श्री राधिका स्तव - श्री छबीले वल्लभ जी

श्री राधिका स्तव - श्री छबीले वल्लभ जी

जयति जय जय राधिका, सुकमारिका रस साधिका। जय पद्म बदना प्रेम सदना, श्याम की आराधिका॥
जय किशोरी नवल गोरी, प्रेयसी अभिराम की। हे राधिके अब कर कृपा, हर कालिमा हृद्-धाम की॥ [1]


रस प्रदायनी अति सुकुमारी श्री राधिका की जय हो। कमल पुष्प के समान कोमल अंगों वाली, प्रेम की खान, श्री श्यामसुंदर की आराधिका की जय हो।
श्री कृष्ण की प्राण प्यारी, गौर वर्णा श्री नवल किशोरी जू की जय हो। हे श्री राधिके, अब कृपा कर मेरे ह्रदय के अंधकार का हरण कीजिये। [1]

नद नन्द नन्दनि वन्दनी, दुख द्वन्द फन्द निकन्दनी। छवि चन्द मन्द अमन्द सुख, रस सिन्धु भव अभिनन्दनी॥
निर्गुण सगुण की सन्धि सुचि, कल कामना निष्काम की। हे राधिके अब कर कृपा, हर कालिमा हृद्-धाम की॥ [2]


नन्दनन्दन श्री कृष्ण की वेणु जिनकी वंदना करती है, महादुःखदायी द्वन्द के बंधन से मुक्ति देनेवाली उन श्री राधा की जय हो। जिनका चन्द्रमा के समान मुख कमल अनंत सुख को प्रदान करनेवाला है, जो रस की समुद्र हैं एवं भव रोग का नाश करनेवाली हैं, उन श्री राधा की जय हो।
जो निर्गुण और सगुण की संधि हैं, जो नित्य निष्काम भाव में अवस्थित हैं, उन श्री राधा की जय हो। हे श्री राधिके, अब कृपा कर मेरे ह्रदय के अंधकार का हरण कीजिये। [2]

श्याम घन घन श्याम के उर, चंचला चपला महा। ज्योति पुञ्ज निकुञ्ज मञ्जु, वियोग तम विफला अहा॥
कृष्ण कीरत कीर्ति-कीर्ति, सुगति मुनीश अकाम की। हे राधिके अब कर कृपा, हर कालिमा हृद्-धाम की॥ [3]


श्री घनश्याम [श्री कृष्ण] के नवीन मेघ रूपी उर में चंचल बिजली की तरह विद्यमान रहने वाली [श्री कृष्ण के ह्रदय में नित्य विराजमान अति चंचल एवं चपला] श्री राधा की जय हो। नीकुंज मंजु की मूर्तिमान ज्योति स्वरुप, श्री कृष्ण के वियोग रूपी अंधकार को विफल करने वाली श्री राधा की जय हो।
श्री कृष्ण को कीर्ति प्रदान करने वाली श्रीमती कीर्ति जी की कीर्ति, निष्काम मुनिगणों को सदगति प्रदान करने वाली श्री राधा की जय हो। हे श्री राधिके, अब कृपा कर मेरे ह्रदय के अंधकार का हरण कीजिये। [3]

अरविन्द मुख मकरंद फन्द, मिलिन्द मोहन मोहनी। वृजचन्दनिधिविधि-विधिविभव, वैभव मनोहर मोहनी॥
कार्य कारण जगत की, शोभा हरण शत काम की। हे राधिके अब कर कृपा, हर कालिमा हृद्-धाम की॥ [4]


कमल के पराग के समान मुख कमल से साक्षात श्री मनमोहन के चित्त को भी आकर्षित करनेवाली श्री राधा की जय हो। विभिन्न प्रकार के वैभवों से संपन्न ब्रज चंद्र निधि श्री कृष्ण को भी अपने वैभव से मोहने वाली की जै हो।
सर्व कारणों की कारण, अपनी शोभा से करोड़ों कामदेवों को लज्जित करनेवाली श्री राधा की जय हो। हे श्री राधिके, अब कृपा कर मेरे ह्रदय के अंधकार का हरण कीजिये। [4]

गोपीश्वरी सिद्धीश्वरी, प्रेमीश्वरी हृदयेश्वरी। भक्तीश्वरी मुक्तीश्वरी, शक्तीश्वरी सर्वेश्वरी॥
रासेश्वरी रसिकेश्वरी, राजेश्वरी बृजधाम की। हे राधिके अब कर कृपा, हर कालिमा हृद्-धाम की॥ [5]


गोपीजन, सिद्धजन, प्रेमीजन एवं चराचर के ह्रदय की ईश्वरी श्री राधा की जय हो। भक्ति देवी, मुक्ति देवी, शक्ति देवी, एवं समस्त देवियों की ईश्वरी श्री किशोरी जू की जय हो।
ब्रज की महारानी, रास की अधिष्ठात्री, रसिकों की प्राणेश्वरी श्री राधा की जय हो। हे श्री राधिके, अब कृपा कर मेरे ह्रदय के अंधकार का हरण कीजिये। [5]

सत रज तमो गुण से परे, नख ज्योति ब्रह्म प्रकाशिनी। तत्वमसि ब्रह्मास्मि धीश्वरि, विश्व रूप विकाशिनी॥
निर्लेप निर्गुण गुणमयी, लीला सरस सुख धाम की। हे राधिके अब कर कृपा, हर कालिमा हृद्-धाम की॥ [6]


सत, रज एवं तमो गुण से परे, जिनकी चरण नख की ज्योति से ब्रह्म का प्रकाश होता है, उन श्री राधा की जय हो। जो परम तत्व, परम ब्रह्म एवं ज्ञानीजनों की ईश्वरी हैं, विश्व को प्रकाश देने वाली हैं, ऐसी श्री राधा की जय हो।
जो निर्गुण एवं सगुण होते हुए भी इनसे निर्लेप हैं, जो मधुर लीला की सुख धाम हैं, उन श्री राधा की जय हो। हे श्री राधिके, अब कृपा कर मेरे ह्रदय के अंधकार का हरण कीजिये। [6]

भक्ति अनन्य प्रदायनी, वर दायनी करूणामयी। संयम नियम यम ध्यान ज्ञान, विधान तप साधन मयी ॥
हे पूर्ण भक्ति अपूर्ण तव बिन, श्याम की निःकाम की। हे राधिके अब कर कृपा, हर कालिमा हृद्-धाम की॥ [7]


अनन्य भक्ति एवं वर प्रदान करनेवाली करुणामयी श्री राधा की जय हो। जो संयम, नियम, यम, ध्यान, ज्ञान, विधान, तप एवं साधन प्रदान कराने वाली हैं, उन श्री राधा की जय हो।
जिनके बिना [अर्थात् श्री राधा की भक्ति बिन] श्री कृष्ण की पूर्ण निष्काम भक्ति भी अपूर्ण है, उन श्री राधा की जय हो। हे श्री राधिके, अब कृपा कर मेरे ह्रदय के अंधकार का हरण कीजिये। [7]

ललिता ललित सेवित सदा, मृदु भाषिणी मृदु हासिनी। पूजित अनन्य अनेक विधि, हरिदास की अनुरागिनी।
निधिवन निकुंज विहारिणी, मन हर 'छबीले' श्याम की। हे राधिके अब कर कृपा, हर कालिमा हृद्-धाम की॥ [8]


मृदु भाषिणी एवं मृदु हासिनि, श्री ललिता आदि सखीगण जिनकी सेवा में नित्य उपस्थित हैं, रसिक अनन्य जिनकी अनेक प्रकार से आराधना करते हैं, जो श्री हरिदास की अनुरागिनी हैं ।
छबीले श्री श्यामसुन्दर के मन का हरण करनेवाली निधिवन निकुंज विहारिणी श्री राधा की जय हो। हे श्री राधिके, अब कृपा कर मेरे ह्रदय के अंधकार का हरण कीजिये। [8]

भक्ति श्रद्धा के सहित, जन पाठ जो इसका करें। पद कंज रति व्रजवास कर, निश्चित हो जग से तरें॥
धन धाम सुख यश प्राप्त हो, गाठी खुले दुख दाम की। हे राधिके अब कर कृपा, हर कालिमा हृद्-धाम की॥ [9]


भक्ति और श्रद्धा के सहित जो भी इस स्तव का पाठ करेगा, उसे निश्चित ही श्री राधा के चरण कमलों का प्रेम प्राप्त होगा और श्री वृन्दावन का वास प्राप्त होगा।
उसे धन, धाम, सुख एवं संसार में यश प्राप्त होगा, तथा उसके दुःख का नाश होगा एवं परम पद की प्राप्ति होगी। हे श्री राधिके, अब कृपा कर मेरे ह्रदय के अंधकार का हरण कीजिये। [9]

कुँजविहारी रसिक वर, श्रीस्वामी हरिदास।
करहु कृपा उर बसहु नितु, वर वृन्दावनवास॥


हे श्री कुञ्जबिहारी-बिहारिणी जू, हे रसिक वर श्री स्वामी हरिदास जू, अब कृपा कर मेरे ह्रदय में नित्य निवास कीजिये एवं श्री वृन्दावन का नित्य वास प्रदान कीजिये।

- श्री छबीले वल्लभ जी, श्री राधिका स्तव