श्री स्वामी हरिदास को, अनुगत जो जन होई।
नित्यविहार निरखै सदा, सखी तन रूप समोई॥
- श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (4)
जो जन अनन्य रूप से ललिता-अवतार स्वामी श्री हरिदास जी के सच्चे भाव से अनुगत होता है, वह सखी-भाव को प्राप्त होकर सदा श्री श्यामा-श्याम के अद्भुत नित्य-विहार का दर्शन करता रहता है।

