रहौ मेरे नैंनन मैं यह ध्यान - श्री किशोरी अलि

रहौ मेरे नैंनन मैं यह ध्यान - श्री किशोरी अलि

रहौ मेरे नैंनन मैं यह ध्यान।
दामिनि रूप राधिका गोरी, नवघन स्याम सुजान॥ [1]
आलस अंग भोर ही जागे, दुह दुहुन के प्रान।
करत परस्पर लोभी लोचन, वदन माधुरी पान॥ [2]
अति अदभुत भूतल में जोरी, उपमा नहीं समान।
किशोरी रसिकजनन की जीवन, कहा जानैं कोऊ आन॥ [3]

- श्री किशोरी अलि, अष्टयाम प्रथम (14)

श्री किशोरी अली जी कहते हैं "मेरी आँखों में तो दामिनी स्वरुप श्री राधा एवं नवघन स्वरुप श्री श्यामसुंदर का ही ध्यान बना रहता है।" [1]

दोनों श्री श्यामाश्याम भोर ही में नींद से जगे हैं, उनके अंग आलस युक्त हैं तथा दोनों एक दूसरे के प्राण हैं। दोनों की आँखें एक दूसरे की रूप माधुरी का पान करने के लिए नित्य ही लोभी बनी रहती हैं । [2]

श्री राधा श्याम की यह जोड़ी बड़ी ही अद्भुत है, इनकी उपमा की कोई समानता नहीं है। यह युगल जोड़ी तो रसिक जनों की जीवन प्राण हैं, कोई और इसे क्या जाने। [3]