श्री परमानन्ददास जी की जीवनी

श्री परमानन्ददास जी की जीवनी

जन्म :
श्री परमानन्ददास जी का जन्म कन्नौज के एक ब्राह्मण घर में 1493 में हुआ। ये श्री कृष्ण के परमसखा थे और बड़े उच्च कोटि के कवि थे। श्री परमानन्ददास जी अपने रचे पदों को बड़े मधुर राग में गाते और कीर्तन करते। जो भी इनका कीर्तन सुनता वह भाव विभोर हो उठता। 

श्री परमानन्ददास जी को स्वप्न में श्री नवनीत प्रिया जी के दर्शन हुए :
एक समय श्री परमानन्ददास जी ने प्रयाग में माघ स्नान करने का विचार किया और कन्नौज से प्रयाग आ गए। प्रयाग में भी परमानन्ददास जी के कीर्तन की प्रसिद्धि फैलने लगी और दूर-दूर से भक्तगण इनका कीर्तन सुनने आने लगे। 
प्रयाग में यमुना के उस पार अड़ैल में अपने कार्यालय में श्री महाप्रभु जी सेवकों के संग विराजमान थे। अड़ैल से भी कुछ लोग परमानन्ददास जी का कीर्तन सुनने आते और लौट कर अड़ैल में वही कीर्तन गाते। महाप्रभु के एक सेवक जलघरिया कपूर क्षत्री ने जब अड़ैल में लोगों के मुख से वह कीर्तन सुना तो वे उसके राग पर रीझ गए और उनके मन में परमानन्ददास जी का कीर्तन सुनने की इच्छा होने लगी। लेकिन सेवा से अवकाश न मिलने से जलघरिया जा नहीं सके। 
एक दिन प्रयाग से एक वैष्णव अड़ैल आया और उसने बताया की आज एकादशी है और परमानन्ददास जी आज रात को जागरण करेंगे और कीर्तन करेंगे। यह सुनकर जलघरिया ने विचार किया की आज रात में परमानन्ददास जी के जागरण में जाना चाहिए और कीर्तन सुनना चाहिए। ऐसा विचार कर जलघरिया अपने सेवा से निवृत होकर अपने घर आए और रात्रि में यमुना पार कर परमानन्ददास जी के जागरण में पहुंचे। इन्हें सब जानते थे की ये महाप्रभु के सेवक हैं इसलिए सबने इनका सम्मान किया और आसन पर बैठाया। परमानन्ददास जी इनसे कभी मिले नहीं थे। श्री परमानन्ददास जी विरह के पद गा रहे थे जिसका कारण यह है की ये कृष्ण के परम सखा हैं एवं बिछुड़े हुए है। अभी तक इन्होंने श्रीनाथजी के दर्शन नहीं किये थे। इसलिए इनका अंतःकरण सहज ही विरह के भाव से भावित था। पद इस प्रकार है -

(राग बिहागरौ)
ब्रजके बिरही लोग बिचारे।
बिन गोपाल ठगेसे ठाडे अति दुर्बल तनहारे॥
मात जसोदा पंथ निहारत निरखत सांझ सकारे।
जो कोई कान्ह कान्ह कहि बोलत अंखियन बहुत पनारे॥
यह मथुरा काजरकी रेखा जे निकसेते कारे।
परमानन्द स्वामी बिनु ऐसे जैसे चंदा विनु तारे॥

(राग बिहागरौ)
सब गोकुल गोपाल उपासी।
जो गाहक साधन के उधौ सो सब बचन ईस पुरकासी॥
जद्यपि हरिहम तजी अनाथ करि अब छांडत क्यों रतिजासी।
अपनी सीतलता तहां छोडत जद्यपि बिधुराह है ग्रासी॥
किंह अपराध जोग लिखि पठयो प्रेम भजनते करत उदासी।
परमानन्द अंसीको बिरहन माँगें मुक्ति पुनरासी॥

(राग कान्हरौ)
कौन रसिक है इन बातनको।
नंद नंदन विन कासों कहियै सुनिरी सखी मेरे दुखिया मनको॥
कहावे यमुना पुलिन मनोहर कहा वह चंद सरद रातिकौ।
कहावे मंद सुगंध अमल रस कहावे षट् पद जल जातनकौ॥
कहावे सेज पौढिबो बनको फुल बिछोना मृदुपातनको।
कहावे दरस परस परमानंद कोमलतन कोमल गातको॥

(राग कान्हरौ)
माईको मिलवै नंदकिसोरे।
एक वारको नैन दिखावें मेरे मनको चोरे॥
जागतजा मगन तनहीं खूंटत क्यों पाऊंगी भोरे।
सुनरी सखी अब कैसें जीजै सुन तमचर खगरोरे॥
जो यह प्रीति सत्य अंतरगति जिन काहू बन होरे।
परमानंद प्रभू आन मिलेंगे सखी सीस जिन ढोरे॥

श्री परमानन्ददास जी ने ये पद गाए। अब सुबह होने को आया और सब श्रोतागण अपने घर को गए। जलघरिया ने परमानन्ददास जी से कहा "जैसा आपके बारे में सुना था आप उससे भी अधिक अच्छा गाते हैं।" जलघरिया ने परमानन्ददास जी से जय श्री कृष्ण कहकर अड़ैल आ गए। 
यहाँ रात्रि में जागरण के कारण श्री परमानन्ददास जी को नींद आ गयी और उन्होंने स्वप्न में देखा की वे कीर्तन कर रहे हैं और जलघरिया सामने बैठे है एवं उनके गोद में सौंदर्य राशि श्री नवनीत प्रिया जी विराजमान हैं। प्रभु ने कहा "परमानन्ददास जी, मैं जलघरिया के गोद में बैठकर तुम्हारा कीर्तन सुन रहा था।" इतने पर परमानन्ददास जी की आँख खुली और ठाकुर जी के रूप सौंदर्य और मधुर वाणी से वे प्रेम विह्वल हो गए और उस झांकी को अपने ह्रदय में बसा लिया। 

श्री महाप्रभु से प्रथम मिलन एवं दीक्षा : 
श्री परमानन्ददास जी को स्वप्न में जब से ठाकुर जी के दर्शन हुए हैं तबसे उनका मन फिर से दर्शन करने के लिए व्याकुल था। उन्होंने विचार किया ठाकुर जी का दर्शन जलघरिया के गोद में हुआ था जो महाप्रभु के सेवक हैं। इसलिए जलघरिया के पास जाना चाहिए तब मन की कामना पूर्ण हो सकती है। ऐसा विचार कर श्री परमानन्ददास जी अड़ैल आ गए। आगे देखा तो महाप्रभु स्नान कर संध्या वंदन कर रहे हैं। श्री परमानन्ददास जी को महाप्रभु साक्षात् श्री कृष्ण प्रतीत हो रहे थे। तब परमानन्ददास जी सोचने लगे की जलघरिया के गोद में ठाकुर जी लीला करते हैं सो इसका कारण यही है की उनके गुरु ही साक्षात् श्री कृष्ण हैं। श्री परमानन्ददास जी वही पर बैठ गए। 
महाप्रभु संध्या वंदन से निवृत्त होकर आसन पर विराजे एवं उनकी दृष्टि परमानन्ददास पर पड़ी। महाप्रभु ने कहा "परमानन्द, भगवान का कुछ यश वर्णन करो"
इसपर श्री परमानन्ददास जी पद गाने लगे -

(राग सारंग)
कोनवेरभई चलेरीगोपाले। 
होंननसार गई हों न्योते वारवार बोलत ब्रजबोले॥
तेरौ तनको रूप कहां गयौ भामिन अरु मुखकमल सुखाय रह्यौ। 
सब सौभाग्य गयौ हरिके संग हृदयसों कमल विरह दह्यौ॥
को बोले को नैन उघारे को प्रतिउत्तर देहि विकल मन। 
जो सर्वस्व अक्रूर चुरायौ परमानंद स्वामी जीवनधन॥

(राग सारंग)
जियकी साधन जियही रहीरी।
बहुरि गोपाल देखि नाहीं पाए विलपत कुञ्जअहीरी॥
एक दिनसोंजसमीप यह मारग वेचन जातदहीरी।
प्रीतके लिये दानमिस मोहन मेरी बाँहगहीरी॥
बिन देखें घडी जातकलपसम विरहाअनल दहीरी।
परमानंद स्वामी बिन दर्शन नैनन नींदबहीरी॥

(राग संगम)
वह बात कमलदलनैननकी।
वारवार सुधि आवत रजनी बहु दुरिदेनी सेनी सेनकी॥
वह लीला वह रास सरदको गोरजरजनी आवनि।
अरु वह ऊचीटेरमनोहर मिसकरिमोहसुनावनि॥ 
वसन कुञ्जमें रास खिलायो विथा गमाई मनकी।
परमानंदप्रभूसों क्योंजीवे जो पोखीमृदुवैनकी॥

इस प्रकार श्री परमानन्ददास जी ने विरह के कुछ पद गाये। इन पदों को सुनकर महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी ने कहा "कुछ बाल लीला वर्णन करो"
श्री परमानन्ददास जी ने कहा "महाराज, मेरे ह्रदय में प्रभु के संयोग लीला की स्फूर्ति नहीं होती"
इसपर महाप्रभु ने कहा "जाओ स्नान कर आओ तब मैं तुमको प्रभु की लीला समझाऊंगा"
श्री परमानन्ददास जी स्नान करके आये तब महाप्रभु ने कहा की आगे आकर पास में बैठ जाओ। परमानन्ददास आगे आकर बैठ गए। फिर महाप्रभु ने परमानन्ददास जी को नाम सुनाया और कुछ समय बाद श्री नवनीत प्रिया जी के समक्ष ब्रह्मसंबंध कराया। फिर परमानन्ददास जी को श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध की अनुक्रमाणिका सुनाई जिससे उनके ह्रदय में प्रभु की समस्त लीलाओं की स्फूर्ति हो गयी। अब महाप्रभु ने कहा "परमानन्द, बाल लीला वर्णन करो"
श्री परमानन्ददास जी बाल लीला का एक पद बनाया और महाप्रभु एवं श्री श्री नवनीत प्रिया जी के सम्मुख गाने लगे -

(राग सांभरी)
माईरी कमलनैन श्यामसुंदर झूलत हैं पलना। 
बाल लीला गावत सब गोकुल के ललना ॥
अरुण तरुण कमल नखमनि जस जोती। 
कुंचित कचमकराकृत लटकत गज मोती ॥
अंगूठा गहि कमलपान मेलत मुख माहीं। 
अपनों प्रतिबिम्ब देखि पुनिपुनि मुसिकाहीं ॥
जसुमतिके पुन्यपुञ्ज वारवार लाले। 
परमानंदस्वामी गोपाल सुत सनेह पाले॥

(राग बिलावल)
जसोधा तेरे भाग्यकी कही न जाय। 
जो मूरति ब्रह्मादिक दुर्लभ सो प्रघटे हैं आय॥
शिव नारद सनकादिक महामुनि मिलवे करत उपाय। 
ते नंदलाल धूरधूसरवपु रहत गोदलिपटाय॥
रतनजडितपोढाय पालने वदन देख मुसिकाई। 
झूलौ मेरे लाल बलिहारी परमानंद जस गाई॥

(राग बिलावल)
“मणिमय आंगन नन्दके खेलत दोऊ भैया”

बाल लीला के इन पदों को श्री परमानन्ददास जी ने गाया जिसको सुनकर महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें श्री नवनीतप्रियाजी के कीर्तन की सेवा प्रदान की। अब परमानन्ददास जी नित्य ही नविन पद की रचना करते और श्री नवनीतप्रियाजी को सुनाते। सेवा के उपरांत महाप्रभु को पद सुनाते थे। श्री महाप्रभु नित्य कथा कहते थे और परमानन्ददास जी भी नित्य कथा सुनते थे और कथा के अनुसार पद गाते थे। 
एक दिन कथा में श्री परमानन्ददास जी ने श्री ठाकुर जी के चरणारविन्दों का माहात्म्य सुना तो प्रभु के चरणारविन्द के पद बनाकर श्री महाप्रभु को सुनाने लगे। वह पद - 

(राग कान्हरौ)
चरण कमल वंदौ जगदीश गोधनके संग धाए। 
जे पदकमल धूरि लपटाने करि गहि गोपीनके उर लाए॥ 

इस पद को सुनकर महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए। इसके बाद श्री परमानन्ददास जी ने महाप्रभु के स्वरुप एवं प्रार्थना के पद गाए। 

"यह मांगों गोपीजनवल्लभ"

इस पद को सुनकर महाप्रभु ने विचार किया की परमानन्ददास जी ने इस पद को सुनाकर ब्रज के दर्शन की प्रार्थना की है इसलिए अब ब्रज को चलना चाहिए। 

महाप्रभु का परमानन्ददास जी के घर पधारना एवं परमानन्ददास जी के विरह के पद सुनकर महाप्रभु का 3 दिन के लिए समाधी अवस्था को प्राप्त होना :
महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी अपने सेवक दामोदरदास हरिसानी, कृष्णदास मेघन, परमानन्ददास और यादवदास हलवाई एवं रसोई की सब सामग्री लेकर अड़ैल से ब्रज की और जाने लगे। सब वैष्णवगण संग चल रहे थे। मार्ग में कन्नौज आया जहाँ परमानन्ददास जी का घर था। श्री परमानन्ददास जी ने महाप्रभु से विनती की "महाराज, आपने मुझपर अतिशय कृपा की है जिससे मेरा भाग्योदय हुआ है, अब मेरे घर भी पधार कर घर को पावन कीजिये।" इसपर अंतर्यामी कृपानिधान भक्तमनोरथपुरक श्री महाप्रभु जी उनके घर में पधारे। 
श्री परमानन्ददास जी ने अच्छे से रसोई बनायीं और महाप्रभु ने श्री ठाकुर जी को भोग लगाया और फिर प्रसाद पाया। इसके उपरांत महाप्रभु गादी पर विराजे और परमानन्ददास जी से कहा "कुछ भगवद यश गाओ"
परमानन्ददास जी ने विचार किया इस समय महाप्रभु का मन गोवर्धन में श्रीनाथजी के पास है इसलिए कोई विरह का पद गाता हूँ। इसके बाद परमानन्ददास जी ने एक विरह का पद गाया -

(राग सोरठ)
हरि तेरी लीलाकी सुधि आवै। 
कमल नैन मनमोहनी मूरत मनमन चित्र बनावै॥
एक वार जाय मिलत माया करि सो कैसे विसरावै।
मुख मुसिक्यान वंक अविलोकन चाल मनोहर भावै॥
कबहुक निवड तिमर आलिंगन कबहुक पिक सुरगावै। 
कबहुक सभ्रम क्वासि-क्वासि कहि संगहीन उठि धावै॥
कबहुक नैन मूंदी अंतरगति मणिमालापहरावै। 
परमानंद श्याम ध्यान करि ऐसे बिरह गवावै॥

इस पद को सुनकर महाप्रभु को मूर्छा आयी जो 3 दिन तक बानी रही। सभी सेवक पास में बैठे रहे। चौथे दिन की सुबह को महाप्रभु प्रकृतिस्थ हुए। सब वैष्णव प्रसन्न हो गए। श्री परमानन्ददास जी मन में डरने लगे की अब ऐसे विरह के पद नहीं गाऊँगा। फिर एक सीधा पद गाया -

(राग विभाग)
माईरी हों आनंद गुनगाऊं। 
गोकुलकी चिंतामणिमाधौ जो मांगो सो पाऊं॥
अबते कमलनैन ब्रज आयै सकल संपदा बाढी। 
नंदरायके द्वारे देखौ अष्ट महासिद्धिठाढी॥
फूले फले सदा वृन्दावन कामधेनु दुहिदीजै। 
मारग मेघ इंद्रवरषामें कृष्ण कृपा सुख लीजै॥
कहत जसोधा सखियन आगे हरि उत्तकर्ष जनावै। 
परमानंददास को ठाकुर मुरली मनोहर भावै॥

(राग गौरी)
“विमलजस बृन्दावन के चंद्रको"

इस पद के बाद फिर यह पद गाया  राग सारंग-“चलिरी नंदगांव जायवसियै” 

इस पद को सुनकर महाप्रभु ने विचार किया की अब ब्रज को चलना चाहिए। 

ब्रज आगमन एवं प्रथम गोकुल दर्शन :
कन्नौज से महाप्रभु ने ब्रज की ओर प्रस्थान किया और मथुरा आये जहाँ महाप्रभु का घर था और बैठक भी। मथुरा में सबने यमुना जी को  प्रणाम किया एवं परमानंददास जी ने यमुना जी के लिए पद गाया -

(राग रामकली)
श्रीयमुनाजी यह प्रसाद हों पाऊं। 
तिहारे निकट रहों निसवासर रामकृष्ण गुनगाऊं॥
मंजन बिमल पावनजल चिंताकुलखवहाऊं। 
तिहारी कृिपा भानकीतनया हरि पद प्रीत बढाऊं॥
बिनती करौ यहीवर माँगौ अधम संग बिसराऊं। 
परमानंददास फलदाता मगन गोपाल लडाऊं॥

इसके उपरांत महाप्रभु जी गोकुल पधारे एवं परमानंददास जी को बाललीलाविशिष्ट गोकुल के दर्शन करवाए। श्री परमानंददास जी को गोकुल में जिस लीला का दर्शन हुआ उसे वे गाने लगे। 

(राग बिलावल)
जमुनाजल घर भरिचली चंद्रावलि नारी। 
मारग खेलत मिलि घनश्याम मुरारी॥
नैननसों नैनामिले मन रह्यौ है लुभाई। 
मोहनमूरत जियवसी पगधरो न जाई॥
तबकी प्रीति प्रगटभई यह पहली भेंट। 
परमानंद ऐसी मिली जैसी गुडमें चेंट॥

(राग सारंग)
लाल नेकटेको मेरी वैयां। 
ओघटघाट चल्यों नहीं जाई रपटतहों कालिन्दी महियां॥

(राग कान्हरौ)
गावत गोपी मधुव्रजवानी। 
जाके भुवन वसत त्रिभुवनपति राजा नंद यसौधा रानी॥
गावत वेदभारतीगावत गावतनारदादिमुनिज्ञानी। 
गावत गुन गंधर्व काल शिव गोकुलनाथ महातम जानी॥ 
गावत चतुरानन जदुनायक गावत शेषसहस्र मुखरास। 
मनक्रम वचन प्रीत यह अंबुज अबगावत परमानंददास॥

(राग कान्हरौ)
जसुमति गृह आवत गोपीजन। 
वासरताप निवारन कारन वारंवार कमलमुख निरखन॥

ऐसे और भी पद श्री परमानन्ददास जी ने गाया। 

गोवर्धन आगमन :
महाप्रभु कुछ दिन गोकुल में ही रहे फिर वे समस्त वैष्णवों के संग गोवर्धन पधारे। श्री परमानन्ददास भी महाप्रभु के संग गोवर्धन आये। परमानन्ददास जी ने श्रीनाथजी के दर्शन किये और उनकी रूप माधुरी में ही डूबे रहे। महाप्रभु ने कहा "परमानन्ददास, कुछ भगवतलीला गाओ"
श्री परमानन्ददास जी ने पद गाया -

(राग कान्हरौ)
मौहन नंदराय कुमार। 
प्रगट ब्रह्म निकुंज नायक भक्तहित अवतार॥
प्रथम चरणसरोज बन्दो श्यामघन गोपाल। 
मकरकुंडलगंडमंडित चारुनैन विसाल॥
बलिराम सहित विनोद लीला सेकर हेत। 
दास परमानंद प्रभू हारि निगम बोलत नेत॥ 

(राग पूरवी)
मेरौ माई माधौ सों मन लाग्यौ।
मेरौ नैन और कमल नैनको इकठौरौ करि मान्यौ॥

इस प्रकार पद गाने के बाद शयन आरती का समय हुआ। महाप्रभु ने शयन आरती की और श्रीनाथजी को पौढ़ाया पश्चात् गोवर्धन से नीचे आकर विराजे। श्री परमानन्ददास भी नीचे आकर बैठ गए। भितरिया सेवक रामदास जी ने परमानन्ददास जी के लिए श्रीनाथजी का प्रसाद दूध भिजवाया। श्री परमानन्ददास जी दूध पीने लगे लेकिन उन्हें दूध बहुत गरम लगा इसलिए दूध ठंडा करके पिया। बाद में रामदास जी आये और श्री परमानन्ददास जी से पूछा की "मैंने आपको महाप्रसाद दूध भिजवाया था तो आपको मिला।" श्री परमानन्ददास जी ने कहा की "हाँ, दूध तो आया था लेकिन बहुत गरम था, श्रीनाथजी इतना गरम दूध कैसे आरोगते हैं, क्या उन्हें गरम दूध सुहाएगा ?"
रामदास जी ने कहा "जी बहुत अच्छा हुआ जो आपने यह बताया, आप भगवद्भक्त हैं, जैसी आज्ञा करेंगे हम वैसा ही करेंगे।" फिर सब सेवक सेवा में सावधान रहने लगे। 
सुबह मंगला के समय श्री परमानन्ददास जी ने ठाकुर जी को जगाने के लिए पद गाया -

(राग विभास)
जागो गोपाल लाल मुख देखों तेरौ। 
पाछें ग्रहकाजकरों नित्य नेम मेरौ॥
विगसत निसा अरुण दिसा उदित भयौ भान। 
गुंजत अंग पंकजवन जागियै भगवान॥
द्वारे ठाडे बंदीजन करत हैं पुकार। 
वंस प्रसंग गावत हरि लीलासार॥
परमानंदस्वामी दयाल जगतमंगलरूप। 
वेद पुराण पठत महिमा लीला अनूप॥

इसके बाद कलेऊ के पद गाए -

(राग रामकली)
पिछावारे ह्वै ग्वालन टेर सुनायौ। 
कमल नैन प्यौरो करत कलेऊ कोटन सुखलों आयो॥
अरी मैया गैया एकवन ब्याय रही हैं बछरा उहां हीं बसायौ।
मुरलीलईनल कुटियानलीनी अरबराय कोउ सखा न बुलायौ॥ 
चकतभईनंदजू की रानी सत्यआय किधोंअपनों पायौ। 
फलो नअंगसमातरसबत्रिभुवनपति सिरछत्र जो छायौ॥
मिल बैठे संकेत सघनवन विविधि भांति कीयौ मन भायौ। 
परमानंद सयानी ग्वालनि उलटि अंग गिरधर पिय प्यायौ॥

इन पदों के गान के बाद ठाकुर जी के मंगला के दर्शन खुले तब परमानन्ददास जी ने श्रीनाथजी के दर्शन किये एवं उनसे पूछा "आप गरम दूध क्यों आरोगते हो"
श्रीनाथजी ने कहा "मुझे जो ये भोग लगाते हैं मैं वो आरोगता हूँ।"

श्रीनाथजी की एक लीला :
श्री परमानन्ददास जी नित्य श्रीनाथजी को कीर्तन सुनाते थे। एक दिन एक राजा श्रीनाथजी के दर्शन करने आया। राजा ने दर्शन किया और अपनी रानी के पास जा कर बोला की "श्रीनाथजी बड़े सुन्दर हैं, तू भी जाके दर्शन करले।" रानी ने कहा की "जैसी हमारी रीति है वैसा हो तो दर्शन करने जाऊँ (अर्थात मंदिर में कोई न हो, एकांत दर्शन)" इसपर राजा ने कहा की "श्रीनाथजी के दर्शन में कैसा परदा" लेकिन रानी मानी नहीं। तब राजा महाप्रभु के पास आया और विनती करने लगा की "महाराज मैंने रानी को बहुत समझाया लेकिन वो ऐसे दर्शन नहीं करना चाहती। इसलिए आप कृपा करके दर्शन करवाओ।" महाप्रभु ने कहा "रानी को लेकर आओ, पहले उन्हें दर्शन कराएँगे फिर बाकी लोग बाद में दर्शन करेंगे।" तब राजा अपनी रानी को ले आया और रानी दर्शन करने लगी। इतने में श्रीनाथजी ने मंदिर के प्रमुख द्वार को खोल दिया जिससे भीड़ दौड़कर अंदर आ गयी और रानी को धक्का देते हुए आगे बढ़ गयी जिससे रानी के सब वस्त्र निकल गए और वह बहुत लज्जित हुई। तब राजा ने रानी से कहा "मैंने तो पहले ही कहा था की ठाकुर जी के दर्शन में कैसा परदा। ये ब्रज के ठाकुर हैं, इन्होने किसी को परदे में कभी रहने नहीं दिया।" 
उस समय श्री परमानंददास जी पद गाने लगे -

(राग देवगंधार)
कोनियह खेलवेकी वानि। 
मदन गोपाल लाल काहूकी राखत नाहिन कानि॥

श्री परमानन्ददास जी ने यह एक तुक ही गाया की महाप्रभु ने कहा "परमानन्ददास, ऐसे कहो - भली यह खेलवेकी वानि।"
तब परमानन्ददास जी नें एसा ही पद गाया

(राग देवगंधार)
भली यह खेलवे की वानि। 
मदनगोपाल लाल काहूकी नाहिन राखत कानि॥
अपनेहाथले देतहै चनवर दूधदही घृतसानि। 
जोवरजोतो आंखदिखावै परधन कों दिनदान॥
सुनिरी जसोधा सुतके करतब पहल मांटमथानि। 
फोरि डारि दधि डारि आजरमें कोन सहै नितहानि॥ 
ठाडी देखत नंदजू की रानी मूंदि कमल मुखहानि। 
परमानंददास जानत हैं बोलि बूझिधों आनि॥

श्री परमानन्ददास जी के घर भगवद्भक्तों का पधारना :
एक समय श्री परमानन्ददास जी के घर रामदास, कुम्भनदास आदि सब वैष्णव पधारे। घर में भगवद्भक्त आये जानकर श्री परमानन्ददास जी बहुत प्रसन्न हुए जो और विचार करने लगे की आज मेरे घर भगवद्भक्त आये हैं। यह मेरा बड़ा भाग्य है क्यूंकि श्री ठाकुर जी इन भगवद्भक्तों के ह्रदय में निवास करते हैं। इसलिए इन भक्तों की कृपा होगी तो श्री ठाकुर जी कृपा करेंगे। प्रथम तो इन भक्तों पर कुछ न्योछावर करना चाहिए। लेकिन मेरे पास तो न्योछावर करने को कुछ है नहीं। यह सोचते हुए श्री परमानन्ददास जी ने एक पद गाया -

(राग हमीर)
आये मेरे नंदनंदन के प्यारे।
माला तिलक मनोहर बानो त्रिभुवनके उजियारे॥
प्रेम सहत वसत मन मोहन नेकहु टरत न टारे। 
हृदय कमलके मध्य बिराजत श्रीव्रजराजदुलारे॥
कहा जानों कोन पुण्य प्रगट भयौ मेरे घर जो पधारे। 
परमानंद प्रभुकरी न्योछावर वारवारहों वारे॥

इस पद को श्री परमानन्ददास जी ने भक्तों को भेंट की और उन्हें विदा किया। 

पद रचना :
श्री परमानन्ददास जी के रचे हुए 2000 से अधिक पद प्राप्त हुए हैं जो परमानन्द सागर ग्रन्थ में संकलित हैं। 

लीला संवरण :
एक दिन श्री परमानन्ददास जी श्री गुसाईं जी को दंडवत प्रणाम करने के बाद गोवर्धन पर्वत पर चढ़ गए और शरीर छोड़ने की इच्छा से श्री गोवर्धननाथजी के ध्वज को दंडवत प्रणाम अर्पित किया और सुरभि कुंड में आकर लेट गए। श्री गुसाईंजी ने राजभोग आरती में परमानन्ददास जी को न देखकर उनके बारे में पूछा। एक शिष्य ने कहा कि वे अति विरह की स्थिति में सुरभि कुंड गए हैं। श्री गुसाईंजी फिर उनके बारे में जानने के लिए सुरभि कुंड गए। श्री परमानन्ददास जी ने श्री गुसाईंजी को देखकर उन्हें दंडवत प्रणाम किया और श्री गुसाईंजी के सामने राग सारंग में "प्रीत तो श्री नंदनंदम सौ कीजे" गाया। एक शिष्य ने परमानन्ददास जी से अनुरोध किया कि उन्हें कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे श्री ठाकुरजी मुझ पर कृपा करें। श्री परमानन्ददास जी ने राग भैरव में ''प्रातसमये उठकरिये श्री लक्ष्मणसुत गान'' गाया और कहा कि इसे एकाग्रता से गाओगे तो इसका फल प्राप्त होगा। उसके बाद श्री परमानन्ददास जी ने अपने मन को जुगलस्वरूप में एकाग्र करते हुए राग सारंग में "राधे बैठी तिलक सव आरती" गाते हुए 1584 में शरीर त्याग दिया। श्री गुसाईंजी ने उस समय कहा था कि पुष्टिमार्ग में दो "महासागर" थे, अर्थात् सूरदासजी और परमानन्ददास जी।