(राग मल्हार)
झूलत सुरंग हिंडोरे राधामोहन।
वरन वरन तन चूनरी पहिरे ब्रजबधू चहुँ ओरे॥ [1]
राग मल्हार अलापत सप्तसुर तीन ग्राम जोरे।
मदनमोहनजू की या छबि ऊपर गोविन्द बल त्रन तोरे॥ [2]
- श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (210)
सुन्दर रंगों से चित्रित झूले पर श्री राधा कृष्ण झूला झूल रहे हैं। अलग-अलग वर्णों के वस्त्र धारण किये हुए सखियाँ उनके चारों ओर खड़ी हैं। [1]
सखियाँ सभी सात स्वरों और तीन सप्तक में मल्हार राग में एक साथ गा रही हैं। श्री राधा कृष्ण की इस सुन्दर छवि पर श्री गोविंददास अपने आप को न्योंछावर कर रहे हैं। [2]
झूलत सुरंग हिंडोरे राधामोहन।
वरन वरन तन चूनरी पहिरे ब्रजबधू चहुँ ओरे॥ [1]
राग मल्हार अलापत सप्तसुर तीन ग्राम जोरे।
मदनमोहनजू की या छबि ऊपर गोविन्द बल त्रन तोरे॥ [2]
- श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (210)
सुन्दर रंगों से चित्रित झूले पर श्री राधा कृष्ण झूला झूल रहे हैं। अलग-अलग वर्णों के वस्त्र धारण किये हुए सखियाँ उनके चारों ओर खड़ी हैं। [1]
सखियाँ सभी सात स्वरों और तीन सप्तक में मल्हार राग में एक साथ गा रही हैं। श्री राधा कृष्ण की इस सुन्दर छवि पर श्री गोविंददास अपने आप को न्योंछावर कर रहे हैं। [2]

