परिचय :
श्री छीतस्वामी श्रीनाथजी के अष्ट सखाओं में से एक थे एवं पुष्टिमार्ग में अष्टछाप भक्तों में से थे। ये ब्रजवासी थे एवं इनका जन्म मथुरा में सन 1515 में चौबे परिवार में हुआ था। कालांतर में छीतस्वामी गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के शरणागत हुए एवं श्रीनाथजी को पद गाकर सुनाते थे।
श्री छीतस्वामी का गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के शरण आना :
मथुरा में 5 चौबे रहते थे जो बहुत बड़े गुंडे थे एवं लोगों को ठगा करते थे। उन पांचों में छीत चौबे मुखिया थे।
एक दिन सबने विचार किया कि जो भी गोकुल में जाता है वह गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के वश में हो जाता है। इससे ऐसा प्रतीत होता है की गुसाईं जी जादू टोना बहुत जानते हैं। लेकिन हमारे ऊपर उनका जादू टोना चले तभी हम इसको सत्य मानेंगे।
ऐसा विचार कर पांचो चौबे एक खोटा नारियल और एक खोटा रूपया लेकर गोकुल आए। उनमें से चार चौबे बाहर बैठे रहे और छीत चौबे भीतर आकर उस खोटे नारियल और खोटे रूपया को भेंट रूप में गुसाईं जी के चरणों में चढ़ाया। श्री गुसाईं जी ने एक सेवक को बुलाया और कहा कि इस रुपये को ले जाओ और पैसा करा लाओ। वह सेवक रूपया ले गया और पैसा करा लाया। इसके बाद नारियल फोड़ा गया और उसमे से सफेद गरी निकली। यह सब देखकर छीतस्वामी मन में विचार करने लगे कि ये तो स्वयं ईश्वर हैं। फिर छीतस्वामी ने गुसाईं जी से कहा "हे महाराज, मुझे अपने शरण में लीजिये।"
श्री गुसाईं जी ने छीतस्वामी को नाम दीक्षा प्रदान की और भीतर जाकर श्री नवनीतप्रिया जी के दर्शन करने की आज्ञा की। छीतस्वामी जब भीतर दर्शन करने गए तो देखा गया कि वहा भी गुसाईं जी विराजमान हैं और जब बाहर आये तो देखा की यहाँ भी गुसाईं जी विराजे हैं। तब छीतस्वामी ने विचारा की गुसाईं जी की ईश्वरता को जान पाना जीव के लिए संभव नहीं है।
बाहर जो चार चौबे बैठे थे वे छीतस्वामी को आवाज देने लगे। गुसाईं जी ने छीतस्वामी से कहा की तुम्हारे साथी तुम्हें बुला रहे हैं। छीतस्वामी बाहर गए और उन चारों से कहा की "मुझे टोना लग गया है, तुम सब भाग जाओ नहीं तो तुम सबको भी टोना लग जायेगा।" यह सुनकर वे चारों साथी वहां से भाग गए।
इसके बाद छीतस्वामी ने एक पद बनाकर गाया -
(राग नट)
भई अब गिरिधरसों पहेचान।
कपटरूप धरि छलवेआयो पुरुषोत्तम नहिं जान॥
छोटो बड़ो कछू नहिं जान्यो छायरह्यो अज्ञान।
छीतस्वामि देखत अपनायौ श्रीविट्ठल कृपानिधान॥
इस पद को सुनकर गुसाईं जी बहुत प्रसन्न हुए।
छीतस्वामी उस रात को वहीँ सो गए और दूसरे दिन श्री गुसाईं जी ने छीतस्वामी को प्रभु को निवेदन किया तब छीतस्वामी को साक्षात् कोटिकंदर्प लावण्य पूर्णपुरुषोत्तम भगवान के दर्शन हुए और समस्त भगवल्लीला उनके ह्रदय में स्फुरित हो गयी। इसके बाद उन्हें गुसाईं जी और ठाकुर जी में अभेदनिश्चय हो गया कि दोनों स्वरुप एक ही हैं।
फिर छीतस्वामी श्रीनाथजी के दर्शन के लिए गोवर्धन आ गए। जब वे श्रीनाथजी के दर्शन करने मंदिर के भीतर गए तो देखा की गुसाईं जी वहाँ विराजमान हैं। छीतस्वामी ने गुसाईं जी को दंडवत प्रणाम किया और श्रीनाथजी के दर्शन कर बाहर आ गए। बाहर उन्होंने सबसे पूछा के "गुसाईं जी यहाँ कब पधारे" जिसपर लोगों ने कहा की गुसाईं जी तो गोकुल में हैं। यह सुनकर छीतस्वामी गोकुल आ गए और देखा की गुसाईं जी यहाँ भी विराजमान हैं। यह सब देखकर छीतस्वामी ने निश्चय किया कि श्रीनाथजी और गुसाईं जी एक ही स्वरुप हैं। इसके बाद से छीतस्वामी ने "गिरिधरन श्रीविठ्ठल" छाप से बहुत पदों की रचना की।
श्री छीतस्वामी के विषयों से अनासक्ति का एक प्रसंग :
श्री छीतस्वामी बीरबल के पुरोहित थे। सो वे एक बार बीरबल के पास वर्सोंधी (सालाना चंदा) लेने के लिए आगरा गए और उनके यहाँ ठहरे। प्रात: समय सोकर जब वे उठे तो श्रीवल्लभाचार्य जी का नामस्मरण किया। बाद में देवगंधार राग में स्वरचित एक पद गाया -
"श्रीवल्लभ राजकुमार।
नहिं मिति नाथ कहाँ लों बरनों, अगनित गुन-गन-सार,
'छीतस्वामि' गिरिधर श्री विट्ठल प्रघट कृष्ण औतार।"
अत: बीरबल ने पद सुना और छीतस्वामी की गायकी और संगीतपरक ज्ञान की मधुर अभिव्यक्ति पर मुग्ध हो गए, पर मन में डरे कि यदि यह बादशाह अकबर सुन लेगा तो अपने मन में क्या सोचेगा। इधर छीतस्वामी शैया से उठ श्री यमुनास्नान करने चले गए। वहाँ से लैटकर आए और अपने श्री ठाकुर जी को जगाया, सेवा की और भोगसामग्री सिद्ध कर प्रभु को समर्पण किया। बाद में फिर स्वरचित एक कीर्तन पद गाने लगे -
"जे वसुदेव किये पूरण तप सोइ फल फलित श्रीवल्लभदेह"
बीरबल को यह सब कृत्य अच्छा न लगा। अत: उन्होंने बड़े ही नम्रभाव से छीतस्वामी से कहा "आपने सुबह और अभी-अभी जो पद गाए, उन्हें यदि म्लेच्छ बादशाह सुन लेगा और मुझसे पूछेगा तो मैं क्या उत्तर दूंगा, सो ऐसा न करो तो अच्छा रहेगा।"
यह सुनकर छीतस्वामी बीरबल से बोले "म्लेक्ष बादशाह मुझसे जब पूछेगा तब उत्तर दूंगा लेकिन तू तो अभी पूछ रहा है, तू भी मुझे म्लेक्ष ही प्रतीत हो रहा है, आज के बाद तेरा मुख नहीं देखूंगा।"
छीतस्वामी ने बीरबल से यह कहकर अपना सामान बांधा तथा सालाना चंदा छोड़कर मथुरा वापस चले आए।
जब यह बादशाह को पता चला तो उसने बीरबल से पूछा "तुम्हारे पुरोहित क्यों तुमसे क्रोधित हैं।"
बीरबल ने सब बात बादशाह को बता दी। बादशाह ने कहा ब्राम्हण लोग वृथा ही क्रोध बहुत करते हैं।
फिर बादशाह ने कहा "बीरबल, जब तुम और मैं नांव पर बैठे थे तब दीक्षित जी ने मुझे आशीर्वाद दिया था और मैंने उन्हें एक अमूल्य मणि भेंट किया था जिसमें से नित्य 5 तोला सोना प्रकट होता था। लेकिन दीक्षित जी ने वह मणि श्री यमुना जी में फेंक दी। इसपर मुझे बड़ा गुस्सा आया और मैंने वह मणि उनसे मांगी। तब दीक्षित जी ने यमुना जी में हाथ डाल कर मुट्ठी भर मणि निकाल कर मुझसे कहा की तुम्हारी जो मणि है उसे पहचान कर ले लो। तब मुझे निश्चय हुआ की ये ईश्वर हैं, ईश्वर के बिना ऐसा कोई नहीं कर सकता। इस बात के विचार से तुम्हारे पुरोहित की सब बात सही है, तुमने यह क्यों नहीं विचार किया।" बीरबल यह सुनकर अपने आप पर बहुत क्रोधित हुआ और चुप रहा।
यह सारी बात श्री गुसाईं जी ने सुनी और पास में बैठे लाहौर के कुछ वैष्णवों से कहा "मैं तुम्हारे यहाँ छीतस्वामी को भेज दूंगा, तुम सब उनकी भली प्रकार से सेवा करना और विदा करना।"
कुछ दिन पश्चात् गुसाईं जी ने छीतस्वामी को पत्र देकर कहा "तुम इस पत्र को लेकर लाहौर जाओ, वहां कुछ वैष्णव भक्त हैं, वे तुम्हारी भली प्रकार से विदाई करेंगे।"
यह सुनकर छीतस्वामी ने कहा "जै जै, मैं आपका सेवक हूँ, मेरा जन्म कहीं भीख मांगने के लिए नहीं हुआ है, मेरा जन्म तो आपकी सेवा के लिए हुआ है। बीरबल के पास मेरी सालाना चंदा बंधी थी, तो मैं वह लेने के लिए उसके पास जाता था। जब बीरबल ने म्लेक्षों सा आचरण किया तो मैं सब छोड़ कर आ गया। अब मैं आपके चरणों को छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगा। वैष्णव होकर घर-घर जाकर भीख माँगना मुझसे अब नहीं होगा।"
श्री गुसाईं जी छीतस्वामी के इस निष्कपट वचनों को सुनकर बहुत प्रसन्न हुए और पास में बैठे वैष्णवों से कहा "यही वैष्णवों का धर्म है, वैष्णव को ऐसा ही करना चाहिए।"
बाद में गुसाईं जी ने लाहौर के वैष्णवों को पत्र लिखा "छीतस्वामी लाहौर नहीं आ सकते, इसलिए तुम सब उन्हें प्रति वर्ष सौ रुपये भेज दिया करो।"
लाहौर के वैष्णवों ने जब यह पत्र पढ़ा तो वे प्रतिवर्ष छीतस्वामी को सौ रुपये भेजने लगे।
श्री छीतस्वामी के पद गान से बादशाह अकबर को दिव्य दर्शन होना :
एक दिन बीरबल बादशाह अकबर से आज्ञा लेकर गोकुल में कृष्ण जन्माष्टमी का दर्शन करने आये। बीरबल के बाद बादशाह अकबर भी वेश बदल कर पीछे से छुप-छुपकर गोकुल आया। उस समय जन्माष्टमी के पालने के दर्शन के लिए भक्तों की भीड़ लगी थी। अकबर भी भीड़ में खड़ा हो गया और दर्शन करने लगा। श्री गुसाईं जी के अतिरिक्त अकबर को किसी ने पहचाना नहीं। उस समय छीतस्वामी कीर्तन कर रहे थे और श्री गुसाईं जी श्री नवनीतप्रिया जी को पालना झूला रहे थे। श्री छीतस्वामी ने यह पद गाया -
प्रियनवनीत पालनें झूले श्रीविठ्ठलनाथ झुलावेहो।
कबहुंक आप संगमिल झूलै कबहुंक उतर झुलावैहो॥ 1 ॥
कबहुंक सुरंग खिलोना लैलै नानाभांति खिलावे हो।
चकई फिर कनीलेविंगी टु झुणझुणहात बजावें हो ॥ 2 ॥
भोजन करत थाल एकझारी दोउ मिल खायखवावें हो।
गुप्त महारस प्रकटजनावे प्रीति नई उपजावें हो ॥ 3 ॥
धन्यन्य भाग्य दासनिजजन के जिन यह दर्शन पाएहो।
छीतस्वामी गिरिधरन श्रीविठ्ठल निगम एककर गाए हो ॥ 4 ॥
"श्री नवनीतप्रिया जी को श्री विट्ठलनाथ जी पालने में झूला रहे हैं। कभी तो श्री नवनीतप्रिया जी और श्री विट्ठलनाथ साथ में मिलकर झूलते हैं तो कभी उतरकर एक दूसरे को झुलाते हैं। "
श्री छीतस्वामी को ऐसा दर्शन हुआ और बादशाह अकबर को भी ऐसा ही दर्शन हुआ। अन्य सबको साधारण दर्शन हुए। इसके बाद अकबर जाने लगा तो गुसाईं जी ने उसे गुप्तरीति से महाप्रसाद दिलवाया। महाप्रसाद पाकर बादशाह अकबर आगरा चला गया। दूसरे दिन बीरबल भी आगरा आ गए। तब बादशाह ने बीरबल से पूछा "क्या दर्शन किया तुमने"
बीरबल ने कहा "श्री नवनीतप्रिया जी पालने में झूल रहे थे और गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी झूला रहे थे।"
इसपर बादशाह अकबर ने कहा "यह बात झूठी है, मुझे तो यह दर्शन हुआ की श्री गुसाईं जी पालने में झूल रहे थे और श्री नवनीतप्रिया जी झूला रहे थे। तुम्हारे पुरोहित छीतस्वामी भी यही अपने पद में गा रहे थे, मैं तुम्हारे पास में ही खड़ा था।"
यह सुनकर बीरबल ने कहा "मुझे ऐसे दर्शन क्यों नहीं हुए।"
बादशाह अकबर ने कहा "तुम्हें गुरु के स्वरुप का ज्ञान नहीं है, तुम्हारे पुरोहित छीतस्वामी जिनको सब अनुभव है, उनसे तो तुम्हारा प्रेम है नहीं, तो तुमको ऐसे दर्शन किस प्रकार होंगे।"
सो वे छीतस्वामी ऐसे भगवद भक्त थे।
पद रचना :
श्री छीतस्वामी ने अनेक पदों की रचना की है। लेकिन इनका कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है। इनके पद दिव्य लीलाओं का दर्शन कराते हैं जो सामान्य के लिए दृष्टिगोचर नहीं है। उदाहरण के लिए -
भोग श्रृंगार यशोदा मैया,श्री विट्ठलनाथ के हाथ को भावें।
नीके न्हवाय श्रृंगार करत हैं, आछी रुचि सों मोही पाग बंधावें॥
तातें सदा हों उहां ही रहत हो, तू दधि माखन दूध छिपावें।
छीतस्वामी गिरिधरन श्री विट्ठल, निरख नयन त्रय ताप नसावें॥
उनके भावों में स्वामिनी जी [श्री राधा] के प्रति भी अगाध प्रेम झलकता है जिसमें श्री कृष्ण को नित्य ही श्री राधा के वश में मानने वाला है:
"छीत स्वामी गिरधर बस जाके सो वृषभानु दुलारी"
श्री छीतस्वामी का ब्रज के प्रति प्रेम :
श्री छीतस्वामी ब्रज धाम से कितना प्रेम करते थे यह उनके इस पद से स्पष्ट है -
अहो बिधना तोपे अचरा पसार मांगो
जनम जनम दीजे याही ब्रज बसिवो।
"हे विधाता, मैं तुझसे अचरा पसार (झोली फैला कर) माँगता हूँ कि जनम जन्मान्तर मुझे इस ब्रज में वास दीजिए एवं ब्रज से बाहर मत कीजिए।"
लीला संवरण :
श्री छीतस्वामी ने 1585 में गोवर्धन के निकट पूंछरी में देह त्याग कर लीला प्रवेश किया।

