श्रीराधिके सुरतरङ्गि नितम्ब भागे काञ्चीकलाप कल हंस कलानुलापैः।
मञ्जीरसिञ्जित मधुव्रत गुञ्जिताङ्घ्रिःपङ्गेरुहै: शिशिरयस्व रसच्छटाभिः॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (19)
हे श्रीराधिके ! हे सुरत-केलि-रंजीत नितम्ब-भागे ! अहा ! आपका यह काञ्ची-कलाप क्या है मानो कल हंसों का कल-कल अनुलाप है, और चरण-कमलों के नूपुरों की मन्द-मन्द झनकार ही मानों मतवाले भ्रमरों का गुञ्जन है। स्वामिनि ! आप अपने इसी मधुर रस की छटा से मुझे शीतल कर दीजिए।
मञ्जीरसिञ्जित मधुव्रत गुञ्जिताङ्घ्रिःपङ्गेरुहै: शिशिरयस्व रसच्छटाभिः॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (19)
हे श्रीराधिके ! हे सुरत-केलि-रंजीत नितम्ब-भागे ! अहा ! आपका यह काञ्ची-कलाप क्या है मानो कल हंसों का कल-कल अनुलाप है, और चरण-कमलों के नूपुरों की मन्द-मन्द झनकार ही मानों मतवाले भ्रमरों का गुञ्जन है। स्वामिनि ! आप अपने इसी मधुर रस की छटा से मुझे शीतल कर दीजिए।

