लाग गई तब लाज कहा री - श्री ब्रज निधि जी

लाग गई तब लाज कहा री - श्री ब्रज निधि जी

(राग धनाश्री)
लाग गई तब लाज कहा री।
जे दृग लागे नन्दनन्दन सों, औरन सों फिर काज कहा री॥ [1]
भर भर पिये प्रेम रस प्याले, ओछे अमल को स्वाद कहा री।
'ब्रज निधि' ब्रज रस चाख्यौ चाहै, या सुख आगे राज कहा री॥ [2]

- श्री ब्रज निधि जी, श्री ब्रज निधि ग्रंथावली

श्री ब्रज निधि जी कहते हैं "जब मेरी आँखें श्री नन्दनन्दन से लड़ गयी हैं तो फिर लज्जा कैसी, मुझे अब औरों से कोई काम नहीं।" [1]

मैंने श्री कृष्ण की रूप माधुरी एवं प्रेम का भर-भर के पान किया है, ऐसा निर्मल स्वाद त्रिभुवन में कहीं नहीं है। श्री ब्रज निधि जी कहते हैं "मुझे तो केवल ब्रज रस की आकांक्षा है जिसके समक्ष राज का सुख भी हेय है।" [2]