आजु हौं गई ही बीर सहज निकुञ्जन में,
कौतुक बिलोकि तहां सब सुखदानी के। [1]
कहत बने न मोपे अचरज बात हठी,
कहि कहि हारे मुख चार वेद बानी के॥ [2]
श्रवन सुनै न मानै आंखिन दिखाऊँ तोहि,
चलि दुर मेरे साथ चरित गुमानी के। [3]
लूटै सुख मौटै करै मनुहार कोटै बैठे,
पायन पलोटै लाल राधा महारानी के॥ [4]
- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (78)
श्री हठी जी एक सखी से कहतीं हैं "अरे सखी, मेरी बात सुन, मैं आज सहज ही निकुंज में चली गयी, वहाँ सब सुख प्रदान करने वाले श्री श्यामाश्याम का विचित्र कौतुक देखा।" [1]
बड़ी आश्चर्यचकित बात है, वह दृश्य मुझसे कहते नहीं बनता, जिसे कहते-कहते चारों वेद भी हार गए हैं। [2]
सखी, यदि तू सुनेगी तो तुझे विश्वास नहीं होगा, तू मेरे साथ चल, मैं तुझे उन गुमानी (श्री राधारानी) की इस अद्भुत लीला का दर्शन कराती हूँ। [3]
श्री कृष्ण तो वहां निकुंज में बैठ कर श्री राधा महारानी से मनुहार कर, उनकी चरण सेवा का विशेष सुख लूट रहे हैं। [4]
कौतुक बिलोकि तहां सब सुखदानी के। [1]
कहत बने न मोपे अचरज बात हठी,
कहि कहि हारे मुख चार वेद बानी के॥ [2]
श्रवन सुनै न मानै आंखिन दिखाऊँ तोहि,
चलि दुर मेरे साथ चरित गुमानी के। [3]
लूटै सुख मौटै करै मनुहार कोटै बैठे,
पायन पलोटै लाल राधा महारानी के॥ [4]
- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (78)
श्री हठी जी एक सखी से कहतीं हैं "अरे सखी, मेरी बात सुन, मैं आज सहज ही निकुंज में चली गयी, वहाँ सब सुख प्रदान करने वाले श्री श्यामाश्याम का विचित्र कौतुक देखा।" [1]
बड़ी आश्चर्यचकित बात है, वह दृश्य मुझसे कहते नहीं बनता, जिसे कहते-कहते चारों वेद भी हार गए हैं। [2]
सखी, यदि तू सुनेगी तो तुझे विश्वास नहीं होगा, तू मेरे साथ चल, मैं तुझे उन गुमानी (श्री राधारानी) की इस अद्भुत लीला का दर्शन कराती हूँ। [3]
श्री कृष्ण तो वहां निकुंज में बैठ कर श्री राधा महारानी से मनुहार कर, उनकी चरण सेवा का विशेष सुख लूट रहे हैं। [4]

