अनूपम माधुरी जोड़ी हमारे श्याम-श्यामा की - श्यामा सखी (सनम साहब)

अनूपम माधुरी जोड़ी हमारे श्याम-श्यामा की - श्यामा सखी (सनम साहब)

अनूपम माधुरी जोड़ी हमारे श्याम-श्यामा की।
रसीली रसभरी अँखियाँ हमारे श्याम श्यामा की॥ [1]
कटीली भौं अदा बाँकी सुघर सूरत मधुर बतियाँ।
लटक गरदन की मन वसियाँ हमारे श्याम श्यामा की॥ [2]
मुकुट और चन्द्रिका माथे अधर पर पान की लाली।
अहो कैसी भली छबि है हमारे श्याम-श्यामा की॥ [3]
परस्पर मिलकै जब बिहरैं वे वृन्दावन की कुञ्जन में।
नहीं वरनत बने शोभा हमारे श्याम-श्यामा की॥ [4]
नहीं कुछ लालसा धन की नहीं निर्वाण की इच्छा।
'सखी श्यामा' को दैं दरशन दया हो श्याम-श्यामा की॥ [5]

- श्यामा सखी (सनम साहब)

श्री श्यामा सखी कह रही हैं "हमारे श्यामाश्याम की जोड़ी बहुत सुंदर एवं मधुर है जिनके नेत्र सदा प्रेम रस से भरे रहते हैं, इस छवि की कोई उपमा नहीं है।" [1]

श्री श्यामाश्याम का मुख कमल अति सुन्दर है, उनके नयन कटाक्ष की छवि बड़ी प्यारी है, उनकी बातें बड़ी मधुर है एवं गले से उनके झुके हुए सर की छवि मन का हरण करनेवाली हैं। [2]

श्री कृष्ण के माथे पर मुकुट सुशोभित है और श्री राधा के माथे पर चन्द्रिका विराजमान है, दोनों के अधर पान की लाली से लाल हैं, यह छवि कैसी सुन्दर शोभायमान है। [3]

जब दोनों श्री श्यामाश्याम श्रीवृन्दावन की कुञ्ज-निकुञ्जों में विहरण करते हैं तो उनके इस शोभा का वर्णन करते नहीं बनता। [4]

श्री श्यामा सखी कह रही हैं "हे श्री श्यामाश्याम, मुझे न धन की लालसा है न निर्वाण (मुक्ति) ही कोई इच्छा है, मेरी तो यही एकमात्र कामना है की मुझे आपके दर्शन हों।" [5]