श्रीराधा मोरी एक अरज चित लावौ - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (57)

श्रीराधा मोरी एक अरज चित लावौ - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (57)

श्रीराधा मोरी एक अरज चित लावौ।
तुम सरबज्ञ सुजान सिरोमणि करुणासिंधु कहावौ॥ [1]
और न कोउ हितू मो जग में जाके पास भ्रमावो।
दासी दीन परी द्वारे पै श्रीबनराज बसावौ॥ [2]

- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (57)

हे श्री राधा, आपको सब सर्वज्ञ कहते हैं, सुजान शिरोमणि कहते हैं, करुणासिंधु कहते हैं, कृपया मेरी एक विनती को अपने चित्त में धारण कीजिये। [1]

श्री लाल बलबीर कहते हैं "मेरा हित चाहने वाला आपके सिवा इस संसार में और कोई नहीं है इसलिए मैं और अब किसके द्वार जाऊं, मैं आपकी दासी आपके द्वार पर पड़ी हूँ, मेरी यही विनती है आपसे की मुझे अपने दिव्य धाम श्री वृन्दावन का नित्य वास प्रदान कीजिये।" [2]