जन्म :
श्रीकुम्भनदास जी का जन्म 1499 की चैत्र कृ० 11 को गोवर्द्धन के पास जमुनावता नामक ग्राम में हुआ था। आप गौरवा क्षत्रिय थे। इस गांव से सारस्वत कल्प में श्री जमुना जी प्रवाहित होती थीं इसलिए इस गांव का नाम जमुनावता हुआ। श्रीकुम्भनदास जी की प्रारम्भ से ही संगीत और पद-रचना की ओर रुचि थी। चंद्र सरोवर, परासौली में इनकी खेती की जमीन थी जहाँ ये खेती करते थे। श्री कुम्भनदास जी श्रीनाथजी के परम सखा थे और कृपापात्र थे।
जब महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य गोवर्धन पधारे तथा श्रीनाथजी को प्रकट किया, तब उन्होंने श्री कुम्भनदास जी को बुलाया एवं सेवा प्रदान की जिससे इनकी प्रसिद्धि हुई।
श्रीनाथजी का प्राकट्य एवं श्री कुम्भनदास जी का महाप्रभु के शरण आना :
एक समय महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य श्री कृष्ण भक्ति की स्थापना करने के लिए पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे थे। जब वे झारखण्ड के जंगल में पहुंचे, तो वहां श्री गोवर्धननाथ जी ने उन्हें आज्ञा दी कि:
"हम 3 दमन श्री गोवर्धन पर्वत में हैं। नागदमन, इन्द्रदमन तथा देवदमन। इन तीनों दमन में मैं देवदमन हूँ और यही मेरा नाम है। तुम शीघ्र गोवर्धन पधारो तथा मुझे गोवर्धन पर्वत से प्रकट कर पधराओ एवं मेरी सेवा के प्रकार की स्थापना करो।"
श्रीगोवर्धननाथ जी की आज्ञा से महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य ने अपनी पृथ्वी परिक्रमा झारखण्ड में ही स्थगित कर गोवर्धन आने लगे। उनके संग दामोदरदास हरसानी, कृष्णदास मेघन, गोविन्द दुबे, जगन्नाथ जोशी तथा रामदास ये 5 वैष्णव थे। महाप्रभु इन वैष्णवों के संग गोवर्धन की तरहटी आये तथा सद्दू पांडे के घर के चबूतरे पर विराजे। आगे चलकर श्रीनाथजी के प्राकट्य में सद्दू पांडे महाप्रभु के सेवक हो गए। महाप्रभु ने श्रीनाथजी की सेवा इन्हें सौंपी। बहुत सारे ब्रजवासी जन भी महाप्रभु के सेवक बन गए।
महाप्रभु की सूचना पाकर जमुनावता में रह रहे श्री कुम्भनदास जी ने अपनी पत्नी से कहा कि कोई महापुरुष आन्योर में पधारे हैं और श्री गोवर्धनधरजी को श्री गोवर्धन पर्वत से प्रकट किया है। बहुत से लोग उनके अनुयायी बन गए हैं और यदि हम भी उनके अनुयायी बनें तो यह लाभप्रद होगा। दोनों फिर आन्योर गए और श्री महाप्रभुजी से उन्हें अपनी शरण में लेने का अनुरोध किया। श्री महाप्रभुजी ने उन्हें अष्टाक्षर दीक्षा (नाम मंत्र) प्रदान किया । उसके बाद श्री महाप्रभुजी ने श्री गोवर्धनधरजी को वहां एक मंदिर में स्थापित किया और श्री रामदास चौहान को सेवा के लिए और श्री कुंभदासजी को कीर्तन सेवा के लिए नियुक्त किया। समस्त ब्रजवासी जन दूध, दही, माखन लाते और ठाकुर जी को यहीं भोग लगाते।
महाप्रभु ने सब ब्रजवासि सेवकों से कहा कि: "श्रीनाथजी मेरे सर्वस्व हैं, तुम सब मिलकर इनका ध्यान रखना और सेवा में तत्पर रहना।" श्री कुम्भनदास और अन्य सेवकों से कहा की "तुम सब श्रीनाथजी के दर्शन किये बिना प्रसाद ग्रहण नहीं करना।" इस प्रकार सबको निर्देश देकर महाप्रभु पृथ्वी परिक्रमा के लिए पुनः झारखण्ड चले गए जहाँ पर पृथ्वी परिक्रमा को विराम दिया था।
श्रीकुम्भनदास जी के ऊपर श्रीनाथजी की अत्यंत कृपा :
अब श्री कुम्भनदास जी महाप्रभु की आज्ञा से नित्य श्रीनाथजी के दर्शन करते। महाप्रभु द्वारा ब्रह्म सम्बन्ध एवं नाम दीक्षा से श्री कुम्भनदास जी नित्य नविन पदों की रचना करते और श्रीनाथजी को बड़े मधुर कंठ से सुनाते। श्रीनाथजी भी कुम्भनदास जी के घर पधारते और श्रीकुम्भनदास जी के संग अनेक क्रीड़ा करते और वार्ता करते। श्रीनाथजी श्रीकुम्भनदास जी के ऊपर बहुत कृपा करते।
म्लेक्ष आक्रमण के कारण श्रीनाथजी को टोंड के वन में स्थानांतरित करना :
एक समय ब्रज में म्लेक्षों (मुस्लिमों) का आक्रमण हुआ। उन म्लेक्षों का राजा बड़ा आततायी था। सभी गांवोंको लूटमार करके वह पश्चिमसे आया था। उसका पड़ाव श्री गिरिराज जी से लगभग सात किलोमीटर दूर पड़ा था। तब सेवा में उपस्थित मानिकचंद पांडे, सद्दू पांडे, रामदास चौहान और श्री कुम्भनदास जी ने मिलकर विचार किया की ये म्लेक्ष गण धर्म के द्वेषी हैं, इसलिए हमको क्या करना चाहिए ? फिर सबने विचार कर कहा कि सोचना क्या है, हमारे विचारने से कहाँ कुछ होगा, इसलिए हमको श्रीनाथजी से ही पूछना चाहिए की इस परिस्थिति में क्या करना चाहिए। यह चारों वैष्णव श्रीनाथजीके अंतरंग थे। इनके साथ श्रीनाथजी बातें किया करते थे।
सब श्रीनाथजी के सम्मुख आये और पूछा "हे श्रीनाथजी, अब हम क्या करें ? धर्म का द्वेषी म्लेक्ष लूटता चला आ रहा है। अब आप जो आज्ञा करें हम वैसा करेंगें।"
श्रीनाथजी ने कहा "हमको यहाँ से ले चलो, हम अब जाएंगे।"
सबने पूछा "प्रभु, आप कहाँ पधारेंगे।"
श्रीनाथजी ने कहा "हम टोंड के घने में चलेंगे।"
सबने फिर पूछा "प्रभु, आप किसकी सवारी पर टोंड के घने में चलेंगे।"
श्रीनाथजी ने कहा "सद्दू पांडे के यहाँ एक पांडा है, उसे ले आओ, हम उस पांडा पर सवार होकर टोंड के घने में चलेंगे।"
यह आज्ञा पाते ही सद्दू पांडे का पांडा लाया गया। श्रीनाथजी उस पांडा पर विराजमान हो गए। अब पांडा के चलने से कहीं ठाकुर जी हिल-डुल कर गिर न जाएं इस कारण एक ओर से रामदास जी ने ठाकुर जी को पकड़ लिया ओर दूसरे ओर से श्री कुम्भनदास जी ने ठाकुर जी को पकड़ रखा है। पांडा के दोनों ओर से ठाकुर जी को सहयोग देते हुए सब टोंड के घने में चले जा रहे हैं।
टोंड के घने वन में काँटों का वृक्ष प्रचुर मात्रा में था इसलिए मार्ग में जगह-जगह काँटे थे। सब सेवकों के कपडे काँटों से फट गए थे और शरीर पर भी सबको काँटे लगने से बड़ी पीड़ा हो रही थी। वन में एक तालाब के किनारे एक वृक्ष के निचे चबूतरे पर श्रीनाथजी को पधराया गाया। जो कुछ सामग्री साथ लाये थे उसी को रामदास ने ठाकुर जी को भोग लगाया।
अब श्रीनाथजी ने श्री कुम्भनदास जी को कहा "कुम्भनदास जी, कुछ गाकर सुनाओ"
श्री कुम्भनदास जी तो मन में कुढ़ रहे थे की म्लेक्षों के कारण गोवर्धन छोड़ इस घने वन में आना पड़ा। यहाँ भी काँटों के वृक्ष छाये हुए हैं, मार्ग में भी कांटे, सब वस्त्र फट गए हैं, शरीर में काँटे चुभने से पीड़ा भी हो रही है और ये गाने को कह रहे हैं। यह विचार कर श्री कुम्भनदास जी गाने लगे -
(राग सारंग)
भावत है तोय टोंडको घनौ।
कांटे लगे गोखुरू बूढे फट्यौ जात यह तनौ॥
सिहों कहा लोकटी को डर यह कहा वानक बन्यौ।
कुम्भनदास प्रभू तुम गोवर्धनधर वह कोन रांडढेहनी को जन्यौ॥
श्री कुम्भनदास जी के इस पद को सुनकर श्रीनाथजी मुस्कुराकर चुप रहे, कुछ बोले नहीं। इतने पर श्री गोवर्धन से कोई ब्रजवासी आया और समाचार दिया की जो म्लेक्षों की फौज आयी थी वह लौट गए हैं। इस समाचार को सुनकर सब प्रसन्न हुए और श्रीनाथजी को पुनः श्री गोवर्धन लाया गया और उन्हें मंदिर में पधरा कर उनकी सेवा करने लगे।
महाराजा मानसिंह का श्रीकुम्भनदास जी से मिलने उनके घर आना :
सं० 1620 में ब्रज-यात्रा करते हुए महाराजा मानसिंह जिस समय श्रीनाथजी के दर्शन करनेके लिए जतीपुरा पहुँचे, उस समय श्रीकृम्मनदासजी पद गा रहे थे। आपके पदों पर महाराजा मानसिंह इतने प्रसन्न हुए कि दूसरे दिन प्रातः ही आपके गांव जमुनावता पहुंचे और बहुत-सा धन देना चाहा पर आपने उसे स्वीकार नहीं किया। महाराज को आपकी इस सन्तोषमयी प्रकृति से बड़ा आनन्द हुआ।
श्रीकुम्भनदास जी का श्रीनाथजी से प्रेम :
श्रीकुम्भनदास जी श्रीनाथजी की सेवा त्यागकर कहीं भी जाना नहीं चाहते थे। एक बार सं० 1631 में आपकी दयनीयताको देखकर गुसाईं श्रीविठ्ठलनाथजी ने आपको द्वारकापुरी ले जाना चाहा। वे चाहते थे कि वहाँ वैष्णव भक्तों द्वारा दी हुई भेंटसे श्रीकुम्भनदासजी का अर्थ कष्ट दूर हो जाएगा। गुरुदेवकी आज्ञा पाकर आप चले तो गए, किन्तु पहले ही पड़ावके समय जब आपको श्रीनाथजी की याद आई सो आँखोंसे प्रेमाश्रु फूट पड़े। उस समय आपने एक पद बनाकर गाया -
केते दिन जु गए बिनु देखैं।
तरुन किसोर रसिक नँदनंदन, कछुक उठति मुख रेखैं॥
वह सोभा, वह कांति बदन की, कोटिक चंद बिसेखैं।
वह चितवन, वह हास मनोहर, वह नटवर बपु भेखैं॥
स्याम सुँदर सँग मिलि खेलन की आवति हिये अपेखैं।
‘कुंभनदास’ लाल गिरिधर बिनु जीवन जनम अलेखैं॥
श्रीविठ्ठलनाथजीने कुम्भनदासजी की यह दशा देखकर कहा- "श्रीनाथजी के कुछ समय का वियोग भी तुमको युगोंके समान असह्य हो रहा है। तुम्हारी यात्रा तो हो हो चुकी, अपने घर जाओ।"
बादशाह अकबर का श्री कुम्भनदास जी को दरबार में आने का निमंत्रण भेजना :
कहा जाता है, एक बार अकबर का एक दरबारी श्रीनाथजी के मन्दिर में श्रीकुम्भनदासजी का एक पद सुना और उसने वह पद राज-दरबार में गाया। पद सुनकर अकबर बड़ा प्रसन्न हुआ। जब उसे ज्ञात हुआ कि वह पद श्रीकुम्भनदासजी का था तो उसने आपको लिवा लाने के लिए पालकी भेज दी। आपका मन तो श्रीनाथनीकी सेवा को त्याग कर एक पग भी कहीं जानेका नहीं था; किन्तु यह सोचकर कि बादशाह के बुलाने पर राजीसे ही चला जाना ठीक है, आप दरबारमें जा पहुँचे और बादशाह के द्वारा गानेकी प्रार्थना करने पर अपनी खिन्नताको व्यक्त करते हुए आपने निर्भयतासे गाया -
भक्तन कौ कहा सीकरी काम।
आवत जात पन्हैयाँ टूटीं, विसर गयो हरिनाम॥
जाकौ मुख देखैै दुख लागै, ताकौ करन परी परनाम।
'कुंभनदास' लाल गिरधर बिन, यह सब झूठौ धाम॥
सहृदय बादशाह आपके भक्ति-गाम्भीर्य और स्पष्ट कथनसे बड़ा प्रभावित हुआ। उसने आपको सादर जमुनावतौ भिजवा दिया।
पुत्रों से अनासक्त :
यद्यपि श्रीकुम्भनदासजी के सात पुत्र थे, किन्तु आपका उन सबमें किञ्चित्मात्र भी ममत्व नहीं था। एक बार आपसे जब पूछा गया कि 'आपके कितने पुत्र हैं ?", तो जवाब मिला- "देढ़-एक तो चतुर्भुज दास हैं जो श्रीनाथजी की सेवा भी करता है और उनका गुणगान भी, और आधा पुत्र कृष्णदास है जो श्रीनाथनीजी की गाय चराकर सेवा तो करता है, किन्तु गुण-गान नहीं। शेष पाँच किसी प्रकार भी श्रीनाथजी के काम नहीं आते, अतः उनका होना न होना बराबर है।"
आप गृहस्थसे कितने अनासक्त थे, इसका ज्ञान एक और घटना से हो सकता है। एक बार जब आपके पुत्र कृष्णदासजी श्रीनाथजी की गायों को चराने के लिए जंगल में गए हुए थे, तो अचानक एक शेरने गायों पर धावा बोल दिया और उनकी रक्षा में ही श्रीकृष्णदास का शरीरान्त हो गया। इस घटनाको सुन कर श्रीकुम्भनदासजी शोक प्रकट करने के स्थानपर सन्तोष व्यक्त करते हुए बोले- "आज मैं परम कृतार्थ हुआ जो श्रीनाथजी की गायों की रक्षा करने में मेरे पुत्रका जीवन सार्थक हो गया।"
श्रीकुम्भमदासजी के पद साधारण होते हुए भी सरसता और भक्ति भावना के प्राचुर्य की दृष्टिसे विशेष महत्व के हैं।
एक उदाहरण देखिए
आवत मोहन मन जु हर्यौ हौं।
हौं गृह अपने सचु साँ बैठी, निरखि बदन अस्वरा बिसर्यौ हौं॥
रूप-निधान रसिक नंदनंदन निरखि बदन धीरज न धर्यौ हौं।
'कुंभनदास' प्रभु गोबर्धन अँग-अँग प्रेम-पियूष भर्यौ हौं॥
लीला संवरण :
श्री कुम्भनदासजी के वृद्ध और अत्यंत दुर्बल हो जाने के बाद वे अन्योर के निकट शंकर्षण कुण्ड पर विराजमान हुए। उनके पुत्र चतुर्भुजदास ने उन्हें जमुनावता गांव ले जाने के लिए कहा, जहां वे रहते थे। श्री कुम्भनदासजी ने वहाँ जाने से मना कर दिया और कहा, "मेरे इस शरीर को छोड़ने में केवल थोड़ा ही समय बचा है"। इसी बीच श्री गुसाईंजी वहाँ आ गए। श्री कुम्भनदासजी ने उन्हें दंडवत प्रणाम किया और बाल लीला के कुछ पद गाए और अंत में उनका मन श्री गोवर्धननाथजी में लीन हो गया और उन्होंने लीला का पद गाते हुए 1583 में अपने शरीर का त्याग किया। श्री गुसाईंजी उस दिन बहुत उदास रहे और अपनी भावना व्यक्त की कि भगवद भक्त अब नहीं रहे।

