(राग धनाश्री एवं पूर्वी)
आवत मोहन मन जु हर्यौ हौ।
हौं गृह अपने सचु सों बैठी, निरखि वदन अस्वरा विसर्यौ हौ॥ [1]
रूप-निधान रसिक नंदनंदन निरखि वदन धीरज न धर्यौ हौ।
'कुंभनदास' प्रभु गोवर्धन धर अँग-अँग प्रेम-पियूष भर्यौ हौ॥ [2]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (187)
श्री कुम्भनदास जी सखी भाव में भावाविष्ट कह रहे हैं "मनमोहन श्री कृष्ण जब संध्या समय गायों के साथ लौटते हैं तब उनकी सुन्दर छवि मेरे मन का हरण कर लेती है। मैं तो अपने घर में बैठी थी लेकिन श्री कृष्ण का दर्शन करते ही मैं सुध-बुध खो बैठी तथा अपने सर पर ओढ़नी रखना भी भूल गयी।" [1]
रूप के निधान रसिक शेखर श्री नंदनंदन के सुन्दर वदन का दर्शन कर मेरा धैर्य टूट गया है। मेरे प्रभु श्री गोवर्धनधर के प्रत्येक अंग में दिव्य प्रेम रस भरा हुआ है। [2]
आवत मोहन मन जु हर्यौ हौ।
हौं गृह अपने सचु सों बैठी, निरखि वदन अस्वरा विसर्यौ हौ॥ [1]
रूप-निधान रसिक नंदनंदन निरखि वदन धीरज न धर्यौ हौ।
'कुंभनदास' प्रभु गोवर्धन धर अँग-अँग प्रेम-पियूष भर्यौ हौ॥ [2]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (187)
श्री कुम्भनदास जी सखी भाव में भावाविष्ट कह रहे हैं "मनमोहन श्री कृष्ण जब संध्या समय गायों के साथ लौटते हैं तब उनकी सुन्दर छवि मेरे मन का हरण कर लेती है। मैं तो अपने घर में बैठी थी लेकिन श्री कृष्ण का दर्शन करते ही मैं सुध-बुध खो बैठी तथा अपने सर पर ओढ़नी रखना भी भूल गयी।" [1]
रूप के निधान रसिक शेखर श्री नंदनंदन के सुन्दर वदन का दर्शन कर मेरा धैर्य टूट गया है। मेरे प्रभु श्री गोवर्धनधर के प्रत्येक अंग में दिव्य प्रेम रस भरा हुआ है। [2]

