जो कदाचितन ना बसै, तौ निज मनहिं बसाय।
यामें नाहिन झूठ कछु, कहत महत कविराय॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (46)
यदि किसी कारणवश शरीर से (वृन्दावन में) वास न हो सके, तो अपने मन को ही वहाँ बसा लेना चाहिए। महान कवियों और संतों का कहना है कि इसमें लेशमात्र भी झूठ नहीं है (अर्थात मन से वहाँ रहना भी उतना ही फलदायी है)।
यामें नाहिन झूठ कछु, कहत महत कविराय॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (46)
यदि किसी कारणवश शरीर से (वृन्दावन में) वास न हो सके, तो अपने मन को ही वहाँ बसा लेना चाहिए। महान कवियों और संतों का कहना है कि इसमें लेशमात्र भी झूठ नहीं है (अर्थात मन से वहाँ रहना भी उतना ही फलदायी है)।

