प्रिया पाऊँ धारिये पिय पहियाँ  - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (35)

प्रिया पाऊँ धारिये पिय पहियाँ - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (35)

(राग सारंग)
प्रिया पाऊँ धारिये पिय पहियाँ ।
कुंज भवन के द्वारे ठाढ़े कुंवर कदब की छहियाँ ।। [1]
सुनत बचन हँसि बिलभ न कीनों चली अली गहि बहियाँ ।
श्री स्वामी बीठल बिपुल बिनोद बिहारी लाइ लई उर महियाँ ।। [2]

- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, विट्ठल विपुल देव जू की बानी (22)

सखी श्री प्रियाजी से प्रार्थना करती है कि हे श्री प्रियाजी! आप श्री प्राणप्रियतम के पास पधारो। प्रियतम कुंज महल के द्वार पर बगीची में कदम की छाया में खड़े आपका मार्ग अवलोकन कर रहे हैं। [1]

सखी की प्रार्थना सुन कर श्री स्वामिनी पहिले तो हँसी, फिर बिना विलंभ किए सखी का हाथ पकड़ कर आगे चलीं। श्री विठ्ठल विपुल जी कहते हैं कि पुनः आगे चल बिहारी को रोमाञ्चित देख कर विनोद ही विनोद में स्वामिनी ने हृदय से लगा लिया। [2]