श्री गोविन्द स्वामी की जीवनी

श्री गोविन्द स्वामी की जीवनी

परिचय :
श्री गोविन्द स्वामी  (1505 - 1586) मध्य प्रदेश के ग्वालियर के निकट आंतरी ग्राम में रहते थे। वहां ये इसी नाम से जाने जाते थे। इनके मन में सदा यही प्रश्न उठता की "भगवान के चरणारविन्दों की प्राप्ति कैसे होगी ?" इसी प्रश्न का सदैव विचार करते थे।

ब्रज आगमन :
एक दिन श्री गोविन्द स्वामी ने विचार किया की ब्रज भगवान का धाम है और ब्रज में ही भगवान के चरणों की प्राप्ति होगी। इसी विचार से गोविंदस्वामी ब्रज में आये और महावन में रहने लगे। ये पूर्व से ही कवी थे इसलिए ये ब्रज में भी पद रचना करते और भगवान को रिझाने के लिए गाते।

श्री गुसाईं विट्ठलनाथ जी से प्रथम मिलन :
महावन में श्री गोविंदस्वामी नित्य ही ठाकुर जी को पद सुनाते। इनके पद जो भी सुनता वह गोवर्धन में श्री गुसाईं जी को आकर सुनाता। गुसाईं जी पद सुनकर प्रसन्न होते। पद सुनानेवाला फिर गोविंदस्वामी के पास जाता और बताता की आपके पद को सुनकर श्री गुसाईं जी बहुत प्रसन्न होते हैं। इस बात को सुनकर गोविंदस्वामी ने विचार किया की श्री गुसाईं जी के दर्शन के लिए जाना चाहिए। 
एक दिन गुसाईं जी का एक सेवक महावन गया हुआ था और वहां उसकी भेंट गोविंदस्वामी से हुई। दोनों आपस में भगवद्चर्चा करने लगे। श्री गोविंदस्वामी ने उस सेवक से पूछा "प्रभु की प्राप्ति कैसे होगी।"
सेवक ने कहा "आजकल श्री ठाकुर जी को गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी ने अपने वश में कर रखा है, इसलिए ठाकुर जी कहीं भी आ-जा सकते नहीं। श्री ठाकुर जी तो श्री गुसाईं जी के हाथ में हैं।"
यह सुनकर गोविंदस्वामी ने कहा "मुझे श्री गुसाईं जी के पास ले चलो।"
गुसाईं जी का सेवक गोविंदस्वामी को अपने साथ लेकर गोकुल में श्री गुसाईं जी में पास आया। 
उस समय गुसाईं जी ठकुरानी घाट पर संध्या तर्पण कर रहे थे। गोविंदस्वामी ने श्री गुसाईं जी के दर्शन किये और विचारने लगे की ये तो कर्ममार्गीय दीखते हैं, सो इसका क्या कारण है ?
तब गोविंदस्वामी को देख कर श्री गुसाईं जी ने कहा "आओ-आओ गोविंदस्वामी, बहुत दिन बाद आये हो।"
गोविन्द स्वामी ने कहा "महाप्रभु, अभी-अभी आया हूँ।" इसके बाद गोविंदस्वामी मन में विचार करने लगे की गुसाईं जी ने तो मुझे पहले कभी देखा नहीं है, फिर मेरा परिचय कैसे जान गए ? इसमें अवश्य ही कोई कारण है। 
जब गुसाईं जी मंदिर में पधारे तब गोविंदस्वामी ने उनसे विनती की "हे महाप्रभु, कृपा कर मुझे अपने शरण लीजिये।"
श्री गुसाईं जी ने कहा "जाओ, स्नान कर आओ।"
गोविंदस्वामी स्नान कर आये और गुसाईं जी ने उन्हें नाम दीक्षा प्रदान की और जैसे ही भगवान का नाम उनके कान में पड़ा वैसे ही गोविंदस्वामी को साक्षात् पूर्णपुरुषोत्तम कोटिकन्दर्पलावण्य श्री कृष्ण के दर्शन हुए और सब लीलाओं का ह्रदय में अनुभव हो गया। दीक्षा के उपरांत ये स्वयं को स्वामी न कहकर दास कहते जिससे इनका नाम गोविन्ददास हो गया। इसके बाद गुसाईं जी श्री नवनीतप्रिया जी की सेवा कर मंदिर से बाहर आ गए। तब गोविन्दस्वामी ने गुसाईं जी से विनती की "आप तो कपट रूप दिखाते हो, साक्षात् पूर्णपुरुषोत्तम होकर वेदोक्त कर्म करते हो, जिससे हम जैसे जीवों को मोह होता है।"
श्री गुसाईं जी ने कहा "जो भक्ति मार्ग है वह पुष्प का वृक्ष है और जो कर्ममार्ग है वह काँटों की बाड़ है। इसलिए कर्ममार्ग की बाड़ के बिना भक्तिमार्ग के पुष्प वृक्ष की रक्षा नहीं हो सकती।" 
यह सुनकर गोविन्दस्वामी बहुत प्रसन्न हुए। 

श्री गोविन्दस्वामी जी के आग्रह पर श्रीनाथजी का कीर्तन गाना :
श्री गोविन्दस्वामी जी महावन में रहते और नित्य श्री ठाकुर जी को पद सुनाते। श्रीनाथजी स्वयं गोविन्दस्वामीजी के पास कीर्तन सुनने आते थे। वहां मदनगोपालदास कीर्तन लिखने के लिए आते थे। 
एक दिन गोविन्दस्वामी ने श्रीनाथजी से पूछा "आप नित्य ही कष्ट उठा कर यहाँ कीर्तन सुनने आते हैं जिससे ऐसा दीखता है की आपको गाने का अभ्यास है, इसलिए आपको कुछ गाना चाहिए।"
यह सुनकर श्रीनाथजी गाने लगे जिसको सुनकर स्वामिनी श्री राधा जी प्रकट हो गयीं और ताल स्वर देने लगीं। इस अद्भुत गान कला को सुनकर गोविंदस्वामी धन्य धन्य कहने लगे और अपने भाग्य की सराहना करने लगे।
उसी समय मदनगोपालदास वहां आये और गोविंदस्वामी से पूछा "यहाँ तो कोई दीखता नहीं है, तो आप बात किससे कर रहे हो।"
श्रो गोविन्दस्वामी कुछ भी बोले नहीं, इस दिव्य घटना को अपने ह्रदय में गुप्त रखा। 
एक दिन श्री गुसाईं जी ने गोविंदस्वामी से पूछा "गोविंदस्वामी, श्री ठाकुर जी कैसा गाते हैं ?"
गोविन्दस्वामी ने कहा "श्री ठाकुर जी बहुत अच्छा गाते हैं लेकिन ताल स्वर श्रीस्वामिनीजी बहुत अच्छा देती हैं।"
यह सुनकर श्री गुसाईं जी मुस्कुराने लगे और कुछ बोले नहीं। 

श्री गोविन्दस्वामी का गोविन्ददास होने का एक प्रसंग :
श्री गोविन्दस्वामी जब गोकुल में रहते थे तो वहां आंतरी से उनके पुराने सेवक उन्हें ढूंढते हुए गोकुल में आये। उन सेवकों ने गोविंदस्वामी को देखा तो उनसे पूछने लगे "गोविन्दस्वामी कहाँ रहते हैं।"
श्री गोविन्दस्वामी ने कहा "गोविन्दस्वामी तो कुछ दिन पहले मर गए।"
उन सेवकों में से एक सेवक गोविन्दस्वामी को पहचान गया और कहने लगा "महाराज, आप हमारी हंसी क्योँ करते जो, आप ही तो गोविंदस्वामी हैं।"
श्री गोविन्दस्वामी ने कहा "मैं सत्य कहता हूँ, मैंने स्वामीपने को छोड़ दिया है, इसलिए तुम सब गोविंदस्वामी को मरा ही मानों।"
उन सेवकों ने कहा "महाराज, अब हम किसके सेवक बने।"
श्री गोविन्दस्वामी ने उन सेवकों को लेजाकर श्री गुसाईं जी के सेवक बना दिए जिससे उन सबको भगवत्प्राप्ति हुई। 

श्री गोविन्दस्वामी का यमुना जी से प्रेम :
श्री गोविन्दस्वामी गोकुल में रहते लेकिन कभी भी यमुनाजी में पांव नहीं रखते थे। श्री यमुना जी को साक्षात् श्री स्वामिनी जी का स्वरुप ही मानते थे जैसा महाप्रभु जी ने यमुनास्टक में वर्णन किया है। वे यमुना जी को दण्डवत प्रणाम करते, और जल ग्रहण करते। 
एक दिन श्रीबालकृष्ण जी और श्रीगोकुलनाथजी गोविंदस्वामी को पकड़ कर यमुना जी में स्नान करने आये। तो गोविंदस्वामी जी ने उनसे विनती की "यह मल-मूत्र से भरा शरीर श्री यमुना जी को छूने लायक नहीं है। श्री यमुना जी तो साक्षात् स्वामिनी स्वरुप हैं, इसलिए इन्हें तो उत्तम सामग्री अर्पण करनी चाहिए।"
यह सुनकर श्रीबालकृष्ण जी और श्रीगोकुलनाथजी ने गोविन्दस्वामी को छोड़ दिया और कुछ बोले नहीं। 

श्री गोविंदस्वामी के संग श्रीनाथजी की लीला का एक प्रसंग :
श्रीनाथजी नित्य गोविन्दस्वामी के साथ खेलने जाया करते थे। एक दिन श्रीनाथजी और गोविंदस्वामी अप्सरा कुण्ड से होते हुए गोवर्धन आ रहे थे की तभी मंदिर में शयनभोग के उपरांत शयन आरती की ध्वनि सुनाई पड़ी। गोविन्दस्वामी विचार करने लगे की श्रीनाथजी तो मेरे संग अभी मंदिर ही आ रहे थे, तो शयनभोग किसने आरोगा। 
श्री गोविंदस्वामी गुसाईं जी के पास आये और विनती करने लगे "हे गुसाईं जी, श्रीनाथजी तो अभी-अभी मेरे साथ आये हैं, इसलिए उन्होंने भोग नहीं आरोगा है, उन्होंने पुनः भोग लगाने की कृपा कीजिये।"
श्री गुसाईं जी ने पुनः श्रीनाथजी को भोग धराया। भितरिया सेवक गोपालदास जी ने गुसाईं जी से कहा "एक दिन मैंने श्रीनाथजी को गोविन्दस्वामी के संग पूंछरी से आते हुए देखा था।"
श्री गुसाईं जी ने कहा "कुम्भनदास, गोपीनाथदास, एवं गोविन्दस्वामी ये तीनों श्रीनाथजी के एकांत के सखा हैं, इनको महाप्रभु ने यह अधिकार प्रदान किया है।"

श्री गोविंदस्वामी का श्रीनाथजी के पाग की पेंच ठीक करना :
एक दिन श्री गोविंदस्वामी श्रीनाथजी के दर्शन के लिए आये। उन्होंने देखा की श्रीनाथजी की पाग के पेंच खुले हैं। इसपर गोविन्दस्वामी ने श्रीनाथजी से कहा "आपने पाग के पेंच क्यों खोल दिए हैं"
श्रीनाथजी ने कहा "तू मेरे पाग के पेंच संवार दे"
श्रीनाथजी की आज्ञा से गोविन्दस्वामी भीतर प्रवेश कर श्रीनाथजी की पाग की पेंच को ठीक कर देते हैं। भितरिया सेवक ने यह सब देख लिया और उसने गुसाईं जी से जाकर सब बता दिया की "गोविंदस्वामी ने अपरस में (स्नान के उपरांत ठाकुर जी के स्पर्श के पहले किसी और का स्पर्श हो जाए तो देह अपरस हो जाती है, अर्थात ठाकुरजी को स्पर्श करने योग्य नहीं रहती) ठाकुर जी का स्पर्श कर लिया।"
इसपर गुसाईं जी ने कहा "गोविंददास के ठाकुर जी को स्पर्श करने से कोई अशुद्धि नहीं होती, वो तो ठाकुरजी के सखा हैं, श्रीनाथजी नित्य उनके संग खेलते हैं।"

श्रीनाथजी का गोविंदस्वामी को 8 कंकड़ फेंक कर मारना :
एक दिन श्री गुसाईं जी श्रीनाथजी का श्रृंगार कर रहे थे। गोविंदस्वामी जगमोहन में कीर्तन कर रहे थे। उसी समय श्रीनाथजी ने गोविंदस्वामी को 8 कंकड़ फेंक कर मारी। इसपर गोविंदस्वामी ने एक कंकड़ श्रीनाथजी को मार दिया जिससे श्रीनाथजी चमक (shake) गए। जब गुसाईंजी ने यह देखा तो गोविंदस्वामी को पूछा "गोविन्ददास, यह क्या किया तुमने ?"
गोविंदस्वामी ने कहा "हे महाराज, आपका यह पुत्र आपके सामने ही सीधा बनता है, लेकिन दूसरों के लिए बड़ा टेड़ा है। इसने मुझे 8 कंकड़ मारे जिसपर आपने तो इनको कुछ नहीं कहा !"
यह सुनकर गुसाईं जी मुस्कुराये लेकिन कुछ बोले नहीं। 

श्री गोविंदस्वामी की अनासक्ति और वैराग्य का एक प्रसंग :
एक दिन गोविंदस्वामी की बेटी अपने ससुराल से आयी थी। लेकिन गोविंदस्वामी ने अपनी बेटी से एक दिन भी बात नहीं की। जब कान्हबाई ने गोविंदस्वामी से कहा की बेटी से एक बार बात तो कर लो। इसपर गोविंदस्वामी ने कहा "मन तो एक है, जो श्रीनाथजी में लगा है। अब मन को वहां लगाऊं के यहाँ।"
फिर कुछ दिन रह कर बेटी अपने घर जाने लगी। गोविंदस्वामी के घर से बेटी को साड़ी, चोली इत्यादि कपडे दिए गए। लेकिन गोविंदस्वामी को दया आ गयी, कि मेरे घर में जो है वह गुरु का प्रसाद है, यदि मेरी बेटी गुरु के घर का अन्नप्रसादी लेगी तो इसका बिगाड़ होगा। गोविंदस्वामी अपनी बेटी से कभी कुछ बोले नहीं लेकिन बेटी के जाने के समय दया के लिए बोले "बेटी, यदि तू यह वस्त्र लेगी तो तेरा बुरा होगा, इसे मत ले।"
बेटी ने कहा "मुझे तो समझ नहीं है, आपने मुझे ये बताकर बड़ी कृपा की है और मुझे सही मार्ग दिखाया।"
बेटी ने उन वस्त्रों को नहीं लिया और अपने घर चली गयी। श्री गोविंदस्वामी गुरु के अंश से ऐसे डरते थे। 

श्री गोविंदस्वामी के अद्भुत धमार का प्रसंग :
फाग के महीने में श्री ठाकुरजी को फाग और धमार के पद सुनाये जाते हैं। एक दिन श्री गुसाईं जी श्रीनाथजी के शयन भोग के उपरांत उन्हें पान की बीरि धराते हैं। श्री गोविंदस्वामी उस समय धमार गा रहे थे। श्रीनाथजी भी गोविंदस्वामी के पास धमार सुन रहे थे। लेकिन धमार समाप्त होने से पहले ही श्रीनाथजी भीतर चले जाते हैं। यह देख गोविंदस्वामी गाना रोक देते हैं। श्री गुसाईं जी उनसे पूछते हैं की "गोविन्ददास, धमार पूर्ण करो।"
इसपर गोविंदस्वामी ने कहा "महाराज, धमार (श्रीनाथजी) तो भाग गए और घर में घुस गए, अब क्या गाऊं।"
यह सुनकर श्री गुसाईं जी कुछ बोले नहीं। इसके बाद जब गुसाईं जी बैठक में पधारे तब उन्होंने एक तुक की रचना की और गोविंदस्वामी के धमार में जोड़ दी। उस दिन से गोविंदस्वामी की धमार लोक में साढ़े बारह कही जाने लगी। सो गोविंदस्वामी ऐसे भक्त थे जो लीला दर्शन करते हुए गाते थे। 

श्रीनाथजी की एक लीला :
श्री गोविंदस्वामी महावन में रहते और नित्य ही कीर्तन करते। श्रीनाथजी नित्य उनका कीर्तन सुनने को आते और गोविंदस्वामी के संग गान भी करते। ये गोविंदस्वामी भगवान के अष्ट सखाओं में से एक थे इसलिए जब कहीं श्रीनाथजी गान में चूकते तो गोविंदस्वामी भूल बताते और गोविंदस्वामी गान में चूकते तो श्रीनाथजी भूल बताते। इस प्रकार श्रीनाथजी नित्य गोविंदस्वामी का कीर्तन सुनने आते और मंदिर में एक भक्त को बैठाकर रखते की यदि गुसाईं जी मंदिर में भोग लगाने आएं तो मुझे बुला लेना। 
एक दिन उस भक्त के मन में आया की श्रीनाथजी नित्य ही गुसाईं जी के पहले ही मंदिर में पहुँच जाते हैं, यदि एकदिन मैं श्रीनाथजी को न बुलाऊँ तो गुसाईं जी सब जान जायेंगे और श्रीनाथजी का गोविंदस्वामी के पास जाना बंद हो जायेगा। ऐसा विचार कर वह भक्त एक दिन श्रीनाथजी को बुलाने नहीं गया। जब गुसाईं जी भोग लगाने आये तो श्रीनाथजी वहां नहीं थे। तब गुसाईं जी ने एक सेवक को आज्ञा दी "श्रीनाथजी गोविंदस्वामी के पास बैठे हैं, उन्हें बुला लाओ।"
जब वह सेवक श्रीनाथजी को बुला लाया तब वह भक्त बड़ा पश्चाताप करने लगा की गुसाईं जी तो पहले से ही सब जानते हैं, मैंने श्रीनाथजी से ऐसी कुटिलता क्यों की। 
सो वे गोविंदस्वामी ऐसे कृपा पात्र थे जिनके पास श्रीनाथजी नित्य आते थे। 

श्री गोविंदस्वामी का एक वैरागी संत को उपदेश करना :
श्री गोविंदस्वामी नित्य जसोदाघाट पर आकर बैठते थे। एक दिन वहां एक वैरागी संत आये और अपने प्रभु के लिए गाने लगे। वह संत राग और ताल नहीं जनता था, इसलिए उसका गान बड़ा विचित्र था। ऐसा गान सुनकर गोविंदस्वामी ने उस संत से कहा "कृपा कर आप मत गाइये, ऐसे गाने से क्या लाभ होगा।"
उस वैरागी संत ने कहा "मैं तो अपने प्रभु श्री राम को रिझा रहा हूँ।"
इसपर गोविंदस्वामी ने कहा "श्री राम तो चतुरशिरोमणि हैं, वह तुम्हारे इस गान से कैसे रीझेंगे। यदि आपका भाव सच्चा है तो मन में प्रभु का नाम लेने से ही वे रीझ जायेंगे।"

श्रीनाथजी के उतावलेपन से वस्त्र के फटने का एक प्रसंग :
एक दिन श्रीनाथजी श्यामढाक के ऊपर विराजमान होकर मुरली बजा रहे थे। श्री गोविंदस्वामी कुछ दूर पर बैठ कर यह देख रहे थे। उसी समय श्री गुसाईं जी स्नान कर श्रीनाथजी के उत्थापन के लिए मंदिर की ओर जाने लगे। जब श्रीनाथजी ने श्यामढाक से गुसाईं जी को देखा तो उतावले होकर वहां से कूद गए जिससे एक वृक्ष की डाल से उनका वस्त्र फट गया और वस्त्र का एक टुकड़ा उसी डाल पर रह गया। 
जब श्री गुसाईं जी ने उत्थापन के लिए श्रीनाथजी का पट खोला तो देखते हैं की श्रीनाथजी का वस्त्र फटा है। गुसाईं जी ने सब सेवकों से पूछा की क्या यहाँ कोई आया था, जिसपर सेवकों ने कहा की कोई नहीं आया था। अब श्री गुसाईं जी विचार करने लगे और उसी समय गोविंदस्वामी आ गए। गोविंदस्वामी ने गुसाईं जी से कहा "आप इस बात का विचार क्यों कर रहे हैं, क्या आप अपने लड़के का स्वाभाव जानते नहीं हैं की यह बहुत चंचल है। ये श्यामढाक से कूद कर आये हैं जिससे एक वृक्ष से इनके वस्त्र फट गए और एक टुकड़ा डाल पर लटकी हुई है, आप चलें तो मैं वह वस्त्र दिखाऊँ।"
श्री गुसाईं जी गोविंदस्वामी के संग श्यामढाक गए और वृक्ष की डाल से उस फटे वस्त्र को उतारकर ले आये और श्रीनाथजी से पूछा "आपने इतना उतावलापन क्यों किया।"
श्रीनाथजी ने कहा "उत्थापन का समय हो गया था, आप स्नान करके मंदिर में पधार रहे थे इसलिए इतना उतावला हो गया।"
उस दिन के बाद गुसाईं जी ने मंदिर में ऐसी व्यवस्था की 3 बार घंटानाद होगा फिर 3 बार शंख बजेगा फिर 20 पल के बाद उत्थापन के लिए पट खोले जायेंगे। 

बादशाह अकबर का गोविंदस्वामी का राग सुनने के लिए वेश बदल कर गोकुल आना :
एक दिन आगरे में बादशाह अकबर ने सुना की गोविंदस्वामी बहुत अच्छा गाते हैं। वे निरपेक्ष और निःशंक हैं। अकबर ने विचार किया कि गोविंदस्वामी के मुख से राग कैसे सुना जाए। ऐसा विचार कर अकबर ने बादशाह का वेश त्याग कर साधारण वेश में अकेले ही गोकुल आ गए। उस समय गोविन्ददास जसोदाघाट पर बैठ कर भैरव राग गा रहे थे। बादशाह अकबर भी वहां आ गए और गोविन्दस्वामी का राग सुनने लगे। जब गोविंदस्वामी का राग पूर्ण हुआ तो अकबर ने "वाहवा वाहवा" किया। जब गोविंदस्वामी ने यह सुना तो समझ गए की यह बादशाह है और कहने लगे "यह राग अशुद्ध हो गया।"
अकबर ने कहा "मैं बादशाह हूँ"
गोविंदस्वामी ने कहा "तुम बादशाह हो तो बादशाही करो परन्तु तुम्हारे सुनने से यह राग तो अशुद्ध हो गया।"
बादशाह अकबर ने विचार किया "मैं एक देश का राजा हूँ, और गोविंदस्वामी को तो त्रिलोकी का वैभव भी फीका लगता है, तो ये मेरे हुक्म में क्यों रहेंगे।" ऐसा विचार कर बादशाह अकबर चले गए। 
उस दिन से गोविंदस्वामी ने राग भैरव फिर कभी गाया नहीं। 

श्रीनाथजी का गोविंदस्वामी को घोडा बनाकर सवारी करना:
श्रीनाथजी गोविंदस्वामी के संग नित्य खेलते थे। कभी उन्हें घोडा बनाते तो कभी हाथी बनाकर क्रीड़ा करते। 
एक दिन श्रीनाथजी ने गोविंदस्वामी को घोडा बनाया और उनकी सवारी करने लगे। बहुत देर घोडा बने रहने के बाद गोविंदस्वामी को लघुशंका आ गयी। उन्होंने श्रीनाथजी से कहा "आप निचे उतर जाइये, मुझे लघुशंका करनी है।"
श्रीनाथजी ने कहा "घोडा क्या सवार को कभी कहता है की नीचे उतरो मुझे लघुशंका आयी है, वह तो खड़े-खड़े करता है, तो तुम कर दो।"
गोविंदस्वामी ने खड़े-खड़े ही लघुशंका कर दी। ऐसा करते हुए एक वैष्णव ने गोविंदस्वामी को देख लिया, लेकिन श्रीनाथजी उसे नहीं दिखे। वह वैष्णव गुसाईं जी के पास आया और सब कुछ बता दिया। गुसाईं जी ने उस वैष्णव से कहा "गोविंदस्वामी श्रीनाथजी के संग खेलते हैं, जब वे हाथी, घोडा बनते हैं तो पूरा स्वांग किये बिना क्रीड़ा कैसे होगी, तुम्हें तो श्रीनाथजी दिखे नहीं, इसलिए तुम इन बातों में ना पड़ो।"
यह सुनकर वह वैष्णव कुछ बोला नहीं। 

गोविंदस्वामी का गुसाईं जी के संग श्री केशवराय जी के दर्शन करने जाना और उनके वस्त्रों को देखकर कटाक्ष करना :
एक दिन श्री गोविंदस्वामी गुसाईं जी के संग मथुरा में श्री केशवराय जी के दर्शन करने गए। उस समय उष्णकाल चल रहा था। गोविंदस्वामी ने श्री केशवराय जी के मंदिर में देखा की ठाकुर जी ज़री के वस्त्र और जरी की ओढ़नी धारण किये हुए हैं। यह देखकर गोविंदस्वामी ने विचार किया की  इतनी गर्मी में ठाकुर जी ने ऐसे मोटे वस्त्र क्यों धारण किये हैं, तो उन्होंने ठाकुर जी से पूछा "आप ठीक तो हैं ?"
यह सुनकर श्री केशवराय जी मुस्कुराने लगे। इतने पर श्री गुसाईं जी ने कहा "गोविंददास, ऐसा न कहो"
गोविंदस्वामी ने कहा "महाराज, ठाकुर जी ने बीमार व्यक्ति के जैसे पोशाक धारण कर रखे हैं, तो कैसे न पूछा जाए।"
यह सुनकर श्री गुसाईं जी कुछ बोले नहीं। 

श्री गोविंदस्वामी का श्रीनाथजी के भोग के पहले ही भोजन करना :
एक दिन श्रीनाथजी के राजभोग सेवा के समय भितरिया सेवक राजभोग लेकर आ रहा था तभी गोविंदस्वामी आये और उस सेवक से कहा "श्रीनाथजी को राजभोग बाद में धराना पहले मुझे प्रसाद दे दो।"
यह सुनकर भितरिया सेवक ने राजभोग की थाल वहीँ पटक दी और गुसाईं जी के पास जाकर सब बता दिया। श्री गुसाईं जी गोविंदस्वामी के पास आये और पूछा "गोविंदस्वामी, यह क्या कर रहे हो ?"
गोविंदस्वामी ने कहा "श्रीनाथजी मुझे अपने संग खेलने के लिए ले जाते हैं और राजभोग के बाद यदि प्रसाद लेने के लिए मंदिर में रह जाता हूँ तो बाद में लौटने पर वन में श्रीनाथजी मिलते नहीं, तो मैं क्या करूँ ?"
यह सुनकर श्री गुसाईं जी ने ऐसी व्यवस्था की जिससे श्रीनाथजी के राजभोग के समय गोविंदस्वामी को भी प्रसाद दे दिया जाता था। 

श्री गोविंदस्वामी के डर से श्रीनाथजी का मंदिर में जाकर छुप जाना :
एक दिन श्रीनाथजी गोविंदस्वामी के संग खेल रहे थे। खेल में जब श्रीनाथजी के ऊपर दांव आया तो उत्थापन का समय हो गया, और श्रीनाथजी भाग कर मंदिर में घुस गए। इसपर गोविंदस्वामी भी दौड़ कर मंदिर आये और श्रीनाथजी को गिल्ली मार दी। जब मंदिर के सेवक ने यह देखा तो गोविंदस्वामी को धक्के मार कर मंदिर से बाहर कर दिया। 
मंदिर में श्रीनाथजी को उत्थापन भोग धराया गया। गोविंदस्वामी जाकर मंदिर के रास्ते में बैठ गए और कहने लगे "अभी गायों के साथ श्रीनाथजी इसी रास्ते पर आएंगे तब मैं उनको मार दूंगा।"
जब श्री गुसाईं जी स्नान कर मंदिर में पधारे तो देखा कि श्रीनाथजी अनमने से हो रहे हैं और उत्थापन का भोग आरोगा नहीं। तब गुसाईं जी ने श्रीनाथजी से पूछा "आप कैसे हो"
श्रीनाथजी ने कहा "जब तक आप गोविंदस्वामी को नहीं मनाएंगे तब तक मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगेगा क्यूंकि रास्ते में चले बिना और गोविंदस्वामी के साथ खेले बिना मैं रह नहीं सकता। अभी मैं रास्ते पर जाऊंगा तो वो मुझे अनगिनत गिल्ली मार देगा। इसी चिंता से मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है, जब गोविंदस्वामी आएगा तभी मुझे अच्छा लगेगा।"
श्रीनाथजी की इन बातों को सुनकर और उनकी भक्तवत्सलता को देखकर श्री गुसाईं जी का ह्रदय भर आया। तब गुसाईं जी गोविंदस्वामी को मनाकर ले आए और श्रीनाथजी से कहा "लो गोविंदस्वामी हाजिर है" 
श्रीनाथजी ने जब गोविंदस्वामी को देखा तब उन्होंने भोग आरोगा। 
सो वे गोविंदस्वामी श्रीनाथजी के ऐसे सखा थे। 

लीला संवरण :
1586 में गुसाईं श्री विट्ठलनाथजी गोविंदस्वामी के साथ गोवर्धन पहाड़ी पर एक गुफा में चले गए जहाँ दोनों ने शरीरसहित श्री कृष्ण लीला में प्रवेश किया।