वन्दत प्रिया पाद जल जात - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ 7 (6)

वन्दत प्रिया पाद जल जात - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ 7 (6)

(राग सोरठ)
वन्दत प्रिया पाद जल जात।
कामरस वश श्यामसुन्दर धरि हृदय जल जात॥ [1]
करत अति आधीनता परसत दृगन जल जात।
रसिक भगवत चूमितल मंजुल सुमुख जल जात॥ [2]

- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ 7 (6)

अपनी प्राणप्रिया श्री राधा के चरणकमलों की वन्दना करते हुए श्री श्यामसुन्दर कामरस के वशीभूत होकर इन चरणकमलों को अपने हृदय कमल पर धारण करते हैं। [1]

श्री कृष्ण अत्यन्त अधीनतापूर्वक श्री राधा के चरणकमलों कों अपने नेत्र कमलों से स्पर्श कराते हैं, फिर परम रसिकचक्र चूड़ामणिलाल अपने परमोज्ज्वल रस मादिक अति सुन्दर मुखारविन्द से इन कमलस्वरूप चरणद्वयी की अति सुकोमल चरणतल का चुम्बन करते हैं। [2]