जो लालच कोटिक मिले, तौन चित्त ललचाय - श्री माधुरी दास,  वृंदावन माधुरी (93)

जो लालच कोटिक मिले, तौन चित्त ललचाय - श्री माधुरी दास, वृंदावन माधुरी (93)

जो लालच कोटिक मिले, तौन चित्त ललचाय ।
तजि वृंदावन माधुरी, सुपने अनत न जाय ॥

- श्री माधुरी दास,  वृंदावन माधुरी (93)

श्री वृन्दावन धाम की ऐसी विलक्षण माधुरी है कि यदि हृदय एक बार इसका रस चख ले, तो चाहे करोड़ों प्रकार के प्रलोभन क्यों न मिलें, वह फिर कहीं ललचाता नहीं है। श्री वृन्दावन-रस का त्याग करके, वह स्वप्न में भी कहीं अन्यत्र नहीं जाना चाहता।