या साँवरे सों मैं प्रीति लगाई - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सखी अनुराग लीला (3)

या साँवरे सों मैं प्रीति लगाई - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सखी अनुराग लीला (3)

(राग काफी और धनाश्री)
या साँवरे सों मैं प्रीति लगाई।
कुल कलंक ते नाहिं डरूँगी, अब तौ करूं अपने मन भाई॥ [1]
बीच बजार पुकार कहूँ मैं, चाहे करौ तुम कोटि बुराई।
लाज म्रजाद मिली औरन कूं, मृदु मुसिकान मेरे बट आई॥ [2]
बिन देखे मनमोहन को मुख, मोहि लगत त्रिभुवन दुखदाई।
नारायण तिनकूँ सब फीको, जिन चाखी यह रूप मिठाई॥ [3]

- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सखी अनुराग लीला (3)

श्री नारायण स्वामी कहते हैं "सांवरे श्री कृष्ण से मुझे प्रेम हो गया है। अब मैं अपने कुल अथवा कलंक से नहीं डरूंगी, अपने मनका ही करुँगी।" [1]

मैं बिच बाजार में पुकार कर कहूँगी की मुझे श्री कृष्ण से प्रेम है, चाहे कोई मेरी कोटि बुराई करे। दूसरों ने अपनी लाज और मर्यादा अपने पास रखी है और मैंने इन सबका त्याग कर दिया है इसलिए मेरे हिस्से में श्री कृष्ण की मधुर मुस्कान आयी है। [2]

मनमोहन श्री श्यामसुंदर का मुख कमल देखे बिना मुझे यह संसार दुःखप्रद प्रतीत होता है। जिसने भी सांवरे के मुख कमल रुपी मिठाई खायी है (अर्थात मुख कमल के रूप माधुरी में डूबी है) उसे और सब कुछ फीका लगने लगता है। [3]