जन्म :
गुजरात प्रान्त के चिलोत्रा ग्राम में 1496 में श्री कृष्णदास जी का जन्म हुआ था। ये शूद्र वर्ण के थे। कालांतर में महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य की कृपा से श्री कृष्णदास जी को श्रीनाथजी की सेवा प्राप्त हुई और ये पद रचना करते तथा श्रीनाथजी को सुनाते।
श्री कृष्णदास जी का महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी के शरण आना :
श्री कृष्णदासजी ने घर छोड़कर व्रज की यात्रा पर जाने का निश्चय किया। अपनी तीर्थयात्रा में वे मथुरा होते हुए श्री गोवर्धन पहुंचे। वहां देव दमन का नया मंदिर बनाया जा रहा था और कुछ दिनों बाद देव दमनजी का स्वरूप वहां स्थापित किया जाना था। उस समय श्री महाप्रभुजी राजभोग आरती कर रहे थे। श्री गोवर्धननाथजी के स्वरूप को देख श्री कृष्णदासजी का मन श्री गोवर्धननाथजी के स्वरूप में लीन हो गया। साथ ही साथ श्री गोवर्धननाथजी भी श्री कृष्णदासजी को निहारते रहे। तब श्री गोवर्धननाथजी ने श्री महाप्रभुजी को बताया कि श्री कृष्णदासजी जो बहुत दिनों से बिछड़े हुए हैं, आ गए हैं। तब श्री महाप्रभुजी ने श्री कृष्णदासजी को कहा "यमुना में स्नान कर आओ।" उसके बाद उन्होंने श्री कृष्णदासजी को श्री गोवर्धननाथजी के सामने समर्पण दीक्षा दी। वैशाख के शुक्ल पक्ष के तीसरे दिन श्री महाप्रभुजी ने श्री गोवर्धननाथजी को मंदिर में स्थापित किया और श्री गोवर्धननाथजी की सेवा के लिए पास के बंगालियों को नियुक्त किया और श्री कृष्णदासजी को श्री गोवर्धननाथजी के भेंटिया के रूप में नियुक्त किया, अर्थात श्री गोवर्धननाथजी के लिए देश के विभिन्न स्थानों का भ्रमण करने और भेंट इकट्ठा करने के लिए।
श्री कृष्णदास जी का मीराबाई द्वारा भेंट अस्वीकार करना :
एक समय श्री कृष्णदास जी द्वारिका गए हुए थे। वहां श्री रणछोड़जी के दर्शन कर लौट रहे थे। लौटते समय वे मीराबाई के गांव आये और उनके घर गए। वहाँ हरिवंशव्यास आदि भक्तगण भी आए हुए थे। किसी को आये 8 दिन हुए थे, किसी को 10 दिन तो किसी को 15 दिन। लेकिन श्री कृष्णदास तो आते ही कहने लगे की अब मैं चलता हूँ। श्री मीराबाई ने रुकने को कहा लेकिन श्री कृष्णदास जी रुके नहीं। तब श्री मीराबाई ने बहुत सारे मुहरें श्रीनाथजी को भेंट रूप में देने लगीं लेकिन श्री कृष्णदास ने यह कहते हुए मन कर दिया की "आप श्री महाप्रभु जी की सेवक नहीं हैं इसलिए मैं आपसे भेंट नहीं ले सकता।" ऐसा कह कर श्रीकृष्णदास जी ने विदा लिया। कुछ दूर आने पर एक वैष्णव ने श्री कृष्णदास जी से पूछा की आपने श्रीनाथजी के लिए भेंट क्यों नहीं ली। इसपर श्री कृष्णदास जी ने कहा "भेंट क्या है, मीराबाई के यहाँ इतने सेवक बैठे थे उन सब की नाक निचे करके भेंट अस्वीकार कर दिया। इतने सारे सेवक एक जगह पर कहाँ मिलते। ये सब लोग भी विचार करेंगे की महाप्रभु का एक शूद्र सेवक आया था जिसने भेंट अस्वीकार कर दी तो इनके गुरु कैसे होंगे।"
श्री कृष्णदास जी को श्रीनाथजी का श्यामकुमर को रात्रि में लाने की आज्ञा :
एक बार श्रीनाथजी ने श्री कृष्णदास जी को आज्ञा दी "तुम श्यामकुमर को ताल-पखावज लेके रात्रि में परासौली आना क्यूंकि श्यामकुमर बहुत अच्छा मृदंग बजाता है।"
श्रीनाथजी की शयन आरती के उपरांत श्री कृष्णदास जी श्यामकुमर के पास आये और कहा "श्रीनाथजी ने आज्ञा की है तुम मृदंग लेकर परासौली आओ।"
श्यामकुमर ने कहा "क्या मुझे भी श्रीनाथजी स्मरण करते हैं और आज्ञा करि है।" यह कहते हुए भाव-विह्वल हो वह मृदंग लेकर परासौली आया। श्यामकुमर और श्रीकृष्णदास जी परासौली में देखते हैं कि श्रीनाथजी स्वामिनी संग सिंहासन पर विराजमान हैं। तब श्रीनाथजी ने श्यामकुमर से कहा "तू मृदंग बजा" और कृष्णदास जी से कहा "तू कीर्तन गा।"
श्री कृष्णदास जी कीर्तन करने लगे और श्यामकुमर मृदंग बजाने लगा। श्रीनाथजी और श्री स्वामिनी जी नृत्य करने लगे। श्री कृष्णदास जी ने यह पद गाया -
(राग केदारौ)
श्रीवृषभानुनन्दनी नाचत गिरधर संग लागडाट उरपतिरपरास संग राखौ।
झपताल मिल्यौ रागकेदारौ सप्तसुरन अवघर तान रंग राख्यौ॥
पाई सुखसिद्धि भरतकामविविधि रिद्धि अभिनवदल सतसुहाग हुलास रंग राख्यौ।
वनिता सतजूथ संग लिये निरखत क्यों सघसचंद बलिहारी कृष्णदास सुधर रंग राखौ॥
श्री कृष्णदास जी के समस्त पदों में सूरदास जी की छाया का प्रसंग :
एक समय श्री सूरदास जी ने श्री कृष्णदास जी से पूछा "जो तुम पद बनाते हो उसमें मेरे पद की छाया है।"
इसपर श्री कृष्णदास जी ने कहा "ठीक है, अब ऐसा पर करूँगा जिसमें आपके पद की छाया न हो।" ऐसा कह कर श्री कृष्णदास जी एकांत में आकर बैठ गए और एकाग्रचित्त से नवीन पद की रचना करने लगे। पद में 3 तुक किये लेकिन चौथा तुक बन नहीं रहा था। 2 घडी बीत गई, लेकिन श्री कृष्णदास जी को चौथा तुक सूझ नहीं रहा था इसलिए उन्होंने विचार किया कि जाकर प्रसाद पा लूँ फिर आकर पद पूरा करूँगा। जिस पत्र में श्री कृष्णदास जी ने पद लिखा था वह पत्र, स्याही तथा लेखनी वहीँ छोड़ कर वे प्रसाद लेने चले गए। जब मंदिर में श्री कृष्णदास जी प्रसाद ग्रहण कर रहे थे उस समय श्रीनाथजी उस स्थान पर गए और पद को अपने हस्त कमलों से पूरा किया। श्री कृष्णदास जी ने आधा पद ही लिखा था एवं आधा पद श्रीनाथजी लिख कर पद पूरा किया तथा लौट आये।
श्री कृष्णदास जी प्रसाद पा कर जब अपने स्थान पर आये तो देखा की पद तो पूरा हो गया है। वे समझ गए की श्रीनाथजी ने अपने हस्त कमलों से पद को पूरा किया है। यह देख श्री कृष्णदास जी बहुत प्रसन्न हुए और सोचा कि जब श्री सूरदास आएंगे तब मैं उन्हें यह पद सुनाऊंगा।
यहाँ श्रीनाथजी की उत्थापन के समय जब श्री सूरदास जी आये तो कृष्णदास जी ने कहा "सूरदास जी, मैंने एक नया पद बनाया है जिसमें आपके भाव की छाया नहीं है।"
श्री सूरदास जी ने कहा "ठीक है, सुनाओ तो जानें कि कैसा पद किया है।"
तब श्री कृष्णदास जी ने पद गाया -
(राग गौरी)
आवत वनें कान्ह गोपबालक संग नेंचुकीखुर रेणु छुरतु अलकावली।
भौहैं मनमथ चापवक्र लोचनबान सीस सोभित मत्तमयूर चंद्रावली॥
उदित उडुराजसुंदर सिरोमणि वदन निरखि फूली नवल जुवती कुमुदावली।
अफूणसकुच अधरबिंबफल हसात कहत कछुक प्रकटित होत कुंद दसनावली॥
श्रवणकुंडल भाल तिलक वेसरिनाक कंठ कौस्तुभमणि सुभग त्रिवलावली।
रत्नहाटकखचित पुरसिपदिकनिपाति बीच राजत सुभपुलकमुक्तावली॥
अथ श्रीनाथजी कृत-
वलयकंकण बाजूबंद आजानुभुज मुद्रिका करदलविराजत नखावली।
कणतर मुरलिकामोहित अखिल विश्व गोपिकाजन मसिग्रसथित प्रेमावली॥
कटि क्षुद्रघंटिका जटितहीरामयी नाभिअम्बुजवलित भृगरोमावली।
धाय कबहुक चलत भक्तहित जानि पिय गंडमण्डल रुचिर श्रमजल कणावली॥
पीतकोसय परिधानें सुंदर अंग चरण नुपुरवाद्य गीत सवदावसी।
हृदय कृष्णदास गिरवरधरण लाल की चरणनख चन्द्रिकाहरति तिमिरावली॥
इस पद को सुनकर श्री सूरदास जी 3 तुक पर कुछ बोले नहीं लेकिन आखरी के 3 तुक पर विचार करने लगे और बोले "कृष्णदास, मेरा तुमसे वाद है लेकिन प्रभु से नहीं। मैं प्रभु की वाणी को पहचानता हूँ।"
इसपर श्री कृष्णदास जी कुछ बोले नहीं, चुप रहे।
श्री कृष्णदास जी द्वारा एक वैश्या का उद्धार :
एक समय श्रीनाथजी की सेवा की कुछ सामग्री लेने श्री कृष्णदास जी आगरा गए। वहाँ उन्होंने देखा की बाजार में एक वैश्या नृत्य कर रही थी। उस वैश्या के साथी गा रहे थे एवं सब लोग तमाशा देख रहे थे। श्री कृष्णदास जी भी तमाशे में जा खड़े हुए। जब भीड़ कम हो गयी तो वह वैश्या श्री कृष्णदास जी के सामने नृत्य करने लगी। वह वैश्या बड़ी सुन्दर थी, और बहुत अच्छा गाते हुए नृत्य भी उसी प्रकार कर रही थी। श्री कृष्णदास जी उस वैश्या के ऊपर रीझ गए और मनमें विचारने लगे कि यह तो श्रीनाथजी के लायक ही है। श्री कृष्णदास जी ने उस वैश्या को वहीँ पर 10 मुद्रा दी और कहा की रात में अपने समाज संग हवेली पर आना।
श्री कृष्णदास जी ने बाज़ार से सब सामग्री लेकर बैल गाड़ियों पर चढ़ा दिया। इसके बाद रात्रि के एक पहर बीतने पर वह वैश्या समाज सहित वहाँ आयी। अब वहाँ समाज सहित गाना और नृत्य हुआ जिसपर श्री कृष्णदास जी ने प्रसन्न होकर उस वैश्या को 100 सिक्के दिए और कहा "तेरा गाना और नृत्य बहुत ही अच्छा है लेकिन मेरा सेठ तेरे इस गान और नृत्य से प्रसन्न नहीं होगा। इसलिए जो मैं बताता हूँ वही गाना।"
इसके बाद श्री कृष्णदास जी ने राग पूर्वी में एक पद बनाया और उस वैश्या को सिखाया। फिर श्री कृष्णदास जी उस वैश्या को समाज सहित लेकर 2 बाद गोवर्धन आये। अगले दिन श्री कृष्णदास जी ने सब सामग्री श्रीनाथजी के भंडार गृह में रखवा दिए और उत्थापन के समय किसी कीर्तनिया को मंदिर में आने नहीं दिया। तब उस वैश्या को समाज सहित श्रीनाथजी के मंदिर में ले आये। श्री गुसाईं जी श्रीनाथजी की सेवा में उपस्थित थे। वह वैश्या मंदिर के प्रांगण में नृत्य करने लगी और श्री कृष्णदास जी का सिखाया हुआ यह पद गाने लगी -
(राग पूरवी)
मोमन गिरधर छबिपर अटक्यौ।
ललित त्रिभंगी अंगन परि चलि गयौ तहांईंठटक्यौ॥ 1॥
सजल श्यामघन चरणनीलह्वै फिरचित अनितनभ टक्यौ।
कृष्णदास कियौ प्राण न्यौछावार यह तन जगसिर पटक्यौ॥ 2॥
इस पद को गाते हुए वह वैश्या नृत्य कर रही थी और जैसे ही अंतिम पंक्ति "कृष्णदास कियौ प्राण न्यौछावार यह तन जगसिर पटक्यौ" यह गाया तो उस वैश्या के शरीर से प्राण निकल गए और वह अपने दिव्य स्वरुप से श्रीनाथजी की लीला में प्रविष्ठ हो गयी।
उस वैश्या के समाजी बड़े दुखी हो गए की हमारी तो यही जीविका थी अब हम क्या खाएंगे। श्री कृष्णदास जी ने उन सबको शांत किया और 100 सिक्के देकर विदा किया। श्री कृष्णदास जी ने उस वैश्या को अपने मन से श्रीनाथजी के चरणों में समर्पित किया था इसलिए श्रीनाथजी ने उस वैश्या को अंगीकार कर लिया।
श्री कृष्णदास जी का गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी को श्रीनाथजी मंदिर में प्रवेश करने से मना करना :
श्री कृष्णदास जी का गंगाबाई से बहुत स्नेह था। यह श्री गुसाईं जी को सुहाता न था। एक दिन श्री गुसाईं जी ने श्रीनाथजी को भोग धराया और गंगाबाई की दृष्टि उस अमनिया भोग पर पड़ी थी इसलिए उस भोग को श्रीनाथजी ने नहीं आरोगा। लेकिन यह कोई जान नहीं पाया। इसलिए भोग लेने के पश्चात् श्री गुसाईं जी ने श्रीनाथजी की आरती की और श्रीनाथजी को शयन करा कर मंदिर से नीचे उतर आये। श्री गुसाईं जी ने प्रसाद ग्रहण किया और पौढ गए तथा सब भितरिया सेवकों ने भी प्रसाद पाया और विश्राम करने लगे।
तब श्रीनाथजी ने एक सेवक को लात मार कर जगाया और कहा "मैं तो भूखा हूँ।"
इसपर सेवक ने कहा "हे प्रभु, श्री गुसाईं जी ने तो आपको भोग समर्पित किया था तो आप भूखे क्यों रहे।"
श्रीनाथजी ने कहा "राजभोग में गंगाबाई की दृष्टि पड़ी थी इसलिए मैंने राजभोग आरोगा नहीं।"
यह सुनकर वह सेवक तुरंत श्री गुसाईं जी के पास आया। गुसाईं जी पौढ़े हुए थे तो वह सेवक उनके चरण दबाने लगा। श्री गुसाईं जी चौंक कर उठे तो सेवक को देख कर कहा "इस समय तुम यहाँ क्यों आये हो।"
सेवक ने श्रीनाथजी की कही हुयी सब बात बता दी। यह सुनते ही श्री गुसाईं जी स्नान कर मंदिर में आये और सेवक से भात और वड़ा बनाने को कहा। सेवक ने तुरंत भात और वड़ा बनाया और श्री गुसाईं जी ने श्रीनाथजी को भोग धराया। इसके बाद श्री गुसाईं जी ने सेवक से कहा "राजभोग तो पहले ही समर्पित हो गया था और अब शयन भोग की सामग्री भी पधरा दी गयी।" इसके बाद गुसाईं जी ने भोग उतारकर श्रीनाथजी की शयन आरती की और उन्हें पौढ़ा कर मंदिर से बाहर आये। प्रसाद एक डिब्बे में रख लिया था सो गुसाईं जी ने सबको थोड़ा-थोड़ा प्रसाद दिया और स्वयं भी पाया। इतने में श्री कृष्णदास जी आगए और गुसाईं जी से कहा "महाराज, यदि आप ही सब करनेवाले है एवं आप ही भोग आरोगने वाले हैं तो यही उत्तम है।"
श्री गुसाईं जी ने श्री कृष्णदास जी से हंस कर कहा "यह सब तुम्हारे ही किये का भोग भोग रहा हूँ।" यह बात सुनकर श्री कृष्णदास जी को बड़ा बुरा लगा और उन्होंने श्री गुसाईं जी से कहा "अब आप गोवर्धन के ऊपर श्रीनाथजी मंदिर में नहीं चढ़ेंगे।"
यह सुनकर श्री गुसाईं जी परासौली आ गए और विचारने लगे की कृष्णदास कहाँ मना करनेवाला है, यह तो श्रीनाथजी की ही इच्छा है। श्री गुसाईं जी वहीँ से श्रीनाथजी की खिड़की से प्रभु का दर्शन करते थे। वे 3 दिन परासौली में रहते और 3 दिन गोकुल में।
जब श्री कृष्णदास जी को यह पता चला की गुसाईंजी को खिड़की से श्रीनाथजी के दर्शन होते हैं तो उन्होंने खिड़की को बंद करा दिया। अब श्री गुसाईं जी भितरिया सेवक रामदास को श्रीनाथजी के लिए पत्र लिख कर भेजते। रामदास वह पत्र श्रीनाथजी को अर्पित करता। श्रीनाथजी उस पत्र को पढ़ कर उसमे उत्तर लिखते और रामदास वह पत्र श्री गुसाईं जी को लाकर देते थे। श्री गुसाईं जी उस पत्र को पढ़ कर उसे पानी में घोल कर पी जाते। पत्रों का ऐसा व्यव्हार 6 महीने तक चलता रहा। श्री गुसाईं जी श्री कृष्णदास जी को महाप्रभु का सेवक जानकर कभी कुछ बोले नहीं लेकिन श्रीनाथजी के विरह में व्याकुल रहते।
एक दिन राजा बीरबल श्रीनाथजी के दर्शन करने आये। श्री गुसाईं जी तो परासौली में विराजमान थे इसलिए बीरबल प्रभु के दर्शन कर गिरिधर जी के घर आये। गिरिधर जी ने उन्हें बताया की श्री कृष्णदास जी गुसाईं जी को मंदिर में आने नहीं देते। यह सुनकर बीरबल मथुरा आये और 500 सैनिकों को श्री कृष्णदास जी को बंदी बना कर लाने को कहा। सैनिक श्री कृष्णदास जी को बंदी बनाकर ले आये। बीरबल ने कृष्णदास जी को बन्धीखाने में बंद कर दिया। यहाँ श्री गिरिधर जी गुसाईं जी के पास पहुंचे और सब समाचार सुनाया। श्री गुसाईं जी कहने लगे "हाय-हाय, श्री महाप्रभु जी के सेवक को इतना कष्ट, जरूर तुमने बीरबल से शिकायत की होगी।"
श्री गिरिधर जी ने कहा "मैंने तो बीरबल के पूछने पर सहज ही सब बता दिया था।"
श्री गुसाईं जी ने कहा "मैं तभी अन्न ग्रहण करूँगा जब कृष्णदास यहाँ आएगा।"
यह सुनकर श्री गिरिधर जी तुरंत घोड़े पर सवार होकर बीरबल के पास पहुंचे और उनसे बताया की कृष्णदास के बिना गुसाईं जी अन्न ग्रहण नहीं करेंगे। यह सुनकर बीरबल ने कृष्णदास को बंधन से मुक्त किया। श्री गिरिधर जी श्री कृष्णदास जी को लेकर तुरंत गोकुल चल दिए। जब यह सूचना गुसाईं जी के पास पहुंची तो वे ठकुरानी घाट पर आ गए। गिरिधर जी के संग श्री कृष्णदास भी वहां आ गए। श्री कृष्णदास जी घोड़े से उतारकर श्री गुसाईं जी को दंडवत प्रणाम किया और एक पद सुनाने लगे -
(राग केदारौ)
श्रीविठ्ठलजू के चरण की वलि।
हमसे पतित उधारनकारन परम कृपाल आयै आपन चलि॥
उज्जल अरुण दया रंगरंजित दशनखचंद्रविहरत मन निरदलि।
सुभगकरसुखकर शोभन पावन भक्ति मुदित ललितकर अंजलि॥
अतिसेमरदुलि सुगंधसु शीतल परतत्रि विधिताप डारतमल।
भजिकृष्णदास वार एक सुधिकरि तेरौ कहा करेगौ रिपुकल॥
इसके बाद श्री गुसाईं जी के भोजन करने के उपरांत श्री कृष्णदास जी ने शीत प्रसाद ग्रहण किया। इसके बाद श्री गुसाईं जी कृष्णदास को लेकर श्रीनाथजी मंदिर पधारे। राजभोग के समय गुसाईं जी श्रीनाथजी के सामने आये। श्रीनाथजी गुसाईं जी को देख कर बहुत प्रसन्न हुए और उनसे पूछा "तुम ठीक से तो हो" इसपर गुसाईं जी ने कहा कि जो दिन आपके दर्शन हो वही दिन उत्तम है। श्रीनाथजी के शयन के उपरांत गुसाईं जी ने कृष्णदास जी को बुलाया और कहा कि तुम अब सब देख-रेख अपने अधिकार में लो और सेवा करो। श्री कृष्णदास जी ने श्री गुसाईं जी से अपने अपराध की क्षमा मांगी जिसपर गुसाईं जी ने कहा कि तुम्हारे अपराध श्रीनाथजी क्षमा करेंगे।
श्री कृष्णदास जी का कुँए में गिरने से मृत्यु तथा प्रेत योनि प्राप्त होना :
एक समय एक वैष्णव श्री कृष्णदास जी के पास आया और बोलै "महाराज, मुझे एक कुआँ बनवाना है। मुझे अपने घर भी जाना है इसलिए मैं आपको पैसे देता हूँ आप बनवा दीजियेगा।"
उस वैष्णव ने 300 रुपये श्री कृष्णदास जी को दिया और अपने गांव चला गया। श्री कृष्णदास जी ने उन पैसों में से 100 रुपये एक कुल्हड़ में रखकर आम के पेड़ के निचे गाड़ दिया और सोचा की जब 200 रुपये खर्च हो जायेंगे तब इन पैसों को निकालूंगा। इसके बाद कोई अच्छा मुहूर्त देख कर श्री कृष्णदास जी रूद्र कुंड के पास एक कुँवा खुदवाने लगे। कुछ दिन बाद वह कुआँ खुद कर तैयार हुआ बस ऊपर का कुछ काम शेष रह गया था। श्री कृष्णदास जी उस कुँए को देखने गए और फिसल कर उस कुँए में ही गिर गए। 2 आदमी कुँए में उतरे और श्री कृष्णदास जी को खोजने लगे लेकिन श्री कृष्णदास का शरीर नहीं मिला। तब वे सब गुसाईं जी के पास आये और कहा की "श्री कृष्णदास जी कुँए में गिर गए लेकिन उनका शरीर नहीं मिला।" पास में बैठे रामदास जी ने कहा "अधो गच्छंतितामसाः"
इसपर गुसाईं जी ने कहा की रामदास ऐसा न कहो।
श्री कृष्णदास जी का कुँए में गिरने और शरीर न मिलने का कारण यह है कि श्री कृष्णदास जी में कोई अलौकिक जीव था जो श्रीनाथजी की सेवा को प्राप्त हुआ और इस शरीर से कृष्णदास जी ने गुसाईं जी की अवज्ञा की थी इसलिए वह शरीर पूंछरी में एक पीपल के पेड़ में प्रेत बन कर दंड भोग रहा है। लेकिन इस बात का किसी को पता नहीं चला।
गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी का श्री कृष्णदास जी का प्रेत योनि से उद्धार करना :
एक समय श्रीनाथजी की एक भैंस खो गयी थी। गोपीनाथ ग्वाल और 4-5 ग्वाल उस भैंस को ढूंढने निकले। वे सब ढूंढते हुए पूंछरी आये तो देखा कि श्रीनाथजी वहां खेल रहे थे और पीपल के पेड़ के ऊपर श्री कृष्णदास जी प्रेत बनकर बैठे थे। श्री कृष्णदास जी ने गोपीनाथ ग्वाल से कहा
"अरे भैया, मेरी एक विनती श्री गुसाईं जी से करना और कहना कि कृष्णदास ने कहा है की मैं आपका अपराधी हूँ, इसलिए मेरी यह अवस्था हुई है। मैं नित्य श्रीनाथजी के पास हूँ लेकिन श्रीनाथजी मेरा स्पर्श नहीं करते और मेरी गति भी नहीं हो रही है। मेरे अपराध को क्षमा कीजिये तब मेरी गति होगी। बगीचे में एक आम के पेड़ के नीचे 100 रुपये रखे होंगे उसे निकाल कर उस कुँए का जो ऊपरी काम बाकी है उसे बनवा दीजिये तब मेरी गति होगी।"
गोपीनाथ ग्वाल श्री गुसाईं जी के पास आया और कृष्णदास जी की सब बात सुनाई। तब श्री गुसाईं जी ने आम के पेड़ के नीचे से 100 रुपये निकाले और कुँए के काम को पूरा किया जिससे कृष्णदास जी प्रेत शरीर से मुक्त हो गए।
श्रीनाथजी श्री कृष्णदास जी को प्रेत शरीर में भी दर्शन देते थे सो इसका कारण यह है कि श्री गुसाईं जी ने कृष्णदास जी को श्रीनाथजी के सम्मुख बुलाकर कहा था कि तुम अब मंदिर का अधिकार करो और श्रीनाथजी की सेवा करो। इसपर कृष्णदास जी ने कहा था कि महाराज मेरे अपराध को क्षमा कीजिये। और गुसाईं जी ने कहा था कि तुम्हारे अपराध को श्रीनाथजी क्षमा करेंगे। इसी कारण से श्रीनाथजी ने श्री कृष्णदास के अपराध को क्षमा किया और उन्हें प्रेत शरीर में भी दर्शन देते थे। लेकिन श्रीनाथजी कृष्णदास जी का स्पर्श नहीं करते थे और यदि स्पर्श कर लिया होता तो श्री कृष्णदास जी का उद्धार हो गया होता लेकिन कृष्णदास जी का उद्धार तो श्री गुसाईं जी के हाथ में था।
श्री कृष्णदास जी ने प्रेत शरीर में श्रीनाथजी से कहा था कि "प्रभु, आप मुझे दर्शन देते हो और मुझसे बोलते भी हो तो मेरा उद्धार क्यों नहीं करते।"
श्रीनाथजी ने कहा "मैं तुझे जो दर्शन देता हूँ और तुझसे बोलता हूँ वह श्री गुसाईं जी के वचन के लिए ही, नहीं तो मैं तुझे प्रेत योनि में दर्शन नहीं देता और बोलता भी नहीं। तूने श्री गुसाईं जी का अपराध किया है इसलिए तेरा उद्धार गुसाईं जी के हाथ में हैं, वे जब करेंगे तभी तेरा उद्धार होगा।"
प्रेत बनने के बहुत दिन बाद परम कृपालु श्री गुसाईं जी को श्री कृष्णदास जी पर दया आ गयी कि कृष्णदास को बहुत दिन से कष्ट हो रहा है। इसलिए श्री गुसाईं जी ने ध्रुवघाट पर जाकर श्री कृष्णदास जी के लिए श्राद्ध कर्म आदि करवाया और उनका उद्धार किया। तब श्री कृष्णदास जी प्रेत योनि से मुक्त हुए और लीला में सम्मिलित हुए।

