भयौ न रसिकन संग जौ, रँग्यौ न मन रँग प्रेम।
पारस बिन परसे कहौ, होत लोह तें हेम॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन शत (26)
रसिक भक्तों के संग के अभाव में और प्रेम-रंग में रंगे बिना मन वश में नहीं होता, जैसे पारस-मणि के स्पर्श के बिना लौह-धातु कदापि स्वर्ण-रूप में परिवर्तित नहीं होती।
पारस बिन परसे कहौ, होत लोह तें हेम॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन शत (26)
रसिक भक्तों के संग के अभाव में और प्रेम-रंग में रंगे बिना मन वश में नहीं होता, जैसे पारस-मणि के स्पर्श के बिना लौह-धातु कदापि स्वर्ण-रूप में परिवर्तित नहीं होती।

