जानिवै - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्द्ध (178)

(राग रामकली)
तेई रसिक अनन्य जानिवै।
जिनकौ विषय-विकार न, हरिसौं रति, तेई साधु मानिवै॥ [1]
तिनकी संगति पतित सु उध्दरै, जौ वारक घर आनिवे।
तिनके चरनोदकसौं अपनैं, नख-शिख गातिन सानिवै॥ [2]
तिनकी पावन जूठनि जैंवत, तबहीं हरि हिय आनिवै।
तिनके वचन श्रवन सुनि तिहिं छिन, मन-संदेह भानिवै॥ [3]
तिनकी जीवनि-धन वृंदावन, जीवत मरत बखानिवै।
व्यास राधिका-रवन भवन बिनु, तेई क्यौं पहिचानिवै॥ [4]

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्द्ध (178)

श्री हरिराम व्यास कहते हैं "जिनका अंतःकरण विषय-विकार से शून्य हो गया है एवं श्री हरि के प्रेम में डूबा हुआ है, ऐसे साधु जनों को ही रसिक अनन्य मानना चाहिए।" [1]

यदि कोई पतित जीव ऐसे रसिकों को एक बार भी अपने घर में बुलाकर उनका चरणामृत लेकर अपने शरीर पर छिड़क कर मुख में ग्रहण करता है तथा उनका संग करता है, तो उस पतित जीव का निश्चित ही उद्धार हो जायेगा। [2]

जो भी साधक रसिक अनन्य की जूठन को महाप्रसाद समझ कर ग्रहण करता है, उसके हृदय में ही श्री हरि प्रकट होते हैं। उनके वचनों का श्रवण करने पर तत्क्षण मन के सब संदेह मिट जाते हैं। [3]

रसिक अनन्य जनों का जीवन धन एकमात्र श्री धाम वृन्दावन है, जिसका वे अंत समय तक बखान करते रहते हैं। श्री हरिराम व्यास कहते हैं "श्री श्यामा श्याम की नित्य-विहार लीला स्थली श्री वृन्दावन की शरण आये बिना ऐसे रसिक अनन्यों को भला कौन पहचान सकता है।" [4]