श्री सूरदास जी की जीवनी

श्री सूरदास जी की जीवनी

परिचय :
श्री नाभादास जी श्री सूरदास जी के सम्बन्ध में भक्तमाल में वर्णन करते हैं -

सूर कवित सुनि कौन कबि जो नहिं सिर चालन करै॥
उक्ति चोज अनुप्रास बरन अस्थिति अति भारी।
वचन प्रीति निर्बाह अर्थ अद्भुत तुक धारी॥
प्रतिबिंबित दिवि दृष्टि हृदय हरि लीला भासी।
जनम करम गुन रूप बसै रसना परकासी॥
बिमल बुद्धि गुन और की जो वह गुन श्रवननि धरै।
सूर कवित सुनि कौन कबि जो नहिं सिर चालन करै॥
- श्री नाभादास जी, भक्तमाल (73)

सूरदास की कवितामें अनूठी उक्तियाँ, सारगर्भित कल्पना और सुन्दर अनुप्रास भरे पड़े हैं। वर्णोंकी स्थिति - शब्द विन्यास जगह-जगहपर प्रचुर मात्रा में मिलता है। कविता के प्रारम्भ में उन्होंने जिस प्रेम प्रबन्धको उठाया उसका अन्त तक निर्वाह किया। उनके शब्दों में आश्चर्यजनक व्यञ्जना है और तुकें ( अन्त्यानुप्रास ) भी ठीक-ठीक मिलाये गये हैं। प्रभु कृपासे आपको दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई जिससे भगवानकी लीला आपके हृदयपर यथावत् अंकित हो गई। इसलिए अपने प्रभु के जन्म, कर्म, गुण, रूप--सबका वर्णन अपनी जीभ (वाणी) द्वारा किया। जो कोई श्रीसूरदास जी द्वारा गाये गए भगवानके गुणोंको अपने कानोंसे सुनता है उसकी बुद्धि निर्मल गुणोंसे युक्त हो जाती है। ऐसा शायद ही कोई जड़ व्यक्ति होगा जो श्रीसूरदास जी की कविताको सुनकर प्रशंसा में सिर न हिलाने लगे।

जन्म एवं वंश परंपरा : 
स्वयं श्री सूरदास जी ने अपनी वंश परंपरा के सम्बन्ध में "साहित्य लहरी" में एक पद द्वारा बताया है की महाराज पृथु के यज्ञ से एक शिशु प्रकट हुआ था जिसका नाम ब्रह्मराव रखा गया। 

प्रथम पृथु याग तें भे प्रगट अद्भुत रूप।
ब्रह्मराव विचारि ब्रह्मा राखु नाम अनूप॥

श्री पृथु जी के वंश में प्रकट होने से ये ब्राम्हण हुए। इन्हीं ब्रह्मराव के वंश में आगे चलकर बड़े वीर और पराक्रमी राजा चंद हुए जो ज्वालादेश के शाशक थे। इसी वंश में सं 1478 में सूरजचंद (सूरदास) जी का जन्म हुआ जो जन्म से ही अंधे थे।

“भयो सप्तो नाम सूरजचंद मंद निकाम”

बाल्यकाल :
श्री सूरदास के पिता बहोत बड़े संगीतज्ञ थे अतएंव श्री सूरदास जी बचपन से ही संगीत की शिक्षा ग्रहण करने लगे। ये एकतारा वाद्ययंत्र बजाते एवं गाने का अभ्यास करते। श्री सूरदास जी बड़े तीक्ष्ण बुद्धि संपन्न थे एवं शास्त्र ज्ञान होने से भगवान के विनय के पद बनाकर भगवान को गाकर सुनाते। 

श्री कृष्ण स्वयं आये और सूरदास के प्राणों की रक्षा की तथा वरदान दिया :
एक समय युद्ध में सूरजचंद का पूरा परिवार मारा गया, लेकिन सूरजचंद अंधे होने के कारण युद्ध न कर सके। किसी कारण वे रणभूमि के समीप ही एक कुँए में गिर गए। कुँए में वे सहायता के लिए पुकारते लेकिन किसी ने उनकी आवाज़ नहीं सुनी। सात दिन बीतने पर स्वयं श्री कृष्ण आये और सूरजचंद के प्राणों की रक्षा की। श्री कृष्ण ने सूरजचंद का हाथ पकड़कर उन्हें कुँए से बाहर निकाला।
श्री कृष्ण के स्पर्श से ही सूरजचंद को ज्ञान हो गया की ये कोई और नहीं स्वयं भगवान ही हैं। सूरजचंद ने झट से श्री कृष्ण का हाथ पकड़ लिया लेकिन श्री कृष्ण अपना हाथ छुड़ाकर जाने लगे। इसपर सूरजचंद ने कहा 

कर छुटकाए जात हौ, निबल जानि कर मोहि।
हिरदय सों जब जाहुगे, मरद बदींगो तोहि॥
मुझे निर्बल समझ कर मेरा हाथ छुड़ाकर जा रहे हो, लेकिन जब मेरे ह्रदय से जाओगे, तभी मैं आपको बलवान कहूँगा।

इसपर भगवान ने प्रसन्न होकर उनकी आँखें खोल दीं, जिससे उनको दर्शन प्राप्त हुआ। भगवान के दर्शन पाने का उल्लेख सूर ने अपनी सूर सारावली में भी किया है

"दर्शन दियो कृपा करि मोहन, नेग दियो बरदान॥"
श्री कृष्ण ने कृपा करके मुझे अपना दर्शन दिया एवं वरदान भी दिया। 

श्री कृष्ण ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। सूरजचंद ने 3 वरदान मांगे। प्रथम वरदान तो सूरजचंद ने अनन्य भक्ति मांगी, दूसरे वरदान में कहा की हमारे शत्रुओं का नाश हो तथा तीसरा वरदान यह माँगा की मैंने जिन आँखों से आपका दर्शन किया है उन आँखों से किसी और को कभी देखने न पाऊँ। श्री कृष्ण ने "ऐसा ही होगा" कहकर आश्वासन दिया और कहा की "दक्षिण के प्रबल-ब्राह्मण-कुल के द्वारा तुम्हारे शत्रुओं का नाश होगा और तुम बुद्धि, विचार और विद्या से युक्त होगे।"
श्री कृष्ण से सूरजचंद को सूरदास एवं सूरश्याम नाम प्रदान किया तथा अंतर्ध्यान हो गए। अब सूरजचंद का नाम श्री सूरदास हो गया। 
यहाँ पर सूरदास ने जो वरदान माँगा उसका यह अर्थ भी निकलता है की उन्होंने अपने भीतर काम, क्रोध, लोभादि शत्रुओं के नाश का वरदान माँगा जिसपर भगवान ने कहा की दक्षिण के ब्राह्मण द्वारा तुम्हारे शत्रुओं का नाश होगा। तो ये दक्षिण के ब्राह्मण कोई और नहीं बल्कि महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य थे जिन्होंने श्री सूरदास के अंतःकरण में भगवद प्रेम का संचार किया। 

वैराग्य :
भगवान के दर्शन होते ही श्री सूरदास ने यह प्रण कर लिया की ब्रजवास का सुख ही अपने चित्त में धारण करूँगा।
श्री सूरदास जी ब्रज के समीप में आगरा तथा मथुरा के बिच गऊघाट में आकर रहने लगे। वहाँ बहुत लोग इनके गाने से आकर्षित होकर इनके पास आते जिसमें से कई लोग इनके सेवक हो गए। श्री सूरदास जी पद रचना करते तथा बड़े सुर में गाते।

दीक्षा एवं भगवान की समस्त लीलाओं का ह्रदय में स्फुरण होना :
एक समय महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी अड़ैल, प्रयाग से गऊघाट पधारे। यहाँ महाप्रभु ने स्नानादि कर संध्या वंदन किया, फिर ठाकुर जी के लिए पाक सिद्ध करने लगे। 
यहाँ एक सेवक ने श्री सूरदास जी को सूचना दी की पास ही में महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य अपने अनेक अनुयायियों सहित पधारे हैं। ये दक्षिण भारत से दिग्विजय करते आ रहे हैं तथा समस्त पंडित एवं विद्वानों को परास्त कर श्री कृष्ण के भजन मार्ग में लगाया है।
श्री सूरदास जी ने सेवक की बात सुनी तो उससे कहा "तुम वहीँ जाओ और दूर बैठ कर देखते रहो। जैसे ही महाप्रभु प्रसाद ग्रहण कर आसन पर विराजेंगे उसी समय आकर मुझे सूचित करना तब मैं उनके दर्शन करने जाऊंगा।"
वह सेवक दूर जाकर बैठ गया। महाप्रभु ने पाक सिद्ध कर श्री ठाकुर जी को भोग लगाया। कुछ समय पश्चात् भोग उतारकर स्वयं प्रसाद ग्रहण किया पश्चात् अपने गादी पर विराजे। सब शिष्य एवं सेवक भी पास में बैठ गए। श्री सूरदास जी का वह सेवक आया और श्री सूरदास जी को सब वृत्तांत सुनाया। 
श्री सूरदास जी तत्क्षण श्री महाप्रभु जी के दर्शन के लिए आये और पीछे बैठ गए। महाप्रभु ने जब देखा तो कहा "अरे सूर, आओ यहाँ बैठो।"
श्री सूरदास जी महाप्रभु के समीप आये और आगे बैठ गए। महाप्रभु ने कहा "सूर, कुछ भगवद्यश वर्णन करो।"
श्री सूरदास जी ने कहा "जो आज्ञा" और एक पद गाने लगे -

(राग धनाश्री)
हों हरि सब पतितनको नायक।
को करिसके बराबर मेरी इतने मानकों लायक॥ 1 ॥
जो तुम अजामेलिसों कीनी जो पाती लिखपाऊं।
होय विश्वास भलौ जिय अपनें और पतित बुलाऊं॥ 2 ॥
सिमिटे जहां तहांते सब कोऊ आयजुरे इक ठौर।
अबके इतनें आनि मिलाऊं बेर दूसरी और॥ 3 ॥
होडाहोडी मनहुलास करिकरे पापभरि पेट।
सबहिन ले पायन तरिपरिहों यही हमारी भेंट॥ 4 ॥
ऐसी कितनीक बनाऊं प्रानपति सुमरन है भयौ आडौ ।
अबकी वेर निवार लेउ प्रभू सूर पतितको ठाडौ॥ 5 ॥ 
हे श्री हरि, मैं सब पतित जनों का नायक हूँ।...

श्री महाप्रभु ने कहा "कुछ और सुनाओ"
श्री सूरदास जी दूसरा पद सुनाने लगे -

(राग धनाश्री)
प्रभू में सब पतितन कोटीकौ।
और पतित सब द्यौसचारिकें में ता जन्मतहीकौ॥ 1 ॥
बधिक अजामिलि गनिका त्यारी और पूतनाहीकौ।
मोहि छांडि तुम और उधारै मिटै शूलकेसें जीकौ॥ 2 ॥
कोउ न समरथ सेव करनका खेचि कहतहों लीकौ।
मरियतलाज सूरपति तनमें कहत सबनमें नीकौ॥ 3 ॥
हे श्री हरि, मैं बहुत उच्च कोटि का पतित हूँ।…

महाप्रभु ने श्री सूरदास जी के इन पदों को सुनकर कहा "तुम इतना अच्छा गाते हो तो ऐसे घिघिआ क्यों रहे हो, कुछ भगवल्लीला वर्णन करो।"
श्री सूरदास जी ने कहा "हे महाप्रभु जी, मेरे अंतःकरण में भगवल्लीला स्फुरित नहीं होती।"
महाप्रभु ने कहा "ठीक है, जाओ स्नान कर आओ, मैं तुमको भगवल्लीला समझाऊंगा।"
श्री सूरदास जी स्नान कर आये। तब महाप्रभु ने प्रथम तो श्री सूरदास जी को भगवान का नाम सुनाया। कुछ दिन पश्चात् उनको श्री कृष्ण के चरणों में समर्पण करवाया अर्थात श्री सूरदास जी ने श्री कृष्ण की शरण ग्रहण की। इसके पश्चात् महाप्रभु ने श्री सूरदास जी को श्रीमद्भागवत के अपने सुबोधिनी टिका के दशम स्कंध की अनुक्रमाणिका सुनाई जिसमें केवल श्री कृष्ण चरित है। श्री सूरदास जी का सब दोष दूर हो गया एवं उन्हें नवधा भक्ति प्राप्त हो गयी तथा दशम स्कंध के अनुक्रमाणिका के समस्त लीला उनके ह्रदय में स्फुरित हो गयी। अब श्री सूरदास जी ने महाप्रभु को भगवल्लीला का पद सुनाया -

"चकईरी चलि चरण सरोवर जहां न प्रेम बियोग"
मैं तो उस चरण सरोवर पर जा रहा हूँ जहाँ प्रेम का वियोग नहीं है।

यह पद सुन महाप्रभु समझ गए की श्री सूरदास जी को लीला स्फुरित हो गयी है। कुछ समय पश्चात् नंद महोत्सव पर श्री सूरदास जी ने यह पद गाया -

"ब्रज भयौ महरके पूत"

इस पद को सुनकर महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी बहुत प्रसन्न हुए और कहा "ऐसा लगता है की सूरदास तो निकट ही थे" (अर्थात श्री सूरदास जी नंद महल में ही थे और आँखों देखि गाते जा रहे थे)
इसके बाद श्री सूरदास जी ने अपने सब सेवकों को महाप्रभु से नाम दिलवाया। इसके पश्चात् श्री सूरदास जी ने कई पदों की रचना की। कुछ समय उपरांत महाप्रभु ने श्री सूरदास जी को पुरुषोत्तम सहस्रनाम सुनाया जिससे श्री सूरदास जी को सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत ह्रदय में स्फुरित हो गयी। इसके पश्चात् श्री सूरदास जी ने श्रीमद्भागवत के अनुसार प्रथम स्कंध से द्वादश स्कंध तक पदों की रचना की जो सूरसागर नामक ग्रन्थ में संकलित है। 

ब्रजवास :
कुछ दिन बाद महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी ब्रज धाम में पधारे। श्री सूरदास जी भी संग में आ गए। महाप्रभु ब्रज में प्रथम गोकुल में पधारे तथा श्री सूरदास जी को कहा "अरे सूरदास, श्रीगोकुल का दर्शन करो"
श्री सूरदास जी ने तत्क्षण श्रीगोकुल को दंडवत प्रणाम किया। दण्डवत करते ही श्री सूरदास जी के ह्रदय में श्रीगोकुल की बाललीला स्फुरित हो गयी। पहले ही महाप्रभु ने श्री सूरदास जी के ह्रदय में सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत की लीला स्थापित कर दी थी, इसलिए गोकुल का दर्शन करते ही श्री सूरदास जी के ह्रदय में बाललीला स्फुरित होने लगी। श्री सूरदास जी ने मन में सोचा की महाप्रभु को गोकुल की बाल लीला गाकर सुनाऊँ। वे सुनाने लगे -

(राग बिलावल)
सो नितकरन पुनीतलियै।
घुटुरुवन चलत रेणु तनमेडत सुरत वेष कीये॥ 1 ॥
चारु कपोल लोल लोचन छबि गोरोचनको तिलक दिये।
लार लटकन मानों मतमधुपगन माधुरी मधुर पिये॥ 2 ॥
कठुलाकंठ बजत केहरि नख राजत है सखी रुचिर हिये।
धन्य सूर एकौ पल यह सुख कहा भयौ जीये॥ 3 ॥

इस पद को सुनकर महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए। इसके बाद श्री सूरदास जी ने कई और पद गाए। इन पदों को सुनकर महाप्रभु ने विचार किया की श्रीनाथ जी के मंदिर में और तो सब सेवा का विधान हो गया है लेकिन कीर्तन का विधान नहीं किया है, यह सेवा तो सूरदास को ही देना चाहिए। 
महाप्रभु अब श्री सूरदास जी को लेकर गोवर्धन में श्रीनाथ जी के मंदिर पहुंचे। महाप्रभु स्नान करके पर्वत के ऊपर मंदिर में पधारे और श्री सूरदास जी को भी स्नान कर मंदिर में आकर श्रीनाथ जी के दर्शन करने को कहा। श्री सूरदास जी स्नान कर मंदिर में आ गए और श्रीनाथ जी के दर्शन किये। महाप्रभु ने कहा "सूरदास, श्रीनाथ जी को कुछ सुनाओ"
श्री सूरदास जी ने पद गया -

"अबहों नाच्यौ बहुतगोपाल"

इस पद को सुनकर महाप्रभु ने कहा "अरे सूरदास, अब तो तुम्हारे अंतःकरण में अविद्या रही नहीं, प्रभु ने सब दूर कर दी, इसलिए भगवान के यश का वर्णन करो"
तब श्री सूरदास जी ने पद गाया -

"कोन सुकृत इन व्रजवासिनकों"

 इस पद को सुनकर महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य बहुत प्रसन्न हुए। 

श्री सूरदास जी की ख्याति को सुनकर बादशाह अकबर को उनसे मिलने की उत्कंठा :
श्री सूरदास जी ने अनेक पद रचना किये जो देश-देशांतर में फैलने लगा। 
एक समय दिल्ली में बादशाह अकबर ने श्री सूरदास जी का पद सुना तो बहुत प्रभावित हुआ और सोचने लगा की किसी कारण से श्री सूरदास जी मिले तो सही। भगवान की इच्छा से श्री सूरदास जी अकबर के दरबार में पधारे। अकबर ने कहा "सूरदास जी, मैंने सुना है की आपने बहुत पदों की रचना की है। मुझे परमेश्वर ने राजा बनाया है इसलिए सब गुणीजन मेरा यशगान करते है। आप भी कुछ सुनाइए।"
श्री सूरदास जी ने एक पद सुनाया -

"मनारे तू करि माधौसौं प्रीति"
हे मन, तू श्री माधव से प्रेम कर। 

इस पद का अहर्निश ध्यान करने से भगवान का अनुग्रह सदा बना रहेगा तथा संसार से सदा वैराग्य बना रहेगा। कुसंग से सदा भय रहेगा और भक्तों के संग की सदा चाह रहेगी। श्री ठाकुर जी के चरणों में सदा प्रेम बना रहेगा। अकबर सदा आसक्ति से दूर रहे इसलिए श्री सूरदास जी ने यह पद सुनाया। इस पद को सुनकर बादशाह अकबर बहुत प्रसन्न हुआ और कहने लगा 
"मुझे परमेश्वर ने राज्य दिया है इसलिए सब गुणीजन मेरा यशगान करते है। आप भी मेरा कुछ यश गाइये।"
श्री सूरदास गाने लगे -

"नाहिन रह्यौ मनमें ठौर।"
हौं जो सूर ऐसें दर्शको ई मरत लोचन प्यास॥"
मेरे मन में अब स्थान नहीं बचा, वहां केवल श्री हरि ही विराजमान हैं। उन्ही की रूप माधुरी के दर्शन करने के लिए मेरी ऑंखें मरी जा रही हैं। 

इस पद को सुनकर अकबर सोचने लगा की श्री सूरदास जी मेरा यश क्यों गाएंगे, इन्हें मुझसे कोई लालच हो तब तो गाएंगे, लेकिन ये तो श्री हरि के भक्त हैं। बादशाह अकबर पद की आखरी पंक्ति के लिए श्री सूरदास जी से कहने लगा 
"सूरदास जी, आपकी आँखें तो देख नहीं सकतीं, फिर प्यासे कैसे मर रहे हैं तथा बिना देखे ही आप उपमा कैसे दे रहे हो।" 
श्री सूरदास जी इसपर कुछ बोले नहीं। बादशाह अकबर ने कहा 
"श्री सूरदास जी की आँखें तो परमेश्वर के पास हैं और उन्हीं का दर्शन करती रहती हैं और श्री सूरदास जी उसीका वर्णन करते हैं।" फिर अकबर ने विचार किया की श्री सूरदास जी को कुछ उपहार देना चाहिए। लेकिन फिर सोचा की ये तो हरि भक्त हैं और इन्हें किसी वास्तु की आकांक्षा नहीं है। इसके पश्चात् श्री सूरदास जी अकबर से विदा लेकर श्रीनाथ जी मंदिर आ गए। 

गुसाईं श्री गिरिधारी जी का श्री सूरदास जी की परीक्षा लेना एवं श्री नवनीतप्रिया जी के दर्शन :
एक बार श्री सूरदासजी श्री गुसाईं जी के साथ गोकुल गए। वहाँ उन्होंने श्री नवनीतप्रियाजी के दर्शन किए। फिर वहीं उन्होंने श्रृंगार का वर्णन करते हुए एक पद गाया, ठीक वैसा ही वर्णन किया जैसे श्री नवनीतप्रियाजी का श्रृंगार किया गया था। श्री गुसाईंजी के पुत्रों को आश्चर्य हुआ कि सूरदासजी अंधे होते हुए भी सही-सही श्रृंगार का वर्णन कर सकते हैं, अवश्य ही श्री ठाकुरजी उनके हृदय में निवास करते हैं और उन्हें स्वरूपानंद का अनुभव कराते हैं। अगले दिन, श्री सूरदास जी की क्षमता का परीक्षण करने के लिए, इन पुत्रों ने श्री नवनीतप्रियाजी को कोई भी श्रृंगार धारण नहीं कराया। जब श्री सूरदास जी श्री नवनीतप्रिया जी के दर्शन करने के लिए आये तो श्री गिरिधरजी ने सूरदास जी से आग्रह किया की ठाकुर जी के श्रृंगार का वर्णन करें। दर्शन के समय श्री सूरदाजी को दिव्य अनुभव हुआ और उन्होंने राग बिलावल में "देख री हरि नंगम नंगा" पद गाया। यह सुनकर सभी आचार्यों ने सूरदास जी से कहा, "आप यह क्या वर्णन कर रहे हैं?" सूरदास जी ने तुरंत उत्तर दिया कि मुझे आपके द्वारा धारण कराया गया अद्भुत श्रृंगार के अद्भुत दर्शन हुए हैं और उसी के अनुसार मैंने अपने कीर्तन में इसका वर्णन किया है।

सवा लाख पदों का संकल्प:
श्री सूरदास जी ने सवा लाख पदों की रचना करने का संकल्प किया था । परंतु ऐसा माना जाता है कि वह संकल्प पूरा करने के लिए साक्षात ठाकुर जी ने ही अंत में पूरा करवाया था । ऐसा भी भक्तों द्वारा माना जाता है कि जिन पदों को स्वयं श्री सूरदास जी ने लिखा है उनमें “सूरदास" छाप आती है परंतु कई विशेष ऐसे पद भी हैं जिनमें “सूर श्याम” छाप आती है जिसे साक्षात श्री कृष्ण द्वारा रचित माना जाता है ।

ग्रन्थ रचना :
श्री सूरदास ने कई लाख पदों की रचना की है, जो कई ग्रंथों में संकलित है। लेकिन वर्त्तमान में मात्र 5 ग्रन्थ ही उपलब्ध है -

1. सूरसागर 
श्री सूरदास जी ने श्रीमद्भागवत के द्वादश स्कंध के आधार पर इस ग्रन्थ की रचना की है। सूरसागर में 12 स्कंध हैं, जिसमें से 11 स्कंध संक्षित है लेकिन दसवां स्कंध बृहद है जिसमें श्री कृष्ण की सम्पूर्ण ब्रज लीलाओं के पद संकलित है। 
सूरसागर में एक लाख से अधिक पद संकलित थे लेकिन वर्त्तमान में केवल 7000-8000 पद ही उपलब्ध हैं। 

2. सुरसारावली
सुरसारावली भी प्रमुख ग्रंथों में से एक है। इसमें कुल 1107 छंद हैं। सूरदास जी ने 67 वर्ष की आयु में इस पुस्तक की रचना की थी। इस ग्रन्थ में होली लीला के पद संकलित हैं। 

3. साहित्य लहरी 
साहित्य लहरी सूरदास की एक अन्य प्रसिद्ध काव्य पुस्तक है। इस ग्रंथ में विभिन्न प्रकार की कृष्णभक्ति की अनेक रचनाओं को काव्य पंक्तियों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। साहित्य लहरी में 118 पद संकलित हैं।
इस पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके अंतिम पद में सूरदास जी ने अपने वंश वृक्ष के बारे में बताया है। जिसके अनुसार सूरदास का "सूरजदास" नाम रखा गया था और वह चंद के वंशज हैं। सूरदास जी की यह पुस्तक श्रृंगार रस की श्रेणी में आती है।

4. ब्याहुलो
इस ग्रन्थ में श्री राधा कृष्ण के विवाह के पद संकलित हैं।

5. नल दमयंती
इस ग्रन्थ में नल और दमयंती की कथा है, जो महाभारत काल की है। 

लीला संवरण :
श्रीनाथ जी की सेवा करते हुए बहुत समय बित गया। एक दिन श्री सूरदास जी को ज्ञान हुआ की अब भगवान मुझे अपने धाम बुलाना चाहते हैं। यह विचार कर श्री सूरदास रास स्थली परासौली आ गए और श्रीनाथ जी के मंदिर की ध्वजा को दण्डवत प्रणाम कर वहीँ लेट गए। श्री सूरदास जी सोचने लगे की अब शरीर में थोड़ी भी शक्ति नहीं बची है, श्रीनाथ जी के दर्शन करने कैसे जाऊं, श्री गुसाईं विट्ठलनाथ जी के दर्शन भी नहीं कर सकता। श्री गुसाईं जी तो कृपासिंधु हैं, भक्तों के मनोरथ पूर्ण करनेवाले हैं, यदि अब उनके दर्शन हो तो अहोभाग्य है मेरा। श्री गुसाईं जी का इस प्रकार चिंतन करते हुए श्री सूरदास जी लेटे हैं। 
यहाँ श्री गुसाईं जी श्रीनाथ जी के श्रृंगार समय पर देखने लगे की प्रतिदिन इस समय पर श्री सूरदास जी प्रांगण में बैठ कर ठाकुर जी को श्रृंगार के पद सुनाते लेकिन आज यहाँ उपस्थित नहीं हैं। 
श्री गुसाईं जी ने वैष्णवों से पूछा "आज सूरदास जी नहीं दिख रहे, कहाँ गए हैं ?" वैष्णवों ने कहा "महाराज, आज सूरदास जी को परासौली की ओर जाते हुए देखा गया है।"
श्री गुसाईं जी जान गए की भगवदिच्छा से आज सूरदास जी का अवसान का समय आ गया है। तब श्री गुसाईं जी ने समस्त सेवकों से कहा -
"आज पुष्टिमार्ग का जहाज जा रहा है, जिसे जो लेना हो ले लो, मैं भी राजभोग सेवा उपरांत आता हूँ।"
सब सेवक सूरदास जी के दर्शनों के लिए चले गए। यहाँ श्रीनाथ जी के मंदिर में जो भी आता है, श्री गुसाईं जी उसी से श्री सूरदास जी के बारे में पूछते। सब यही कहते की श्री सूरदास जी तो अचेत हैं, कुछ बोलते नहीं हैं। इस प्रकार राजभोग का समय हो गया। श्री गुसाईं जी ने ठाकुर जी की राजभोग आरती कर मंदिर से बाहर आये और परासौली पधारे। भीतरी सेवक रामदास प्रभृति, कुम्भनदास जी, गोविन्द सवामी और चतुर्भुज दस प्रभृति भी साथ थे। आते ही श्री गुसाईं जी ने श्री सूरदास जी से पूछा "सूरदास जी, कैसे हो"
श्री गुसाईं जी के शब्द श्रवण करते ही श्री सूरदास जी उठे और श्री गुसाईं जी को दण्डवत प्रणाम किया और कहने लगे "महाराज, मैं आपका ही बाट देख रहा था।" इतना कह श्री सूरदास जी ने राग सारंग में एक पद गाया -

"देखो देखो हरिजू का एक सुभाव"

इस पद को सुनकर श्री गुसाईं जी बहुत प्रसन्न हुए। पास में खड़े कुम्भनदास जी ने कहा 
"हे सूरदास जी, आपने श्री ठाकुर जी का बहुत यश वर्णन किया है, लेकिन आचार्य महाप्रभु का यश वर्णन नहीं किया।"
कुम्भनदास जी के इस वचन को सुनकर श्री सूरदास जी ने कहा "मैंने तो केवल आचार्य महाप्रभु का ही यश वर्णन किया है, श्रीनाथ जी और आचार्य महाप्रभु तो एक ही हैं, यदि अलग देखूं तब तो कुछ वर्णन करूं लेकिन तुम्हारे कहने से कुछ सुनाता हूँ।" यह कह कर श्री सूरदास जी राग बिहागरौ में एक पद गाने लगे -

"भरौ सो दृढ इन चरणन केरौ"

इस पद के समाप्ति पर श्री सूरदास जी को मूर्छा आई। श्री गुसाईं जी ने कहा "सूरदास जी, आपकी चित्त की वृत्ति कहाँ है"
श्री सूरदास जी ने राग बिहागरौ में एक पद सुनाया -

"बलिबलिबलि हौं कुमर राधिका नंदसुवन जासों रतिमानी"

इस पद की समाप्ति पर श्री गुसाईं जी ने देखा की श्री सूरदास जी का चित्त श्री ठाकुर जी के करुणा से भरे नेत्र में लगे हैं। श्री गुसाईं जी ने पूछा "सूरदास जी, नेत्र की वृत्ति कहाँ है"
श्री सूरदास जी ने इसपर राग बिहागरौ में एक पद सुनाया -

"खंजन नैन रूप रसमाते। 
अतिसे चारु चपल अनियारे पल पिंजरा न समाते॥"

इतना गाते ही सं 1583 में श्री सूरदास जी देह का त्याग कर भगवल्लीला को प्राप्त हो गए।